Delhi-Ncr बाल तस्करी कोई छिटपुट घटना नहीं… सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, अदालतों को दिए संवेदनशीलता के निर्देश- #INA

सुप्रीम कोर्ट.
सुप्रीम कोर्ट ने देश में बाल तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण को गंभीर रूप से चिंताजनक करार दिया है. कोर्ट ने इस मसले पर निर्देश जारी किए हैं कि अदालतों को तस्करी और वेश्यावृत्ति के शिकार नाबालिग पीड़ितों के साक्ष्यों का संवेदनशील और यथार्थवादी तरीके से मूल्यांकन कैसे करना चाहिए. कोर्ट ने चेतावनी दी कि मामूली विसंगतियों या आचरण संबंधी रूढ़िवादी धारणाओं के आधार पर पीड़ितों की गवाही को खारिज नहीं किया जाना चाहिए.
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बेंगलुरु के एक व्यक्ति और उसकी पत्नी को नाबालिग लड़की की तस्करी और यौन शोषण के मामले में दोषी ठहराते हुए दिशानिर्देश जारी किए. उन्होंने निचली अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट के भारतीय दंड संहिता और अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत दिए गए निर्णयों की पुष्टि की.
बाल तस्करी संगठित शोषण के एक गहरे पैटर्न का हिस्सा
जस्टिस बागची ने कहा, बाल तस्करी के मामले कोई छिटपुट घटनाएं नहीं हैं, बल्कि संगठित शोषण के एक गहरे पैटर्न का हिस्सा हैं जो विधायी सुरक्षा उपायों के बावजूद जारी है. ऐसे मामलों का न्यायिक मूल्यांकन सबूतों के कठोर या अति-तकनीकी मानकों के बजाय नाबालिग पीड़ितों की वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशीलता पर आधारित होना चाहिए. आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय अदालतों को किन बातों का ध्यान रखने के लिए कहा है.
- संगठित अपराध नेटवर्क की जटिल और बहुस्तरीय संरचना पर गौर किया जाना चाहिए. इस तरह की संगठित अपराध गतिविधियां स्वतंत्र इकाइयों के रूप में कार्य करती हैं. इनके गुप्त अंतर्संबंधों को छल और कपट के माध्यम से भोला बनाकर निर्दोष पीड़ितों को धोखा दिया जाता है.
- भर्ती, परिवहन, आश्रय और शोषण के क्षेत्रों में अपराध इकाइयों के इस बिखरे हुए और स्पष्ट रूप से असंबद्ध तरीके से संचालित होने के कारण पीड़िता के लिए इन प्रक्रियाओं के परस्पर संबंध को सटीक और स्पष्ट रूप से वर्णित करना कठिन हो जाता है, क्योंकि ये सभी संगठित अपराध गतिविधियों के जाल हैं जिनका वह शिकार होती है.
- इस स्थिति को देखते हुए मानव तस्कर के प्रत्यक्ष रूप से हानिरहित प्रतीत होने वाले लेकिन भयावह एजेंडे के खिलाफ तुरंत विरोध न करने को पीड़ित के बयान को अविश्वसनीय या सामान्य मानवीय आचरण के खिलाफ बताकर खारिज करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.
- अदालतों को ध्यान रखना चाहिए कि जब नाबालिग किसी हाशिए या सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से पिछड़े समुदाय से संबंधित होती है तो उसकी अंतर्निहित सामाजिक-आर्थिक और कभी-कभी सांस्कृतिक असुरक्षा बढ़ जाती है.
- अगर सूक्ष्म मूल्यांकन के आधार पर पीड़िता का बयान विश्वसनीय और ठोस प्रतीत होता है तो केवल उसकी गवाही के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा जा सकता है. यौन तस्करी की शिकार, विशेषकर नाबालिग, सह-अपराधी नहीं होती और उसकी गवाही को पीड़ित गवाह के रूप में उचित सम्मान और विश्वसनीयता प्रदान की जानी चाहिए.
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों और न्यायालय के समक्ष भी यौन शोषण के भयावह परिदृश्य का वर्णन करना एक असहनीय अनुभव है, जो एक तरह से उत्पीड़न का कारण बनता है.
- यह स्थिति तब और भी गंभीर हो जाती है जब पीड़ित नाबालिग हो और उसे आपराधिक धमकियों, प्रतिशोध के भय, सामाजिक कलंक और सामाजिक एवं आर्थिक पुनर्वास की कमी का सामना करना पड़ता हो. ऐसे में पीड़ित के साक्ष्यों का न्यायिक मूल्यांकन संवेदनशीलता और यथार्थवाद से परिपूर्ण होना चाहिए.
बाल तस्करी कोई छिटपुट घटना नहीं… सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, अदालतों को दिए संवेदनशीलता के निर्देश
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