यूपी – UP: तेवर पर आंसू भारी…नसीम ने तोड़ी भाजपा की किलेबंदी, नहीं काम आई अक्रामक रणनीति, ये रहीं हार की तीन वजह – INA

कानपुर की सीसामऊ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को लगातार चौथी बार हार का सामना करना पड़ा। सपा प्रत्याशी नसीम सोलंकी ने 8629 वोटों से भाजपा के सुरेश अवस्थी को हराया। वहीं, बसपा प्रत्याशी बीरेंद्र कुमार शुक्ल 1409 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। सपा की भाजपा पर जीत को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भाजपा प्रत्याशी के तेवर पर सपा प्रत्याशी के आंसू भारी पड़े।
पहले राउंड में ही नसीम ने ले ली थी बढ़त
सुबह बजे से नौबस्ता स्थित गल्लामंडी में मतगणना शुरू हो गई थी। एक चबूतरे पर 14 मेजों पर गिनती की गई। पहले राउंड में ही नसीम ने 2351 मतों की बढ़त ले ली थी। तीसरे राउंड में 39 वोटों से भाजपा प्रत्याशी सुरेश . हुए। चौथे राउंड में 4378 वोटों से सपा ने बढ़त बना ली थी। नौवें राउंड में नसीम ने सबसे ज्यादा 30694 वोटों की बढ़त बनाई।
इसके बाद 20 राउंड तक हुई गण्ना में सपा बढ़त बनाए रही। सीसामऊ उपचुनाव में पांच प्रत्याशी मैदान में थे। जिसमें बसपा प्रत्याशी बीरेंद्र कुमार को 1409 वोट मिले। अशोक पासवान को 266 और कृष्ण कुमार यादव को 113 मत मिले। वहीं 482 वोट नोटा पड़े हैं। कुल 132973 लोगों ने मतदान किया।
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में हाजी इरफान सोलंकी ने सपा के टिकट पर यहां जीत दर्ज की थी। उन्होंने 79163 वोट पाकर भाजपा के सलिल बिश्नोई को हराया था। सलिल बिश्नोई को 66,897 वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस के हाजी सुहेल अहमद को सिर्फ 5616 वोट मिले थे। साल 2012 में नए परिसीमन के तहत सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र बना था। इसके बाद से ही यह सीट सपा के पास है। इरफान सोलंकी का इस सीट पर खासा दबदबा है।
साल 2017 में भी इस सीट पर हाजी इरफान सोलंकी ने जीत हासिल की थी। वह सपा के टिकट पर 73,030 वोट पाकर जीते थे। उन्होंने भाजपा के सुरेश अवस्थी को हराया था। सुरेश अवस्थी को 67,204 वोट मिले थे। बसपा के नंद लाल कोरी को 11,949 मिले थे।
2012 में सपा के टिकट पर हाजी इरफान सोलंकी ने सीसामऊ सीट से जीत मिली थी। सोलंकी को कुल 56,496 वोट मिले थे। भाजपा ने 2012 में हनुमान स्वरूप मिश्रा को टिकट दिया था। उन्हें 36,833 वोट मिले थे। कांग्रेस के संजीव दरियाबादी को 22,024 वोट मिले थे।
सबसे बड़ी वजह हिंदू वोटों का बंटवारा है, जिसे भाजपा बंटेंगे तो कटेंगे नारे के जरिए रोकने की कोशिश में लगी थी, जो पूरी तरह से काम नहीं आ सकी। इसके पीछे यह भी कहा जा रहा है कि टिकट की घोषणा से ऐन वक्त पहले भाजपा के दलित बिरादरी से आने वाले पूर्व विधायक राकेश सोनकर के अचानक चर्चा में आ जाने से भी दलितों के वोट बैंक पर असर पड़ने की बात कही जा रही है। चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा के खेमे में भी इस बात को लेकर काफी चर्चा रही, जबकि समाजवादी पार्टी मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में करने के साथ ही हिंदू क्षेत्रों के हर बूथ पर भाजपा से बराबर की लड़ाई में रही।
इसी तरह, सीसामऊ क्षेत्र के 60 हजार दलित बस्तियों के मतदाताओं में से जिन 49.06 प्रतिशत यानि करीब 30 हजार मतदाताओं ने मतदान किया, उनका भी सीधे-सीधे दोनों पार्टियों में बंटवारा साफ-साफ दिखा। हालांकि भारतीय जनता पार्टी की ओर से दलित वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए रणनीति के तहत काम किया गया, जिसमें आंशिक सफलता ही मिल पाई। आमतौर पर बस्तियों के मतदाताओं को लेकर यह कहा जाता है कि उन्हें अपने पक्ष मे करने के लिए कुछ खास तरह के इंतजाम पार्टियों को करना होता है, वह पार्टी प्रत्याशी की ओर से किया जाता है, जो भाजपा की तरफ से उस तरीके से नहीं हो पाया, जैसा होना चाहिए। यह हार की दूसरी बड़ी वजह है।
इसके अलावा मतदान के दौरान जगह-जगह से सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली ऐसी सूचनाएं जिसमें यह कहा जा रहा था कि पुलिस प्रशासन लोगों को वोट देने से रोक रहा है। इससे भी उपचुनाव की वजह से शांत पड़े ऐसे मतदाताओं को सक्रिय कर दिया। जिससे सपा प्रत्याशी को पलड़ा भारी रहा। सपा प्रत्याशी के महिला होने और उनका सरल स्वभाव लोगों को उनके पक्ष में आने के लिए भी रोक नहीं पाया। दूसरी तरफ भाजपा प्रत्याशी की तेवर वाली छवि को लेकर भी पार्टी के अंदर ही नकारात्मकता दिखी, यह भी हार की एक वजह बना। भाजपा के हार की एक वजह यह भी कही जा रही है कि जब राजकीय इंटर कॉलेज मतदान केंद्र में वोटिंग हो रही थी इसी तरह वहां पर भाजपा के पक्ष के कुछ नेताओं ने आकर धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया और पुलिस से भी भिड़ गए। इससे भी पार्टी को नुकसान हुआ।
भाजपा ने जिस तरह घर-घर से मतदाताओं को निकालकर बूथ तक लाने की योजना बनाई थी, वह पूरी तरह से कारगर नहीं हो पाई। इसकी वजह यह रही कि कार्यकर्ता मतदाताओं को घर निकालने में कामयाब नहीं हो सके। विधानसभा क्षेत्र के ऐसे भी मोहल्ले और गलियां रहीं जहां प्रचार तो खूब हुआ लेकिन लोग कम निकले। इसके उलट समाजवादी पार्टी ने अपनी रणनीति में पूरी तरह से कामयाब रही। उसने मुस्लिम क्षेत्र के साथ ही हिंदू क्षेत्रों में बराबर की रणनीति बनाई थी। इसके साथ सपा प्रत्याशी की भावनात्मक छवि ने रही सही कमी को पूरा कर दिया। इसकी वजह से उन्हें बस्तियों के अलावा सिख, सिंधी, पंजाबी, पिछड़ा, वैश्य सभी समाजों से कम, ज्यादा वोट हासिल हुआ, जो उनकी जीत की वजह बना।
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Credit By Amar Ujala








