लघु कविता: पश्चाताप एक कोतवाल का

माना कि मै थोड़ा स्वार्थी रहा हूँ,
थोड़ा कठोर तो कभी सनकी रहा हूँ,
कोतवाल की कुर्सी पर बैठकर,
जाने-अनजाने मै कितनों के दिलों पर चोट कर गया हूँ।
कभी ड्यूटी के नाम अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को सताया,
तो कभी मिलने के लिए जनता के लोगो को घण्टो इंतज़ार करवाया,
अफसोस है। कि मै कभी अधिनस्थो की मजबूरी समझ नही पाया,
कभी अपने ही माहतहतो को अँजाने मे मैंने रुलाया।
कुछ फैसले सही थे, कुछ गलत भी हुए मुझसे,
कुछ विभाग के फर्ज निभाए, कुछ रिश्ते पीछे छूटे अपने,
कभी किसी की आँखों में आँसू आए,
तो कभी किसी के सपने भी टूटे मेरी वजह से,
कभी मैंने अपने ही बंधुओ की रपट लिखाई,
कभी मैंने उनको हड़काया,
तो कभी उनका वेतन कटवाया।
कभी मैंने उनका हक खाया।
तो कभी जान बुझ कर उन्हे छुट्टी के लिए रुलाया।
उम्र भर भागता रहा हूँ। मै धन दौलत के पीछे,
मुझे क्या मालूम था, कि पैसा नही बल्कि कर्म साथ देंगे मेरा,
मुझे ग़लत फहमी थी, यह कि कुर्सी मेरे साथ ही जायेगी,
अब मालूम पड़ रहा है, कि यह तो बेवफा है,कुछ दिन बाद किसी और की हो जायेगी।
दीवानगी भी ज्यादा ठीक नही होती यारों इस कुर्सी की,
लोग तो जवानी मे धोख़ा खाते है।
बस हम इस उमर मे खा रहे है।अब होने वाली है,उम्र मेरी फिफ्टी एट, इसलिए अब करने वाला हूँ,
मै 58 वे जन्म दिन की सेरेमनी मे आप सभी को शैलीब्रेट
हालाँकि 57 वा जन्मदिन भी मैंने थाने मे मनाया था,*मेरा जन्म दिन था बिंदास, जिसमे शामिल हुए थे मेरे, थाने के हेड मोहरिर, ड्राइवर, हमराह,और कारखास। 🤩
मुहब्बत काश खुदा से करता तो, आज शायद कुर्सी छुट जाने के डर से मै हर रोज तिल-तिल कर ना मरता।
अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो मुझे अपना अतीत नजर आता है।
हर गलती मन के भीतर दस्तक देती है,
हर चेहरा मुझे अब मेरा सच बताता है।
मुझे नींद भी नही आ रही आज कल रात मे,
क्यूँकि 58 उम्र बरस आ गई जो पास मे,
बस इसी कारण आ गया हूँ, मै अब जजबात मे।
आ जाऊंगा 60 बरस के पार मै,
फिर सीनियर सिटीजन कहलाऊंगा ,और डींगे हाकुंगा दिन रात मै,
लोग कहेंगे कि खुसट हूँ मै, इसलिए सठिया जाता हूँ, हर बात मे,
58 पार होने पर कुर्सी ना होगी पास मे,
तो हो जाऊंगा बहुत उदास मै,
इंस्पेक्टर क्राईम न बनूँगा, ना जाऊंगा IT सेल मे, ऑफिस मे जगह पकड़ूँगा, रीडर गिरी पकडू ,IGRS सेल या फिर विशेष जाँच प्रकोष्ठ, या फिर मानवाधिकार सेल मे।
अब आप ही बताओ, क्यूँकि आप ही हो सब मेरे सबसे अच्छे दोस्त।
हालाँकि न पूरी तरह अच्छा हूँ, न पूरी तरह बुरा हूँ,
बस कर्तव्य और तलक मिजाजी के बीच अकेला खड़ा हूँ।
जो बीत गया, उसे बदल भी नहीं सकता मै,
पर आज से थोड़ा बेहतर पुलिसकर्मी बनने की हूँ, मै फिराक मे।
कविता उम्र के 58 बरस के नजदीक लगे सभी कोतवालो को सादर समर्पित।
यह एक हास्य कविता है। कृपया इसे गंभीरता से ना ले ,बल्कि इस कविता के माध्यम से INA न्यूज की सुबह की सुहानी शुरुवात मे पढ़कर आनंद ले। बस जुड़े रहिए INA न्यूज से ।🤠