Tach – iPhone की कीमत देखकर हर साल चौंकते हैं? जानिए भारत में बनने के बाद भी ऐपल का फोन क्यों रहता है महंगा

इस साल के नए आईफोन की एंट्री हो गई है, और इस बार फिर ऐपल ने दाम के मामले में लंबी छलांग लगाई है. भारत में आईफोन बनने के बावजूद कीमतें इतनी ऊंची क्यों रहती हैं? यह सवाल लगभग हर आईफोन खरीदने और न खरीदने वाले दोनों के मन में आता है. ऐपल हर साल नए मॉडल लाती है और दाम भी पहले से ज्यादा रखती है. हाल ही में लॉन्च हुए आईफोन 18 प्रो, आईफोन 18 प्रो मैक्स और कंपनी के पहले फोल्डेबल फोन आईफोन डुओ ने फिर से इसी चर्चा को शुरू कर दिया है.

आईफोन 18 प्रो की शुरुआत भारत में 1,64,900 रुपये से हो रही है. आईफोन 18 प्रो मैक्स 1,79,900 रुपये से शुरू होता है. सबसे महंगा आईफोन डुओ है, जिसकी कीमत 2,99,900 रुपये से शुरू हो रही है. ये दाम अमेरिका की तुलना में काफी ज्यादा हैं. लोग सोचते हैं कि जब फोन भारत में ही असेंबल हो रहा है तो इतना महंगा क्यों?

असल में भारत में आईफोन का ज्यादातर काम असेंबली तक सीमित है. पूरा फोन यहां नहीं बनता. प्रोसेसर, डिस्प्ले, कैमरा सेंसर और मेमोरी जैसे महंगे पार्ट्स अभी भी बाहर से आते हैं-ताइवान, साउथ कोरिया, जापान या चीन से. इन पार्ट्स पर इंपोर्ट ड्यूटी लगती है. उसके बाद पूरे फोन पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी जुड़ जाता है. इन टैक्सों और ड्यूटी की वजह से आखिरी कीमत काफी बढ़ जाती है. कुछ अनुमानों के मुताबिक आईफोन की कीमत का 30-40 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ टैक्स और ड्यूटी का होता है.

ऐपल की अपनी रणनीति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है. कंपनी अपने प्रॉडक्ट को प्रीमियम ब्रांड के रूप में रखती है. सस्ता करके ज्यादा संख्या में बेचने की बजाय ऊंची कीमत पर कम लेकिन अमीर ग्राहकों को टारगेट करती है.

स्टेटस सिंबल फोन सस्ता होना मुमकिन नहीं

भारत जैसे बाजार में आईफोन को स्टेटस सिंबल माना जाता है. इसलिए ऐपल कीमत कम करने पर जोर नहीं देती. हर साल नए फीचर्स- बेहतर कैमरा, तेज प्रोसेसर, एआई फीचर्स जोड़कर दाम और बढ़ा दिए जाते हैं.

आईफोन 18 सीरीज में A20 प्रो चिप, वैरिएबल एपर्चर कैमरा और लंबी बैटरी लाइफ जैसे अपग्रेड आए हैं. आईफोन डुओ तो बिल्कुल नया फॉर्म फैक्टर है. फोल्डेबल स्क्रीन, बड़े डिस्प्ले और खास डिजाइन की वजह से इसकी कीमत और ऊंची रखी गई है. नई टेक्नोलॉजी पर रिसर्च और डेवलपमेंट का खर्च भी ग्राहकों से वसूला जाता है.

लोकल मैन्युफैक्चरिंग से ऐपल को फायदा जरूर होता है. टैरिफ बचते हैं, सप्लाई चेन मजबूत होती है और निर्यात आसान होता है. लेकिन ये बचत पूरी तरह ग्राहक तक नहीं पहुंचती. कंपनियां अपनी मार्जिन बनाए रखती हैं. रुपये की कमजोरी भी कीमत बढ़ाने में योगदान देती है क्योंकि इंपोर्टेड पार्ट्स डॉलर में आते हैं.

महंगे आईफोन का सिलसिला हर साल बढ़ता है

हर साल महंगे मॉडल लाने की आदत ऐपल की पुरानी है. नई टेक्नोलॉजी, बेहतर परफॉर्मेंस और ब्रांड वैल्यू बनाए रखने के लिए कीमतें बढ़ती रहती हैं. भारत में उत्पादन बढ़ने से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन टैक्स सिस्टम और इंपोर्टेड कंपोनेंट्स की निर्भरता बनी रहने तक आईफोन सस्ता होना मुश्किल है.

तो अगली बार जब नया आईफोन देखें और दाम देखकर हैरान हों तो याद रखें- भारत में बनना सिर्फ असेंबली है. असली लागत टैक्स, इंपोर्टेड पार्ट्स और ऐपल की प्रीमियम सोच में छिपी होती है. आईफोन 18 और डुओ भी इसी ट्रेंड को आगे बढ़ा रहे हैं. कीमतें ऊंची रहेंगी, जब तक पूरा सप्लाई चेन लोकल न हो जाए या टैक्स स्ट्रक्चक न बदले.


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