आगरा बकरा मंडी: 45 डिग्री के ‘स्मार्ट सिटी’ में इंसान और बेजुबान पानी की एक बूंद को मोहताज

आगरा ( मोहम्मद शाहिद की कलम से ): उत्तर प्रदेश का आगरा शहर, जिसे दुनिया उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव, विशेषकर ताजमहल के लिए जानती है, वर्तमान में एक भीषण प्रशासनिक और ढांचागत विफलता का गवाह बन रहा है। ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का पर्व बेहद करीब है और इस अवसर पर आगरा के सबसे पुराने और प्रमुख बाजारों में शुमार मीरा हुसैनी चौराहा, ईदगाह, तोरा मंडी, ताजगंज और हींग की मंडी जैसे इलाकों में बकरा बाजार पूरी तरह से सज चुके हैं । दूर-दराज के गांवों से किसान और पशुपालक अपने जानवरों को बेचने के लिए इस उम्मीद से महानगर का रुख कर रहे हैं कि उनकी साल भर की मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा।

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​लेकिन इस व्यापारिक और सांस्कृतिक उत्सव के बीच जो जमीनी तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह बेहद चिंताजनक और गंभीर है। मई 2026 की जानलेवा गर्मी, जिसमें आगरा का तापमान 45.4 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है, के बीच किसानों और उनके जानवरों को पीने के पानी की एक बूंद तक मयस्सर नहीं है । शासन और प्रशासन, जो ‘स्मार्ट सिटी’ के करोड़ों रुपये के विज्ञापनों और दावों के पीछे छिपने का आदी हो चुका है, एक बार फिर जमीनी स्तर पर पूरी तरह से फेल होता नजर आ रहा है। हजारों की संख्या में खरीदार और विक्रेता इस मंडी में इकट्ठा हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने इंसान तो दूर, बेजुबान जानवरों के लिए भी पीने के पानी के एक साधारण टैंकर तक का इंतजाम नहीं किया है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक उदासीनता का चरम है, बल्कि एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और हमारी मानवीय संवेदनाओं पर सीधा और तीखा प्रहार है।

​आगरा में बकरीद से पहले लगने वाले बकरा बाजारों का एक लंबा और ऐतिहासिक इतिहास रहा है। यह केवल एक व्यापारिक गतिविधि नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो सीधे तौर पर किसानों की आजीविका से जुड़ा है। ईद-उल-अजहा के नजदीक आते ही शहर के विभिन्न हिस्सों में शनिवार शाम से ही खरीदारों और विक्रेताओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी है । मुख्य रूप से मीरा हुसैनी चौराहा बकरा मंडी जो शहर के सबसे पुराने और तंग इलाकों में से एक है, के अलावा ईदगाह, तोरा मंडी, ताजगंज में ये अस्थाई बाजार लगाए गए हैं । इन मंडियों में आने वाले व्यापारी और किसान मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती ग्रामीण इलाकों से आते हैं। धौलपुर, राजाखेड़ा, भरतपुर, हरियाणा और पलवल जैसे सुदूर इलाकों से पशुपालक अपने बकरों के साथ इस बाजार में पहुंचे हैं ।

इन किसानों की दिनचर्या और उनके कठोर संघर्ष को समझे बिना इस मंडी की वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। ये किसान अपने गांवों से दोपहर चार बजे पैदल या छोटे मालवाहक वाहनों में अपनी यात्रा शुरू करते हैं और शाम सात बजे तक आगरा की इन मंडियों में पहुंचते हैं। इस लंबी, धूल भरी और थका देने वाली यात्रा के बाद, जब वे शहर के बाजार में कदम रखते हैं, तो उन्हें उम्मीद होती है कि महानगर का प्रशासन उन्हें कम से कम बुनियादी सुविधाएं तो प्रदान करेगा। मंडी में लाखों-करोड़ों रुपये का व्यापार होता है। बाजार में राजस्थानी नस्ल के ‘तोतापरी’ बकरों की भारी मांग देखी जा रही है, जिन्हें खरीदार उनकी शानदार ऊंचाई और लंबे कानों के कारण काफी पसंद कर रहे हैं । राजस्थान से आए एक व्यापारी पप्पू खान ने ‘सोयत’ नाम का एक विशेष बकरा बाजार में उतारा है, जिसकी कीमत सत्तर हजार रुपये रखी गई है, जबकि सामान्य तौर पर बाजार में बकरों की कीमतें ग्यारह हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक जा रही हैं ।

समस्या का सबसे दर्दनाक और स्याह पहलू यह है कि इतनी बड़ी आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधि के बावजूद, बाजार में बुनियादी सुविधाओं का पूर्ण अभाव है। इस्लामिया लोकल एजेंसी के पूर्व चेयरमैन असलम कुरैशी ने प्रशासन से स्पष्ट और लिखित मांग की थी कि सभी बकरा मंडियों में पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया जाए ।

समाजसेवी हिमायूँ कुरैशी ने मांग की नगर निगम तथा जल निगम के माध्यम से साफ-सफाई, टूटी स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत और व्यापारियों व उनके जानवरों के लिए पानी के टैंकरों की व्यवस्था की जाए । बावजूद इसके, प्रशासन की तरफ से कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

मंडियों में हजारों लोग और जानवर खुले आसमान के नीचे तपती सड़क पर मौजूद हैं। मई 2026 की चिलचिलाती गर्मी में, जब पूरा उत्तर प्रदेश भीषण हीटवेव की चपेट में है, पानी का न होना एक जानलेवा स्थिति पैदा कर रहा है। एक पानी का टैंकर तक मंडी में नहीं पहुंचाया गया है। किसान अपने साथ लाए हुए सीमित पानी के सहारे खुद को और अपने जानवरों को जिंदा रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं। प्रशासन की यह विफलता कोई तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि यह उस ग्रामीण और असंगठित वर्ग के प्रति गहरी संवेदनहीनता को दर्शाती है, जिनकी आवाज सत्ता के वातानुकूलित गलियारों तक नहीं पहुंच पाती।

​इस पूरी घटना का अगर विस्तार से और गहनता से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक मंडी में पानी न होने की साधारण खबर नहीं है। यह भारत के वर्तमान शहरी शासन मॉडल, ‘स्मार्ट सिटी’ की खोखली अवधारणा और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति संस्थागत क्रूरता का एक बेहद परेशान करने वाला प्रमाण है। इसके निहितार्थ कई स्तरों पर समझे जा सकते हैं, जो हमारे विकास के दावों की पोल खोलते हैं।

​सबसे पहले जलवायु और मौसम की उस मार को समझना होगा जिसने इस समस्या को जानलेवा बना दिया है। मई 2026 में भारत एक अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रहा है। मौसम विभाग ने पूरे उत्तर प्रदेश में गंभीर लू का रेड अलर्ट जारी किया है । आगरा का तापमान 45.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है, जबकि राज्य के अन्य हिस्सों जैसे बांदा में यह 46.8 डिग्री तक पहुंच चुका है । मौसम विज्ञानियों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के भौगोलिक स्वरूप और राजस्थान से आने वाली गर्म और शुष्क हवाओं के कारण यह क्षेत्र हीटवेव का केंद्र बन गया है । इस चिलचिलाती गर्मी का आलम यह है कि आगरा में पर्यटकों की संख्या आधी रह गई है और संगमरमर से बने ताज महल पर नंगे पैर चलना असंभव हो गया है । जब ताज महल देखने आए सुविधा-संपन्न पर्यटक इस गर्मी से बेहाल हैं, तो सोचिए कि खुले आसमान के नीचे डामर की सड़क पर खड़े उन मूक जानवरों और किसानों की क्या स्थिति होगी। एक अध्ययन के अनुसार, हीटवेव के कारण भारत में श्रम घंटों का भारी नुकसान हो रहा है और आगरा उन शहरों में शामिल है जो सबसे अधिक जलवायु संकट का सामना कर रहे हैं । इतने भयंकर पर्यावरणीय संकट के दौरान, जल आपूर्ति कोई विलासिता नहीं बल्कि जीवन रक्षा का मूल अधिकार है।

​इस प्यास और तड़प के बीच, आगरा के ‘स्मार्ट सिटी’ होने के दावों का विश्लेषण करना भी उतना ही आवश्यक है। आगरा को भारत सरकार के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी मिशन के तहत चुना गया था, जिसका उद्देश्य नागरिकों को सुरक्षित वातावरण, अत्याधुनिक तकनीक, और सुदृढ़ जल प्रशासन प्रदान करना है । आगरा स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के तहत पानी की आपूर्ति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए हैं। चौंतीस बिलियन रुपये की लागत वाली आगरा जल आपूर्ति परियोजना और एक सौ चालीस क्यूसेक पानी लाने वाले ‘गंगाजल प्रोजेक्ट’ का ढिंढोरा पीटा गया है । इन परियोजनाओं के दस्तावेजों में चौबीसों घंटे जल आपूर्ति और उन्नत तकनीक के माध्यम से पानी के वितरण की बात कही गई है । शहर में एक ‘इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर’ भी बनाया गया है ताकि नागरिक सुविधाओं की निगरानी की जा सके ।

​लेकिन इस भारी-भरकम ‘स्मार्टनेस’ का फायदा किसे मिल रहा है? जब एक शहर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी एक ऐतिहासिक चौराहे पर लगने वाली सालाना मंडी में पीने के पानी का एक साधारण टैंकर, जिसकी क्षमता मात्र पांच हजार लीटर होती है, उपलब्ध नहीं करा सकता, तो उस विकास मॉडल की नीयत पर सवाल उठना लाजमी है । सच्चाई यह है कि आगरा में सौ से अधिक इलाकों में पहले से ही पेयजल संकट चल रहा है, पाइपलाइनों में लीकेज के कारण हजारों लीटर गंगाजल सड़कों पर बर्बाद हो रहा है, और नगर निगम की टैंकर व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है । जहां एक ओर स्मार्ट सिटी के नाम पर वीआईपी इलाकों और मुख्य मार्गों पर हरियाली बनाए रखने के लिए पानी का छिड़काव किया जा रहा है , वहीं असंगठित क्षेत्र की इस मंडी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। यह नगर निगम की केवल लापरवाही नहीं है, बल्कि आपराधिक अनदेखी है जो हीटस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को खुला निमंत्रण दे रही है।

​इस प्रशासनिक विफलता का एक कानूनी और नैतिक पहलू भी है जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत ‘पशु बाजार नियम’ बनाए गए हैं । इन संघीय नियमों के अनुसार, किसी भी पशु बाजार में जानवरों के लिए पर्याप्त और स्वच्छ पानी की आपूर्ति, जानवरों को पानी पिलाने के लिए पानी की टंकियां और बाल्टियां, पर्याप्त छाया और वेंटिलेशन, तथा जानवरों को रखने के लिए उचित स्थान होना कानूनी रूप से अनिवार्य है ।

​आगरा प्रशासन इन सभी कानूनों का खुलेआम उल्लंघन कर रहा है। जिला पशु बाजार निगरानी समिति, जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि इन बाजारों में जानवरों के कल्याण के सभी उपाय लागू हों, पूरी तरह से निष्क्रिय और नदारद नजर आती है । जब प्रशासन स्वयं ही कानून का पालन नहीं कर रहा है, तो आम नागरिकों से किस प्रकार की व्यवस्था की उम्मीद की जा सकती है? बिना छाया और बिना पानी के 45 डिग्री की गर्मी में जानवरों को खड़ा रखना संस्थागत क्रूरता का चरम है। ग्रामीण इलाकों में किसान इन बकरों को अपने बच्चों की तरह पालते हैं। उन्हें तीन साल तक अनाज, काजू और चना खिलाकर बड़ा किया जाता है । जब वे किसान अपने इन जानवरों को लेकर शहर आते हैं, तो इस उम्मीद में आते हैं कि उन्हें उनके धैर्य और मेहनत का फल मिलेगा। लेकिन शहर में प्रवेश करते ही उन्हें एहसास दिलाया जाता है कि इस शहरी व्यवस्था में उनकी हैसियत दोयम दर्जे की है। उनसे और उनकी आर्थिक गतिविधियों से बाजार गुलजार हो सकते हैं, लेकिन उन्हें एक सभ्य नागरिक की तरह पीने का पानी देने की जरूरत महसूस नहीं की जाती।

​यह रवैया स्पष्ट करता है कि हमारा ढांचागत विकास केवल उन लोगों के लिए काम करता है जो सत्ता के करीब हैं या जो वातानुकूलित कमरों में बैठते हैं। फुटपाथों और चौराहों पर अपना पसीना और माल बेचने वाले किसानों के लिए यह व्यवस्था पूरी तरह से अंधी, बहरी और संवेदनहीन है। प्रशासन की फाइलों में विकास की नदियां बह रही हैं, लेकिन हकीकत की जमीन इतनी सूखी है कि वहां इंसानियत भी प्यास से दम तोड़ रही है।

​जब जानकारियां इतनी नकारात्मक और परेशान करने वाली हों, तो सीधे और सपाट बयानों से काम नहीं चलता। इस खोखले प्रशासनिक ढांचे से कुछ ऐसे सवाल पूछना अनिवार्य हो जाता है जो पाठक, समाज और सत्ता की अंतरात्मा को झकझोर दें।

​क्या विकास का पानी केवल फाइलों में, सरकारी विज्ञापनों में और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन में ही बहता है? चौंतीस सौ करोड़ रुपये की जल आपूर्ति परियोजना वाले उस ‘स्मार्ट शहर’ में, जहां हर दिन स्मार्टनेस का नया दावा किया जाता है, क्या एक साधारण से चौराहे तक पानी का एक टैंकर पहुंचाने के लिए भी किसी विदेशी फंड या विश्व बैंक के कर्ज की आवश्यकता पड़ेगी?

​आप सोचिए, क्या प्रशासन यह मान बैठा है कि गांव से आने वाले किसान और उनके जानवर प्रकाश संश्लेषण से अपनी प्यास बुझा लेंगे? तड़के चार बजे से रात सात बजे तक का लंबा और थका देने वाला सफर करने वाले किसानों के लिए प्रशासन की क्या योजना है? क्या उन्हें इस देश का ‘आत्मनिर्भर’ नागरिक बनने की सजा दी जा रही है कि वे अपनी प्यास का इंतजाम भी खुद ही करें?

​स्मार्ट सिटी के चौराहों पर लगे उन हाई-डेफिनिशन कैमरों का क्या फायदा, जिनमें हेलमेट न पहनने पर आम आदमी का चालान तो तुरंत कट जाता है, लेकिन क्या उन कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के कैमरों में 45.4 डिग्री की चिलचिलाती गर्मी में हांफते हुए जानवर और डिहाइड्रेशन का शिकार होते किसान नजर नहीं आते? क्या कैमरों की नजर भी अब वर्ग और रुतबा देखकर अपनी फोकस तय करती है?

​क्या हमारी व्यवस्था की संवेदनशीलता केवल वातानुकूलित कमरों और वीआईपी इलाकों तक ही सीमित रह गई है? एक तरफ ताजमहल में जब विदेशी पर्यटकों को गर्मी लगती है तो वह राष्ट्रीय खबर बन जाती है, प्रशासन तुरंत हरकत में आ जाता है । वहीं दूसरी तरफ शहर के बीचों-बीच खुले आसमान के नीचे हजारों किसान और लाखों के जानवर उबल रहे हैं, लेकिन प्रशासन के माथे पर शिकन तक नहीं है। क्या इस देश में इंसान और जानवर की कीमत उस जगह से तय होती है जहां वे खड़े हैं?

​और वे पशु क्रूरता निवारण कानून, जिन पर लंबी-लंबी बहसें होती हैं, क्या सिर्फ किताबों में सजाने और सेमिनारों में पढ़ने के लिए बनाए गए हैं? यदि कोई आम नागरिक अपने जानवर को एक दिन बिना पानी के रखे, तो उस पर क्रूरता का मुकदमा दर्ज हो सकता है, उसे जेल भेजा जा सकता है। तो क्या इस बड़े पैमाने पर हो रही संस्थागत क्रूरता के लिए आगरा के जिम्मेदार अधिकारियों, नगर आयुक्त और जल निगम के अधिकारियों पर मुकदमा नहीं होना चाहिए? आखिर व्यवस्था का यह मौन किसे बचा रहा है? बाकायदा लिखित मांग करने के बावजूद साफ-सफाई और पानी का प्रबंध न करना क्या यह नहीं दर्शाता कि प्रशासन इन असंगठित बाजारों से पल्ला झाड़ना चाहता है या फिर उसे इस वर्ग की परवाह ही नहीं है?

​आगरा के मीरा हुसैनी चौराहे बकरा मंडी और शहर की अन्य बकरा मंडियों में पानी का न होना केवल एक ढांचागत विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारी एक गहरी नैतिक और प्रशासनिक हार है। यह उस पूरी व्यवस्था की नाकामी का क्रूर प्रदर्शन है जो स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया और विश्व स्तरीय सुविधाओं के नारों के बीच अपनी सबसे बुनियादी जिम्मेदारी को भूल चुकी है। एक सरकार और प्रशासन का सबसे पहला काम अपने नागरिकों और मूक पशुओं को पीने का पानी और जीवन जीने की न्यूनतम स्थितियां उपलब्ध कराना है।

​वर्तमान स्थिति इस बात की गवाही देती है कि जब विकास की नीतियां जमीन से कटकर वातानुकूलित कमरों में बनती हैं और उनका क्रियान्वयन एक संवेदनहीन नौकरशाही के हाथों में होता है, तो उसका सबसे बड़ा खामियाजा समाज के उस तबके को भुगतना पड़ता है जो सबसे अधिक मेहनतकश और हाशिए पर है। पैंतालीस डिग्री से अधिक के भीषण तापमान में, बिना किसी पानी और छाया के इन मंडियों का संचालन होना, न केवल मानवाधिकारों और पशु अधिकारों का घोर उल्लंघन है, बल्कि यह एक सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा है।

​जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और सत्ता से कड़े सवाल नहीं पूछे जाएंगे, स्थिति में सुधार की उम्मीद करना बेमानी है। प्रशासन को यह समझना ही होगा कि ‘स्मार्टनेस’ केवल तकनीक, कैमरों, चौड़ी सड़कों और विदेशी फंड से चलने वाले प्रोजेक्ट्स में नहीं है। असली स्मार्टनेस शासन की उस संवेदनशीलता में बसती है जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति और उसके बेजुबान जानवर की प्यास को महसूस कर सके।

​आने वाले समय में यह अत्यंत आवश्यक है कि नगर निगम, जल निगम और जिला प्रशासन अपनी गहरी नींद से जागें। त्योहारों, मेलों और आयोजनों के समय विशेष प्रोटोकॉल केवल वीआईपी दौरों के लिए ही नहीं, बल्कि आम जनता की बुनियादी जरूरतों के लिए भी समान रूप से लागू होने चाहिए। पशु बाजार के नियमों का सख्ती से और बिना किसी भेदभाव के पालन किया जाना चाहिए। जो अधिकारी या संस्थाएं इन बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने में विफल रहती हैं, उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य के लिए एक नजीर बन सके।

​अंततः, गांव से घण्टो का कठिन सफर तय करके आए उस किसान का धैर्य और उसके जानवरों की मूक सहनशीलता ही इस क्रूर और अंधी व्यवस्था को आज आईना दिखा रही है। प्रशासन भले ही इस बार पूरी तरह से फेल हो गया हो, लेकिन यह उम्मीद की जानी चाहिए कि समाज और जागरूक नागरिक इस खोखली व्यवस्था से सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे। क्योंकि जिस दिन सवाल पूछना बंद हो जाएगा, उस दिन न केवल इन मंडियों का पानी सूखेगा, बल्कि हमारे लोकतंत्र की बची-खुची मानवीय संवेदना भी पूरी तरह से वाष्पीकृत हो जाएगी। जब तक आम आदमी के पसीने और उसकी प्यास का हिसाब नहीं मांगा जाएगा, तब तक ‘स्मार्ट सिटी’ के बोर्ड के नीचे खड़ा आम नागरिक हमेशा ठगा सा महसूस करता रहेगा। शहर को स्मार्ट बनाने से पहले व्यवस्था को मानवीय बनाना होगा, अन्यथा हमारी सारी तरक्की केवल फाइलों का पेट भरेगी, इंसान की प्यास नहीं बुझा पाएगी।

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