165 साल पुरानी जंजीरें: ‘काले अंग्रेजों’ के राज में आज़ाद भारत का गुलाम सिपाही और औपनिवेशिक पुलिसिंग का सच

165 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था या गुलामी की जंजीरें: आधुनिकता के आवरण में छिपी गुलामी की दास्तान

आगरा ( मोहम्मद शाहिद कि कलम से ):  आज जब हम अपने इर्द-गिर्द देखते हैं, तो व्यवस्था के चेहरे बहुत बदल गए लगते हैं। सड़कें चौड़ी हो गई हैं, थानों के बाहर चमचमाते बोर्ड लग गए हैं, पुलिस अधिकारियों की कारें लग्ज़री हो गई हैं और उनके हाथों में आई-फोन आ गए हैं। दफ्तर वातानुकूलित और पूरी तरह से कंप्यूटराइज्ड हो चुके हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि हम एक बहुत ही आधुनिक, स्वतंत्र और पारदर्शी लोकतांत्रिक गणराज्य का हिस्सा हैं। लेकिन क्या इमारतों पर रंग-रोगन कर देने और गैजेट्स बदल देने से किसी व्यवस्था की आत्मा बदल जाती है? कागज़ों में भले ही देश 1947 में स्वतंत्र हो गया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि व्यवस्था के कई हिस्सों में अंग्रेजी हुकूमत की परछाइयां आज भी हाथ में ब्रिटिश हुकूमत का डंडा लिए खड़ी हैं।

इस आधुनिक पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति, राजनेता या बड़े अधिकारी को बचाना होता है, तो नियम, कायदे और कानून अचानक मोम की तरह लचीले पड़ जाते हैं। उनकी हैसियत देखकर कानून की धाराओं की व्याख्या तय की जाती है। लेकिन जैसे ही किसी साधारण व्यक्ति या महकमे के निचले स्तर के पुलिस कर्मी को दंडित करने की बारी आती है, फिर वही नियम लोहे की जंजीरों की तरह कठोर बना दिए जाते हैं। मानसिकता आज भी करीब 165 वर्ष पुराने 1861 के औपनिवेशिक ढांचे की मजबूत बेड़ियों में ही जकड़ी हुई है । सच तो यह है कि जब कानून का तराजू व्यक्ति देखकर झुकने लगे, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था लोकतांत्रिक कम और औपनिवेशिक अधिक हो चुकी है।

1857 का खौफ और चार्ल्स वुड की क्रूर पटकथा

यह समझने के लिए कि आज की पुलिस व्यवस्था आम आदमी से इतनी कटी हुई और सत्ता के सामने इतनी नतमस्तक क्यों है, हमें इतिहास के पन्नों में लौटना होगा। साल 1857, जब सिपाही विद्रोह (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। उस विद्रोह के बाद भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया। तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग (1856-1862), जो ईस्ट इंडिया कंपनी के जाने के बाद भारत के प्रथम वायसराय भी बने, के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि भविष्य में ऐसे किसी भी विद्रोह को कैसे कुचला जाए । उन्हें एक ऐसी फोर्स की दरकार थी, जिसका काम जनता की सेवा करना न हो, बल्कि ब्रिटिश सत्ता को बचाना और जनता पर खौफ का राज स्थापित करना हो।

यहीं से एंट्री होती है एक गोरे प्रशासनिक अधिकारी चार्ल्स वुड की। चार्ल्स वुड, जो बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष थे और बाद में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया भी बने, को इतिहास मुख्य रूप से शिक्षा में उनके योगदान ‘वुड्स डिस्पैच’ (1854) के लिए याद रखता है, जिसे भारत में अंग्रेजी शिक्षा का ‘मैग्ना कार्टा’ कहा गया । वुड्स डिस्पैच का उद्देश्य एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो खून और रंग से भारतीय हो, लेकिन सोच से अंग्रेज हो, ताकि कंपनी के प्रशासन में एक सस्ते कार्यबल (workforce) के रूप में उनका इस्तेमाल किया जा सके । लेकिन चार्ल्स वुड का एक दूसरा, बेहद खौफनाक चेहरा भी था, जिसे बहुत कम पुलिस कर्मी या आम लोग जानते होंगे।

इन्हीं चार्ल्स वुड ने लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में आज के आधुनिक भारत की पुलिसिंग की बुनियाद कहे जाने वाले ‘पुलिस एक्ट 1861’ (Police Act 1861) की रूपरेखा तैयार की थी । इन्होंने तत्समय भारत की पुलिस के भाग्य की पटकथा लिखी, इसलिए चार्ल्स वुड को भारत की पुलिस का ‘भाग्य विधाता’ कहना कतई गलत नहीं होगा। इस प्रशासनिक सोच की नींव तत्कालीन गवर्नर जनरल ने स्पष्ट रूप से इस उद्देश्य से रखी थी कि शासन ‘जनता पर’ रहे, ‘जनता के लिए’ नहीं । इस एक्ट ने पुलिस को एक ऐसा सैन्य स्वरूप दिया जो अपने ही देशवासियों का दमन करने के लिए प्रशिक्षित था। यह एक ऐसा ढांचा था जहां पुलिस को जनता का रक्षक नहीं, बल्कि शासक का वफादार कुत्ता बनने की ट्रेनिंग दी गई ।

इंपीरियल पुलिस से आईपीएस तक: शराब वही पुरानी, बोतल नई

ब्रिटिश काल के दौरान उच्च पदों पर गोरे आक्रांताओं का कब्जा होता था, जिसे इंपीरियल पुलिस (Imperial Police – IP) कहा जाता था । इन गोरे अधिकारियों का काम निचले स्तर के भारतीय सिपाहियों के माध्यम से आम भारतीयों पर क्रूरता करना था। 1947 में जब गोरे आक्रांता चले गए, तो व्यवस्था का भारतीयकरण हुआ और इंपीरियल पुलिस की जगह भारतीय पुलिस सेवा (Indian Police Service – IPS) ने ले ली ।

लेकिन क्या सत्ता का चरित्र बदला? बिल्कुल नहीं। मतलब शराब वही पुरानी है, बस नई बोतल में डाल दी गई है । अंग्रेज चले गए और उनका स्थान ‘काले अंग्रेजों’ ने ले लिया। 1861 के कानून ने पुलिस बल को दो स्पष्ट और असमान वर्गों में विभाजित कर रखा है। आज 1861 का कानून पुलिस कर्मियों को पूरी तरह से गुलाम बना कर रखता है, क्योंकि पुलिस एक्ट 1861 की कठोर दंडात्मक धाराएं सिर्फ इंस्पेक्टर और उससे निचले रैंक (सब-इंस्पेक्टर, सहायक उप-निरीक्षक, और कांस्टेबल) तक ही लागू होती हैं । भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों पर यह एक्ट उस तरह से लागू नहीं होता। वे अखिल भारतीय सेवा नियमों और संविधान के संरक्षण के तहत आते हैं ।

इसका नतीजा यह है कि नीचे का सिपाही आज भी उसी खौफ में जी रहा है जिसमें वह 1861 में जीता था। उसके लिए काम के घंटे तय नहीं हैं, पदोन्नति के अवसर न के बराबर हैं, और मानसिक दबाव चरम पर है । जबकि ऊपर बैठे अधिकारी उसी सामंती व्यवस्था का आनंद ले रहे हैं जो कभी ब्रिटिश जनरलों के लिए बनाई गई थी।

धारा 7 और धारा 29: खाकी वर्दी में कैद गुलाम की दास्तान

पुलिस एक्ट 1861 को बारीकी से पढ़ें तो इसकी धारा 7 (Section 7) और धारा 29 उस औपनिवेशिक क्रूरता का सबसे जीता-जागता प्रमाण हैं । धारा 7 महानिरीक्षक (IG), उप-महानिरीक्षक (DIG) और जिला पुलिस अधीक्षक (SP) को यह असीमित अधिकार देती है कि वे अपने से निचले रैंक के किसी भी अधिकारी को बर्खास्त, निलंबित या पदावनत कर सकते हैं । और यह दंड किस तरह के होते हैं? 1861 के एक्ट की मूल भावना के अनुसार, एक सिपाही को 15 दिनों तक क्वार्टर गार्ड में कैद रखने, ‘पनिशमेंट ड्रिल’ (punishment-drill) करवाने, अतिरिक्त गार्ड ड्यूटी कराने या वेतन काटने जैसे अमानवीय दंड दिए जा सकते हैं ।

कल्पना कीजिए, स्वतंत्र भारत का एक सिपाही जो 24 घंटे की ड्यूटी करता है, उसे छोटी सी मानवीय भूल के लिए या साहब की जी हुजूरी न करने के कारण बिना किसी पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया के सस्पेंड कर दिया जाता है। उसे उसी तरह प्रताड़ित किया जाता है जैसे एक अंग्रेज अफसर किसी भारतीय सिपाही को करता था । वहीं दूसरी ओर, जब किसी बड़े अधिकारी पर भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग का आरोप लगता है, तो उसकी फाइलें महीनों तक एक मेज से दूसरी मेज पर सफर करती हैं और अंततः वह क्लीन चिट पाकर फिर से किसी मलाईदार पद पर बैठ जाता है।

धारा 29 के तहत कर्तव्य की उपेक्षा (neglect of duty) के नाम पर निचले कर्मचारियों का जीना मुहाल कर दिया जाता है । जब महकमे का अपना ही सिपाही इस कानून के तहत गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर है, तो वह आम जनता के साथ मानवीय व्यवहार कैसे कर सकता है? कुंठा, निराशा और कार्यस्थल पर होने वाला अपमान अक्सर आम जनता पर लाठियों के रूप में बरसता है।

‘ऑर्डरली सिस्टम’: आज़ाद भारत में सामंतवाद और बंधुआ मजदूरी

1861 के एक्ट की उपज और औपनिवेशिक मानसिकता का सबसे घिनौना और शर्मनाक चेहरा ‘ऑर्डरली सिस्टम’ (Orderly System) है। यह वह प्रथा है जिसमें पुलिस कांस्टेबलों को वरिष्ठ अधिकारियों के घरों में उनके व्यक्तिगत और घरेलू काम करने के लिए तैनात किया जाता है । इसे आधिकारिक तौर पर 1979 में ही प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन सत्ता के नशे और सामंती सोच ने इसे आज तक जीवित रखा है ।

मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लेते हुए जो टिप्पणियां की हैं, वे इस व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा हैं। जस्टिस एस.एम. सुब्रमण्यम ने स्पष्ट शब्दों में इसे “गुलामी की प्रथा” (slavery system) करार दिया और कहा कि यह करदाताओं के पैसे की बर्बादी है । वर्दीधारी पुलिस कर्मी, जिन्हें समाज की सुरक्षा, अपराध की रोकथाम और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, वे बड़े अधिकारियों के घरों में कपड़े धो रहे हैं, कुत्ते टहला रहे हैं, बर्तन मांज रहे हैं और उनके परिवार की चाकरी कर रहे हैं ।

सोचने वाली बात यह है कि जो अधिकारी सरकारी खजाने से नौकर रखने के लिए प्रति माह 10,000 रुपये का भत्ता (servant allowance) उठाते हैं, वे उस पैसे को अपनी जेब में रख लेते हैं और मुफ्त में पुलिस कर्मियों को अपने घरों में बंधुआ मजदूर की तरह इस्तेमाल करते हैं । मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का यह तर्क बिल्कुल सही है कि सरकारी संसाधनों और पुलिस कर्मियों का यह निजी उपयोग भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) की धारा 13 के तहत आपराधिक कदाचार (criminal misconduct) की श्रेणी में आता है ।

उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद आनन-फानन में डीजीपी को आदेश निकालने पड़े, कांस्टेबलों को वापस बुलाना पड़ा और एसपी स्तर से ऊपर के अधिकारियों से यह लिखित अंडरटेकिंग (undertaking) लेनी पड़ी कि वे अपने घर में ऑर्डरली नहीं रखेंगे । लेकिन क्या यह पहली बार हुआ है? 2018 में भी उच्च न्यायालय में हलफनामा देकर झूठ बोला गया था कि यह प्रथा खत्म हो गई है । सच्चाई यह है कि जब तक यह सामंती मानसिकता खत्म नहीं होगी, तब तक ‘ऑर्डरली सिस्टम’ का यह कोढ़ किसी न किसी रूप में इस व्यवस्था को खाता रहेगा। यह सिर्फ एक प्रशासनिक अनियमितता नहीं है; यह एक इंसान के आत्मसम्मान और एक पुलिस कर्मी की वर्दी का घोर अपमान है ।

स्वदेशी का ढोल और विदेशी कानून का झोल

आजकल राजनीतिक मंचों से स्वदेशी और गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। वर्तमान बीजेपी सरकार ने आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़े बदलाव करते हुए भारतीय दंड संहिता 1860 (IPC), आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 (IEA) को हटाकर उनकी जगह भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 (BSB) लागू किए हैं । सरकार का दावा है कि ये नए कानून दंड के बजाय न्याय पर केंद्रित हैं और यह औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का एक बड़ा कदम है ।

लेकिन यहां जानकारी का गहन विश्लेषण करने पर एक बहुत बड़ा अंतर्विरोध और विसंगति सामने आती है। जिन स्वदेशी कानूनों (BNS, BNSS) को लागू करने और उनके तहत न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिस मशीनरी के कंधों पर है, वह मशीनरी (पुलिस) आज भी उसी 1861 के सड़े-गले पुलिस एक्ट से संचालित हो रही है । नए कानूनों में भी पुलिस अधिकारी की परिभाषा के लिए पुलिस एक्ट 1861 का ही हवाला दिया जा रहा है (BNSS की धाराओं में “expression ‘police’ under the Police Act, 1861”) ।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी पुरानी और खटारा बैलगाड़ी के ढांचे में बुलेट ट्रेन का इंजन लगा दें। जब तक पुलिस का ढांचा, उसकी जवाबदेही और उसकी कार्यप्रणाली चार्ल्स वुड वाली रहेगी, तब तक नए आपराधिक कानून अपने मूल उद्देश्य में सफल कैसे हो सकते हैं? अगर आप वास्तव में गुलामी के प्रतीक मिटाना चाहते हैं, तो सबसे पहले उस कानून को क्यों नहीं मिटाते जिसने 165 सालों से इस देश की जनता और निचले दर्जे के पुलिस कर्मियों की पीठ पर सबसे ज्यादा लाठियां बरसाई हैं?

कारण बहुत साफ है। 1861 का एक्ट राजनीतिक कार्यपालिका को पुलिस पर पूर्ण नियंत्रण देता है । आज की राजनीतिक व्यवस्था को भी वही पुलिस चाहिए जो ब्रिटिश काल में अंग्रेजों को चाहिए थी—ऐसी पुलिस जो आकाओं के इशारे पर काम करे, जो राजनीतिक विरोधियों को कुचल सके, और जो कानून के प्रति नहीं बल्कि सत्ता के प्रति वफादार हो। इसी स्वार्थ के कारण, देश आजाद होने के 165 साल बाद भी (विद्रोह के बाद से) यह कानून हमारे मुंह पर तमाचा मार रहा है।

प्रकाश सिंह केस और सुप्रीम कोर्ट की धूल फांकती फाइलें

पुलिस व्यवस्था को इस राजनीतिक चंगुल और 1861 की औपनिवेशिक बेड़ियों से निकालने के प्रयास ऐसा नहीं है कि हुए नहीं। राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-1981) से लेकर रिबेरो समिति (1998) और मलिमथ समिति तक, अनगिनत आयोगों ने कहा कि 1861 का कानून भारत के लोकतंत्र के लिए एक अभिशाप है और इसे तत्काल बदला जाना चाहिए ।

वर्ष 1996 में दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों, प्रकाश सिंह और एन.के. सिंह ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की । 10 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधारों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए सात महत्वपूर्ण निर्देश दिए ।

इन निर्देशों में शामिल था: राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) का गठन ताकि राज्य सरकार पुलिस के काम में बेवजह दखल न दे; पुलिस महानिदेशक (DGP) का योग्यता के आधार पर पारदर्शी चयन और उन्हें न्यूनतम दो साल का कार्यकाल देना; पुलिस के काम को दो हिस्सों में बांटना—कानून-व्यवस्था (Law & Order) और अपराध जांच (Investigation); तबादलों और पोस्टिंग में राजनीतिक दखल रोकने के लिए पुलिस स्थापना बोर्ड (Police Establishment Board) का गठन; और सबसे महत्वपूर्ण, पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority) की स्थापना । अदालत ने एक ‘मॉडल पुलिस एक्ट 2006’ (Model Police Act 2006) का मसौदा भी सरकारों को दिया ।

लेकिन आज 2026 में, सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के दो दशक बीत जाने के करीब, जमीनी हकीकत क्या है? लगभग सभी राज्य सरकारों ने इन निर्देशों की या तो धज्जियां उड़ा दी हैं या उन्हें इतना कमजोर कर दिया है कि उनका कोई अर्थ नहीं रह गया है । योग्यता नहीं, पहुंच काम कर रही है। शिकायत प्राधिकरण को दंतहीन बना दिया गया है ताकि सत्ताधारी दल के कृपापात्र पुलिस अधिकारियों पर कोई आंच न आए । राजनेताओं को अच्छी तरह पता है कि अगर पुलिस स्वतंत्र और कानून के प्रति जवाबदेह हो गई, तो उनके इशारे पर फर्जी मुकदमे कौन दर्ज करेगा और चुनाव में बाहुबल का खेल कौन खेलेगा?

पाठक को सोचने पर मजबूर करते कुछ प्रश्न

इन तमाम तथ्यों और विसंगतियों के बीच, कुछ व्यंग्यात्मक सवाल उठना लाजिमी हैं जो हर करदाता और नागरिक को स्वयं से और इस व्यवस्था से पूछने चाहिए:

  • जब देश 1947 में आज़ाद हो गया था, तो क्या यह आज़ादी केवल राजनेताओं और शीर्ष नौकरशाहों (काले अंग्रेजों) के लिए आई थी? एक आम सिपाही के लिए यह आज़ादी आज भी 1861 की उन जंजीरों में क्यों कैद है?
  • सरकारें ‘स्वदेशी’ का ढोल पीटते हुए आईपीसी (IPC) का नाम बदलकर बीएनएस (BNS) तो कर देती हैं, लेकिन जिस 1861 के पुलिस कानून ने भारतीयों का सबसे ज्यादा खून बहाया, उससे इतना मोह क्यों है? क्या यह सत्ता का वह ‘मीठा जहर’ है जिसे कोई भी राजनेता थूकना नहीं चाहता?
  • जो अधिकारी लाखों रुपये वेतन लेते हैं, जिनके लिए दफ्तरों में एसी लगे हैं, वे एक वर्दीधारी पुलिस कर्मी से अपने घर में कपड़े क्यों धुलवाते हैं? क्या उनका यह कृत्य संविधान की प्रस्तावना में लिखे ‘समता’ और ‘बंधुता’ के शब्दों का खुलेआम मज़ाक नहीं उड़ाता?
  • जब एक साधारण नागरिक बिना हेलमेट के सड़क पर निकलता है, तो कानून का डंडा तुरंत चलता है। लेकिन जब सत्ता में बैठे लोग और उच्च अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पुलिस मैनुअल की धज्जियां उड़ाते हैं, तो नियम अचानक मोम की तरह क्यों पिघल जाते हैं?
  • क्या न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी सचमुच अंधी है, या वह व्यक्ति की हैसियत और उसकी कुर्सी देखकर खिसक जाती है?

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भविष्य की राह और क्या उम्मीद बाकी है?

यह एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि लोकतंत्र के 75 से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद भी हम इस औपनिवेशिक हैंगओवर से बाहर नहीं निकल पाए हैं। 1861 का पुलिस एक्ट महज एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, यह एक ‘मानसिकता का घोषणापत्र’ है। यह घोषणापत्र यह तय करता है कि पुलिस जनता की मित्र (Community Policing) नहीं हो सकती, वह केवल सत्ता की लाठी हो सकती है ।

जब तक यह व्यवस्था कायम है, तब तक पुलिस हिरासत में मौतें (custodial deaths), आम जनता पर बर्बर लाठीचार्ज और सत्ता के इशारे पर काम करने की प्रवृति (political meddling) खत्म नहीं होगी । निचले स्तर के पुलिस कर्मियों को ‘गुलाम’ समझने की मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। ‘ऑर्डरली सिस्टम’ जैसी कुप्रथाओं को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से समाप्त कर, दोषी अधिकारियों पर आपराधिक कदाचार के तहत कार्रवाई होनी चाहिए ।

आगे की उम्मीद केवल एक ही दिशा में है—सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले को उसकी पूरी आत्मा के साथ लागू करना और 1861 के एक्ट को कूड़ेदान में डालकर एक नया, आधुनिक, नागरिक-केंद्रित ‘मॉडल पुलिस एक्ट’ संसद और विधानसभाओं से पारित करवाना ।

देश आजाद होने के 165 साल बाद भी यदि हम उन सड़े-गले कानूनों को ढो रहे हैं, तो यह हमारी राजनीतिक और सामाजिक चेतना की सबसे बड़ी हार है। आज भले ही व्यवस्था के चेहरे बदल गए हों, लेकिन जब तक पुलिस बल में समानता और स्वाभिमान नहीं होगा, जब तक कानून का तराजू हैसियत देखना बंद नहीं करेगा, तब तक पूर्ण स्वतंत्रता का अहसास एक छलावा ही रहेगा। असली स्वदेशी तब आएगा जब ‘काले अंग्रेजों’ के हाथ से वह ब्रिटिश डंडा हमेशा के लिए छीन लिया जाएगा और पुलिस वास्तव में जनता की रक्षक बनेगी।

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