Delhi-Ncr दिल्ली धमाकाः बिना सबूत किसी कौम को न करें बदनाम… देश का माहौल बिगाड़ने में कौन शक्तियां हैं सक्रिय?- #INA

दिल्ली धमाकाः बिना सबूत किसी कौम को न करें बदनाम... देश का माहौल बिगाड़ने में कौन शक्तियां हैं सक्रिय?

दिल्ली धमाका

दिल्ली एक बार फिर धमाके से दहल गई है. भारत की राजधानी दिल्ली को सबसे सुरक्षित क्षेत्र माना जाता रहा है. यहां तक कि तब भी जब देश में खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था. दिल्ली में शांति थी, लेकिन 29 अक्टूबर 2005 की दिवाली की पूर्व संध्या पर सरोजिनी नगर मार्केट, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और गोविंद पुरी में विस्फोट हुए थे. 62 लोग इन विस्फोटों में मारे गए थे और 210 की हालत नाजुक हो गई थी. इसके आठ महीने बाद 14 अप्रैल 2006 को जामा मस्जिद के भीतर बम फटा था. इसमें मरा तो कोई नहीं पर 14 लोग घायल हुए थे.

13 सितंबर 2008 को पांच बम विस्फोटों में 25 लोग मारे गए थे तथा 100 से ऊपर घायल हुए. इसके 14 दिन बाद महरौली की फूल बाजार में विस्फोट हुआ और 4 लोग मारे गए. सात सितंबर 2011 को दिल्ली हाई कोर्ट में बम फटने से 11 लोग मरे तथा 64 घायल हुए थे. बारह दिन बाद जामा मस्जिद में गोलीबारी हुई.

कमजोर सरकारों के समय हुए हादसे

यूं दिल्ली की पहली आतंकी वारदात 25 मई 1996 को हुई थी, जब लाजपत नगर की सेंट्रल मार्केट में बम धमाका हुआ और 16 लोगों की जान गई. 1997 में छह जगह आतंकी वारदातें हुईं. वर्ष 2000 में तीन जगह धमाके हुए. लाल किले में 2000 की 18 जून को विस्फोट हुआ था. इसके बाद 2005 से 2011 के बीच तो यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था. इस पूरे दौर में देश के भीतर गठबंधन सरकारें थीं. वे सख़्त कदम उठाने से बचती रहीं, लेकिन 2011 के बाद से यह पहली आतंकी घटना है, जिससे दिल्ली दहल उठी है. चौदह वर्ष बाद इस तरह की वारदात ने दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठा दिए हैं. इस विस्फोट के कुछ दिन पहले ही फरीदाबाद में भारी मात्रा में RDX मिला था. परंतु इसे हरियाणा स्टेट का मामला समझ कर दिल्ली की सुरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाए.

पुलिस में कोऑर्डिनेशन का अभाव

दस नवंबर की शाम लाल किला के सामने स्थित मेट्रो स्टेशन के गेट नम्बर एक के पास एक HYUNDAI i20 कार में यह विस्फोट हुआ. HR नम्बर वाली इस कार की जब रोड मैपिंग की गई तब पता चला कि यह कार बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली में घुसी थी.बदरपुर दिल्ली और हरियाणा की सीमा है. यह सीमा फरीदाबाद और दिल्ली को जोड़ती है. संदेह है कि इस विस्फोट का फ़रीदाबाद से संबंध हो सकता है किंतु दिल्ली और हरियाणा पुलिस ने आपस में कोई कोआर्डिनेशन नहीं किया. दिल्ली देश की राजधानी है और अगर वहां की सुरक्षा का यह हाल है तो बाक़ी देश की पुलिस कैसी होगी! पहली जांच में यह भी मालूम हुआ कि कार का मालिक गुरुग्राम में रहने वाला सलमान नाम का शख़्स है, पर उसका कहना है उसने यह कार पुलवामा के तारिक को बेच दी थी. अब आगे के कार मालिकों की तलाश है.

दूर-दूर तक लाशें ही लाशें बिखर गईं

यह कार मेट्रो के गेट नम्बर के पास सवा तीन बजे पार्क हुई थी और शाम 6.52 पर यह विस्फोट हो गया. अब तक का यह सबसे भयानक विस्फोट था. इसका धमाका चार किमी तक सुना गया और आग की लपटें दूर-दूर तक दिखने लगीं. शाम सात के करीब का वह समय होता है, जब दिल्ली के अधिकांश लोग घर भागने की हड़बड़ी में होते हैं. इसलिए मेट्रो के पास भीड़ भी बहुत थी. जो 12 लोग मारे गए उनमें से किसी के हाथ तो किसी के पांव या किसी का सिर अथवा धड़ दूर जा कर गाड़ियों तथा पैदल चलने वालों पर जा गिरे. अफरा-तफरी मच गई. चीख-चिल्लाहटों से पूरे क्षेत्र में कोहराम मच गया. सामने की लाजपत मार्केट और उसके पीछे स्थित भगीरथ पैलेस में उस समय दुकानदारी कर रहे लोग भी भागे. पास के जैन मंदिर और गौरी शंकर मंदिर तथा गुरुद्वारा शीश गंज तक लोग भागे. ऐसा भयानक दृश्य जो पहले कभी नहीं दिखा.

सोशल मीडिया के ट्रोलर नफरत फैलाने में जुट गए

इसके बाद शुरू हुआ आरोप-प्रत्यारोप और घृणा फैलाने का दौर. सोशल मीडिया के ट्रोलर अपनी-अपनी लाइन खींचकर बैठ गए. बिना जांच पूरी हुए लोग अपने-अपने निष्कर्ष देने लगे. कोई सरकारी पक्ष के नेताओं की करतूत बताने लगा तो कुछ मुसलमानों को दायरे में लेने लगे. कुछ ने लिखा कि बिहार विधानसभा के दूसरे चरण की पोलिंग को प्रभावित करने के लिए बीजेपी ने यह कांड कराया. उन्होंने निर्णय दिया कि चूंकि बीजेपी विधानसभा चुनाव हार रही है इसलिए 11 नवंबर का मतदान प्रभावित करने के लिए उसके नेताओं ने यह कांड कराया है. तत्काल बीजेपी समर्थकों ने इसकी जिम्मेदारी मुसलमानों और कांग्रेस पर डाली. यह सच है कि RDX बरामदगी में पकड़े जाने वाले लोग मुसलमान हैं. इनमें से एक पेशे से चिकित्सक है, लेकिन इस पर गौर नहीं किया गया कि जहां यह वारदात हुई वहां मुसलमानों की भी आवाजाही खूब है.

सेकुलर लोग भी आग में घी डाल रहे

जितने ट्रोलर उतनी बातें! इससे और कुछ हो न हो देश का माहौल बिगड़ रहा है. हर हिंदू मुसलमान पर शक करने लगा है और मुसलमान हिंदुओं को नफरत का सौदागर बताने लगा है. किंतु इस आग में घी डालने का काम कथित सेकुलर लोग कर रहे हैं. घृणा फैलाना सबसे आसान काम है. जब मनुष्य की तर्कशक्ति खो जाती है तब वह घृणा फैलाता है. अभी तीन दिन पहले इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के GPS सिस्टम को हैक कर उड़ानें बाधित की गईं. इस कड़ी में यह भी महत्वपूर्ण है कि जिस किसी ने भी यह हरकत की हो उसने प्लानिंग बहुत तगड़ी की थी. इसके बाद फरीदाबाद में RDX का मिलना, बेंगलुरु एयरपोर्ट पर नमाज पढ़ने का मामला आदि सब संकेत कर रहे हैं कि देश का माहौल बिगाड़ने में कुछ शक्तियां सक्रिय हैं. ये देश के भीतर भी हैं और बाहर भी. सरकार को पहले ऐसे ट्रोलरों को काबू करना चाहिए.

सरकार घृणा फैलाने वाले तत्वों पर रोक लगाए

स्पष्ट निर्देश हों कि जब तक जांच पूरी न हो जाए इस तरह की नापाक हरकतें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी. इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन काल में देश के भीतर की आतंकी घटनाओं पर रोक लगी हैं. दिल्ली के लोग भी सुरक्षित महसूस कर रहे थे. बम या RDX का मिलना अतीत की बातें हो गई थीं. हालांकि पाकिस्तान की ओर से कश्मीर में आतंकी घटनाएं तो हुईं किंतु देश के भीतर के शत्रुओं पर रोक लगी थी. अब 14 वर्ष बाद अचानक से देश के भीतर भी आतंकवाद पसर रहा है. सरकार ऐसे तत्वों पर सख्त कार्रवाई करे और पूरी निष्पक्षता से जांच करे. प्रेस को ब्रीफ़ करे ताकि जांच की पड़ताल होती रहे. किंतु भ्रम फैलाने वाले तत्वों से भी सावधान रहने की जरूरत है. गृह मंत्री अमित शाह इस विस्फोट की सूचना मिलते ही पटना से वापस लौट आए. वे LNJP अस्पताल भी गए. इसके बाद जांच में तेजी आई.

हिंदू-मुस्लिम संबंधों में पारस्परिकता

यह भी सूचना मिल रही है कि जिस i20 कार में यह विस्फोट हुआ उसमें डॉ. उमर मोहम्मद सवार था, जिसके फ़रीदाबाद स्थित घर से RDX बरामद हुआ. हालांकि इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन CCTV फुटेज में जिस शख्स को इस i20 कार से उतरते देखा गया है वह डॉ. उमर मोहम्मद बताया जा रहा है. जो कोई भी इस वारदात के पीछे संलिप्त पाया जाए उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. किंतु बगैर सबूतों के किसी कौम को बदनाम करने की कोशिश न की जाए. देश में हजार वर्ष से हिंदू-मुसलमान साथ रहते आ रहे हैं. इनके संबंध परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. भारत के प्राचीन समाज में हर समुदाय के काम बंटे थे और इसी वजह से एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं था. यही कारण रहा कि इस्लामी शासन में किसी शासक ने प्राचीन भारतीय समाज के इस बंटवारे को नहीं तोड़ा.

घृणा को निकालना जरूरी

औपनिवेशिक शासन काल में भारत की इस व्यवस्था को घृणा तथा भेदभाव बता कर तोड़ने की कोशिश की गई. अंग्रेज जाते-जाते भारतीय समाज को छिन्न-भिन्न कर गए. नतीजा सामने है. हर समुदाय दूसरे से घृणा करता है. कहीं यह घृणा जातीय भेदभाव का रूप लेती है तो कहीं धार्मिक घृणा बन जाती है. इसका नतीजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा. मौजूदा सरकार का यह दायित्व है कि वह समाज के भीतर की इस घृणा को निकाल फेंके. दोषी को सजा दे और निर्दोष तथा कर्तव्यनिष्ठ लोगों को सम्मानित करे.

दिल्ली धमाकाः बिना सबूत किसी कौम को न करें बदनाम… देश का माहौल बिगाड़ने में कौन शक्तियां हैं सक्रिय?

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