सीजी- Exclusive: अंग्रेजों के जमाने की है रायपुर की ये जेल; यहीं पर कैद थे वीर नारायण, यहां छिपा है एतिहासिक रहस्य – INA

British-era prison in Raipur: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेकाहारा चौक के पास एक सेंट्रल जेल है। इसे सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन यहां पर एक और पुरानी जेल भी है। इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं। अधिकांश रायपुरियंस को नहीं मालूम है कि यहां पर अंग्रजों के जमाने का एक और जेल भी हैं। इसे 1857 की क्रांति का जेल कहते हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के दौर में रायपुर शहर का वर्तमान सेंट्रल जेल अस्तित्व में नहीं था, क्योंकि रायपुर की केंद्रीय जेल 1862 में बनी थी। उसके पहले भी एक जेल थी जिसे सन् 1857 की क्रांति का जेल कहते हैं। 

अंग्रेजों ने इस पुरानी जेल को 1854 में बनवाया था। खास और बड़ी बात यह है कि इसी जेल के आस-पास छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह को फांसी दी गई थी। इसके साथ ही यहां पर 17 और क्रांतिकारियों को भी फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। प्रदेश की एतिहासिक पहचान वाली यह धरोहर अब खंडहर में तब्दील होती जा रही है। इस एतिहासिक इमारत को बचाने के लिये कोई पहल नहीं की जा रही है। इसका संवर्धन और संरक्षण नहीं किया जा रहा है। इसकी उपेक्षा की जा रही है। 

राष्ट्रीय धरोहर या स्मारक घोषित करने की मांग 

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र केंद्र और राज्य सरकार से इस एतिहासिक जेल को राष्ट्रीय धरोहर या स्मारक घोषित करने की मांग कर रहे हैं। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि 1857 की क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों को इसी जेल में कैद करके रखा गया था। इसके आस-पास ही कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को फांसी दी गई थी। आजादी के 80वां स्वतंत्रता दिवस पर इस धरोहर को ऐतिहासिक स्मारक घोषित करने की मांग उठ रही है।


18 क्रांतिवीर हुए थे शहीद 

इतिहासकार रमेंद्रनाथ मिश्र के मुताबिक, 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर इस जेल में डाल दिया जाता था। 10 दिसंबर 1857 को वीर नारायण सिंह को इसी जेल के आस-पास फांसी दी गई थी। इसके बाद रायपुर में 18 जनवरी को करीब छह घंटे तक क्रांति की आग धधकती रही। 22 जनवरी को 17 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर इस जेल के आस-पास ही फांसी दे दी गई। इस तरह  1857 की क्रांति में छत्तीसगढ़ से कुल 18 क्रांतिवीर शहीद हुए थे।

1862 के आस-पास बनी थी केंद्रीय जेल

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में अंग्रेजी शासन स्थापित होने के बाद 1854 से 1861 के बीच यह क्षेत्र नागपुर स्टेट के नाम से जाना जाता था। 1861 में मध्य प्रांत बनने के बाद नई जेल व्यवस्था बनी। रायपुर के वर्तमान केंद्रीय जेल का निर्माण 1862 के आसपास हुआ। इस तरह से देखा जाये तो 1857 की क्रांति के समय सेट्रल जेल के नाम से कोई कारागार नहीं थी। अंग्रेजों ने 1554 में इस जेल को बनवाया था, जो आज वर्तमान में तहसील कार्यालय और डीकेएस अस्पताल के पीछे का हिस्सा है। इसकी गवाही इस जेल के अवशेष आज भी दे रहे हैं पर जागरुकता के अभाव में इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। 


जेल के अवशेष दे रहे गवाही

आज का जयस्तंभ चौक, कोतवाली चौक और बैजनाथपारा इसी ऐतिहासिक क्षेत्र से जुड़े हुए माने जाते हैं। बैजनाथपारा उस समय बैजनाथ तालाब के रूप में मशहूर था। यह इलाका तीन तरफ से पानी से घिरा था और सामने बड़ा परिसर था। इसके बीच पुरानी जेल थी। जेल की सुरक्षा को लेकर एक खाई भी थी। एक बड़ा कुआं भी था, जिसे बाद में पाट दिया गया। पुरानी खाई के अवशेष इस जगह की ऐतिहासिकता को बयां करते हैं। समय के साथ बदवाल होते गया। तालाब और पुराने परिसर का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया, लेकिन जेल के अवशेष आज भी अपने होने का सबूत दे रहे हैं। 


हुआ था प्रयास पर …

इतिहासकार मिश्र पुरानी जेल को लंबे समय से ऐतिहासिक स्मारक घोषित करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शहीद वीर नारायण सिंह म्यूजिम का उद्घाटन करने के लिये रायपुर आये थे, तो उस दौरान इस स्थल को ऐतिहासिक स्मारक घोषित कराने का प्रयास किया गया था पर सफल नहीं हो पाया। ऐसे में आज भी देर नहीं हुई है। सरकार जब चाहे इसे एतिहासिक स्मारक घोषित कर सकती है। 

पुस्तक में है जेल का चित्र 

इतिहासकार मिश्र ने कहा कि साल 1975 में वीर नारायण सिंह के इतिहास को आम जनता के बीच लाने के लिये बलिदान दिवस का आयोजन शुरू किया गया, जो आज भी जारी है। इस इतिहास को लेकर शोध कार्य भी हुआ, जिसे मध्य प्रदेश शासन ने प्रकाशित भी किया है। 1998 में उनकी प्रकाशित पुस्तक ‘वीर नारायण सिंह’ में इस पुरानी जेल का पहला चित्र भी दिखाया गया है, जो 1857 की क्रांति के इतिहास को सामने लाने में बेहद मददगार साबित हुई। 


पुरानी जेल की उपेक्षा क्यों? 

आज शहीद वीर नारायण सिंह राष्ट्रीय स्तर पर पहचा बना चुके हैं। रायपुर का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी उनके नाम पर है। नया रायपुर में करीब 10 एकड़ जमीन पर करीब 52 करोड़ की लागत से वीर नारायण सिंह आदिवासी डिजिटल म्यूजियम बनाया गया है। डॉ. मिश्र इस संग्रहालय की सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि वीर नारायण सिंह से जुड़े चित्रों और मूर्तियों को तैयार कराने के लिये उनके वंशजों और रिश्तेदारों से संपर्क कर एतिहासिक जानकारी जुटाई गई। रायपुर की पुरानी इमारतों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर चिंता जताते हुए  मिश्र ने कहा कि बूढ़ातालाब के पास बने पुराने किले के पत्थरों से अंग्रेजों ने कई भवन बनवाए थे। इनमें तहसील कार्यालय, जिला एवं सत्र न्यायालय, कलेक्टर कार्यालय और एसपी कार्यालय, टाउन हाल  जैसे भवन शामिल थे। इनमें कई पुराने भवन तोड़ दिये गये हैं तो कुछ को हटाने की भी बात सुनी जा रही है। 1857 की क्रांति से जुड़ी वास्तविक जेल आज भी मौजूद है पर वह उपेक्षा का शिकार है। इस पुराने जेल परिसर को भी अगर तोड़ दिया गया, तो रायपुर की पुरानी जेल का नामो निशान ही खत्म हो जायेगा। 1857 की क्रांति से जुड़ा महत्वपूर्ण अध्याय इतिहास के पन्नों में सिमटकर  रह जायेगा। 

 


Credit By Amar Ujala

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