Technology, स्मार्टफोन: क्या भारत बना पाएगा अपना ‘सैमसंग’ और ‘शाओमी’, 62,500 करोड़ रुपये की नई स्कीम से जगी उम्मीद – Homegrown Mobile Brands Micromax Lava To Get Benefits Mobile Manufacturing Subsidy Scheme — INA

सार

आज भारत स्मार्टफोन बनाने में चीन को टक्कर दे रहा है। एपल और सैमसंग जैसी बड़ी स्मार्टफोन निर्माता कंपनियों ने देश में अपने मेगा मैन्युफैक्टरिंग प्लांट लगाए हैं। लेकिन देश का ऐसा एक भी स्मार्टफोन ब्रांड नहीं है जो ग्लोबल लेवल पर इन कंपनियों को टक्कर देता हो। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा घोषित 62,500 करोड़ रुपये की योजना ने इस दिशा में उम्मीद की किरण जगाई है।

भारत में आज बिकने वाले लगभग 99 फीसदी से ज्यादा मोबाइल फोन देश में ही बनते हैं और स्मार्टफोन अब हमारा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट आइटम बन चुका है। लेकिन इस शानदार कामयाबी के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है। हम फोन तो करोड़ों बना रहे हैं, लेकिन उन पर नाम विदेशी कंपनियों का होता है। सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसी दिग्गज कंपनियों के बीच आज एक भी ऐसा भारतीय ब्रांड नहीं है जो वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सके।

इसी कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 62,500 करोड़ रुपये की ‘मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम’ पेश की है, जिसका मकसद केवल फोन असेंबल करना नहीं, बल्कि भारत का अपना मजबूत ग्लोबल ब्रांड खड़ा करना है।

असेंबली हब से ब्रांड का मालिक बनने की ओर भारत

पिछले एक दशक में भारत का मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 33 गुना और एक्सपोर्ट 165 गुना बढ़कर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, भारत में साल 2027 के मध्य तक पहला मजबूत स्वदेशी स्मार्टफोन ब्रांड देखने को मिल सकता है।

योजना के तहत योग्य भारतीय ब्रांड को बिक्री पर 5% प्रोत्साहन मिलेगा। भारतीय डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए अतिरिक्त 3% और घरेलू स्तर पर प्रमुख कंपोनेंट खरीदने पर 1.5% तक अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जा सकता है। यानी सरकार इस बार सिर्फ फैक्ट्रियां नहीं, बल्कि तकनीक और बौद्धिक संपदा (IP) का मालिकाना हक भारत में देखना चाहती है।

भारत पहले ही बन चुका है बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब

मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के मामले में भारत ने पिछले एक दशक में लंबी छलांग लगाई है। सरकार के अनुसार, देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 99.2% मोबाइल फोन भारत में ही बनाए जाते हैं।

मोबाइल फोन का निर्यात भी 2014-15 के करीब 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में लगभग 2.59 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसी अवधि में मोबाइल उत्पादन करीब 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 6.27 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी पीएलआई (PLI) योजना ने इस विस्तार में अहम भूमिका निभाई, जिसके तहत एपल, सैमसंग और कई अन्य कंपनियों ने भारत में उत्पादन बढ़ाया।

क्यों पिछड़े माइक्रोमैक्स और लावा?

साल 2015 के आसपास भारतीय बाजार में माइक्रोमैक्स, लावा, कारबन और इंटेक्स जैसी घरेलू कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 35 फीसदी थी। उस दौर में माइक्रोमैक्स सीधे सैमसंग को कड़ी टक्कर दे रहा था। लेकिन जैसे ही चीनी कंपनियों की एंट्री हुई, बाजार का पूरा गणित बदल गया। चीनी ब्रांड्स ने भारी निवेश, एडवांस सप्लाई चेन, बेहतरीन कैमरा तकनीक और आक्रामक कीमतों के दम पर भारतीय कंपनियों को बाजार से बाहर कर दिया। देखते ही देखते भारतीय ब्रांड्स की हिस्सेदारी सिमटकर एक फीसदी से भी कम रह गई।

भारतीय कंपनियों के लिए फिर जगी उम्मीद

मौजूदा समय में लावा (Lava) भारतीय बाजार में टिके रहने वाला सबसे प्रमुख देसी ब्रांड है, जो बजट सेगमेंट में तेजी से वापसी कर रहा है। कंपनी डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा पार्ट्स और पीसीबी जैसी तकनीकों में 1,100 करोड़ रुपये का नया निवेश कर रही है। वहीं दूसरी तरफ डिक्सन टेक्नोलॉजीज और माइक्रोमैक्स की पैरेंट कंपनी भगवती प्रोडक्ट्स जैसी भारतीय कंपनियां आज ग्रेटर नोएडा और अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण कर रही हैं। आज भारत के पास वह मजबूत मैन्युफैक्चरिंग बेस मौजूद है, जो एक दशक पहले नहीं था।

भरोसेमंद ब्रांड बनाने की होगी चुनौती

सरकारी प्रोत्साहन से उत्पादन बढ़ाना आसान हो सकता है, लेकिन उपभोक्ताओं के बीच एक भरोसेमंद ब्रांड बनाना ज्यादा मुश्किल है। सैमसंग और शाओमी जैसी कंपनियों ने वर्षों में सप्लायर नेटवर्क, सॉफ्टवेयर, कैमरा तकनीक और सेल्स नेटवर्क तैयार किया है।

इसलिए नई योजना में डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए मिलने वाला 3% प्रोत्साहन खास महत्व रखता है। अगर भारतीय कंपनियां इसका इस्तेमाल अपनी तकनीक, कैमरा प्रोसेसिंग, सॉफ्टवेयर, डिजाइन और पेटेंट विकसित करने में करती हैं, तो वे लंबे समय में अलग पहचान बना सकती हैं।

अगले पांच साल होंगे निर्णायक

सरकार को उम्मीद है कि योजना के पांच वर्षों में करीब 39 लाख करोड़ रुपये का कुल मोबाइल उत्पादन और 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा हो सकती हैं। हालांकि, इसकी सबसे बड़ी सफलता उत्पादन के आंकड़ों से तय नहीं होगी। असली कामयाबी तब मानी जाएगी जब भारत में बनी किसी भारतीय कंपनी का फोन ग्राहक सिर्फ इसलिए खरीदे क्योंकि वह बेहतर उत्पाद है।

भारत के पास अब मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, सप्लायर नेटवर्क और निर्यात का आधार मौजूद है। अगला कदम इन्हीं ताकतों को एक ऐसे भारतीय ब्रांड में बदलना है, जो सैमसंग, वीवो या शाओमी जैसी वैश्विक पहचान बना सके।

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