Nation- लाहौर से अमृतसर… एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी ने बचाई जान, खुद बॉर्डर तक छोड़ने आया; विद्या सागर ने बयां किया बंटवारे का दर्द- #NA

30 नवंबर 1932 को अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मे विद्या सागर गुप्त की कहानी उस दौर की भयावहता और मानवीय हिम्मत का जीवंत दस्तावेज है. 1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन न केवल एक भौगोलिक रेखा थी, बल्कि लाखों परिवारों के सपनों, रिश्तों और जड़ों को उखाड़ने वाली त्रासदी थी. विद्या सागर गुप्त और उनका परिवार इस आग में झुलसे, लेकिन हार न मानते हुए लखनऊ में नई जिंदगी की नींव रखी. उनकी कहानी, जो उनकी पुस्तक स्मृतियां में लिपिबद्ध है, न केवल विभाजन की पीड़ा को दर्शाती है, बल्कि एक नई शुरुआत की उम्मीद भी जगाती है.

हौर के रेलवे रोड पर गांधी स्क्वायर मोहल्ले में करीब 700 घरों के बीच विद्या सागर का परिवार बसा था. उनके पिता हरभज राम एक सफल व्यवसायी थे. दो फैक्ट्रियां, दो दुकानें और दो कोठियां यह उनकी मेहनत और समृद्धि का प्रतीक था. हरभज राम अक्सर दोस्तों से कहते, हम लाहौर छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. यह उनके शहर से गहरे लगाव का सबूत था, लेकिन 1947 की गर्मियां उस सपने को राख करने वाली थीं. 14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत को आजादी मिली, लेकिन आजादी की खुशी से पहले ही लाहौर की गलियों में खून की नदियां बहने लगीं.

16 अगस्त 1947 की सुबह 8 बजे, हरभज राम के दोस्त और मुस्लिम पुलिस अधिकारी उनके घर पहुंचे. उनकी आवाज में गंभीरता थी. उन्होंने चेतावनी दी, गोपनीय सूचना है कि एक हफ्ते के भीतर तुम्हारे पूरे परिवार का कत्ल हो सकता है. आज दोपहर 2 बजे हिंदू पुलिस का काफिला अमृतसर जाएगा और मैं उसका इंचार्ज हूं. अपनी दो कारों में परिवार को लेकर मुगलपुरा रेलवे स्टेशन पहुंचो, मैं तुम्हारी गाड़ियों को काफिले में शामिल कर दूंगा.

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खौफ का सफर लाहौर से अमृतसर

विद्या सागर गुप्त बताते हैं कि समय कम था. दोपहर 12 बजे तक घर में मौजूद नकदी और जेवर समेटकर निकल पड़ा. उस समय विद्या सागर केवल 15 साल के थे. लाहौर से अमृतसर का 60 किलोमीटर का सफर एक यातना बन गया. रास्ते में हजारों शव बिखरे पड़े थे. हरवंशपुरा, जल्लो और वाघा बॉर्डर तक सड़कें लाशों से अटी थीं. सेना की गाड़ियां पहले शव हटातीं, फिर काफिला आगे बढ़ता. डर का आलम यह था कि हर पल लगता था, शायद अगला नंबर उनका हो. पांच घंटे की इस यात्रा में परिवार ने मौत को करीब से देखा. अमृतसर पहुंचकर परिवार ने अपनी बहन के घर दो दिन गुजारे. वहां से वे लखनऊ पहुंचे, जहां उनके रिश्तेदार थे. लखनऊ उनके लिए नई उम्मीद की किरण बनकर उभरा.

लखनऊ में नई शुरुआत, नई चुनौतियां

लखनऊ में हरभज राम ने ऐशबाग में एक नई फैक्ट्री शुरू की. परिवार के पास लाहौर से लाए गए कैश और जेवर ने इस शुरुआत में मदद की. धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी, लेकिन 1959 में एक सड़क दुर्घटना में हरभज राम का निधन हो गया. इस दुख ने परिवार को झकझोर दिया, लेकिन विद्या सागर ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने अपने पिता की स्मृति में 1960 में एक अस्पताल बनवाया, जो उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक था.

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विद्या सागर गुप्त ने न केवल परिवार को संभाला, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोगी रहे विद्या सागर तीन बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए. राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त करने वाले विद्या सागर आज भी प्राविधिक शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं. इसके अलावा, वे 1973 से लखनऊ की रंगमंच संस्था दर्पण का नेतृत्व कर रहे हैं, जो कला और संस्कृति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘स्मृतियों में विभाजन की त्रासदी’ और अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्ज किया है. यह पुस्तक न केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा को बयां करती है, बल्कि उस दौर के लाखों लोगों की पीड़ा को भी उजागर करती है.

विद्या सागर गुप्त बताते हैं सितंबर 2012 में अपने परिवार के साथ लाहौर लौटे. परिवार उस कोठी, फैक्ट्री और दुकानों को देखने को उत्सुक था, जो कभी उनका घर था. चार दिन के इस सफर में उन्होंने उस कोठी को देखा, जिसे छोड़कर उन्हें भागना पड़ा था. वहां रह रहे परिवार से उनकी बातचीत हुई. छह महीने बाद, उस परिवार ने उन्हें वॉट्सऐप पर एक तस्वीर भेजी, जिसमें कोठी पर विद्या सागर के नाम की नेमप्लेट लगी थी. यह दृश्य उनके लिए भावुक कर देने वाला था. आंसुओं के बीच लाहौर की स्मृतियां फिर तैरने लगीं.

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एक अनवरत पीड़ा विद्या सागर गुप्त की कहानी केवल उनकी नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है, जिन्होंने विभाजन की आग में अपने सपनों को जलते देखा. लाहौर की कोठियां, फैक्ट्रियां और जड़ें छोड़कर भागना आसान नहीं था, लेकिन विद्या सागर और उनके परिवार ने हार नहीं मानी. लखनऊ में उन्होंने न केवल अपने लिए एक नई जिंदगी बनाई, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बने. आज भी, जब विद्या सागर लाहौर की बात करते हैं, उनकी आंखों में एक उदासी तैरती है, लेकिन उनकी कहानी यह सिखाती है कि विपत्ति कितनी भी बड़ी हो, हिम्मत और मेहनत से नई शुरुआत हमेशा संभव है.

लाहौर से अमृतसर… एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी ने बचाई जान, खुद बॉर्डर तक छोड़ने आया; विद्या सागर ने बयां किया बंटवारे का दर्द

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