Entertainment: Anusha Rizvi Movies: देश भी एक फैमिली की तरह होता है… क्यों चर्चा में है अनुषा रिजवी की एक छोटी-सी फिल्म की ये बड़ी बातें – #iNA

डायरेक्टर-राइटर अनुषा रिज़वी की नई फिल्म दी ग्रेट शमसु्द्दीन फैमिली (The Great Shamsuddin Family) उतने बड़े कैनवस की तो नहीं जैसी उन्होंने साल 2010 में पीपली लाइव लिखी और निर्देशित की थी. फरीदा जलाल, कृतिका कामरा और पूरब कोहली जैसे कलाकारों की यह फिल्म एक फ्लैट के दायरे तक सीमित है लेकिन संवादों की तल्खी और तासीर में देश और दुनिया का हाल है. इस फिल्म को भी अनुषा ने लिखा और डायरेक्ट किया है. बिना किसी विवाद के अंत तक की रोचकता इसकी यूएसपी है. कहानी का जोर पलायन नहीं बल्कि समस्या का समाधान मिलकर निकालने को लेकर है. झूठ, मक्कारी, फरेब से कोई नहीं बचा लेकिन यह भी सच है कि जिंदगी और सोसायटी से बढ़ कर भी कुछ नहीं.

महानगरीय परिवेश के एक छोटे-से फ्लैट में शमसु्द्दीन परिवार के सदस्य एक-एक करके इकट्ठा होते जाते हैं तो सबकी परतें खुलती हैं, एक-दूसरे से अपनी-अपनी सच्चाई छुपाते हैं, झूठ की पोल भी खुलती है और इस प्रकार कहानी आगे बढ़ती जाती है. एक फैमिली में जितने सदस्य, उतनी जिंदगी और उतनी ही दुश्वारियां और चालाकियां भी. यहां के चरित्रों का बहुत कुछ निजी-सा लग सकता है लेकिन उसका फलक मुल्क का मिजाज और दुनिया के हालात को समेटे हुए है.

न कटाक्ष और न सिस्टम से मुठभेड़

गौरतलब है कि दी ग्रेट शमसु्द्दीन फैमिली फिल्म जियो-हॉटस्टार (JioHotstar) पर स्ट्रीम हो रही है. यहां पीपली लाइव की तरह ना तो कर्ज के बोझ तले दबे किसान हैं और ना ही खेत खलिहान, ना तो महंगाई डायन जैसे गाने हैं और ना ही संवादों में राजनीतिक कटाक्ष. यह कहानी पूरी तरह से एक महानगरीय मुस्लिम परिवार की परवरिश, ऊंची लाइफ स्टाइल और अमेरिकी कंपनी की नौकरी करके इंडिपेंडेंट होने की ख्वाहिशों से लैस हैं. इस प्रकार अनुषा ने अपनी दूसरी ही फिल्म में अपने पहले फॉर्मेट को तोड़ा और टॉपिक को बदला है. वह सिस्टम पर ना तो तीखा तंज करती हैं और न मुठभेड़ करती हैं बल्कि देश के हालात का जिक्र करके समझौते का संकेत भी देती हैं.

फैमिली में उथल-पुथल चलती रहती है

फिल्म के कुछेक संवादों में देश का वर्तमान झांकता है. कुछ हादसों के दौरान अपने सदस्यों की सलामती की चिंता की जाती है लेकिन फिर देश को एक परिवार की तरह मानकर सहन कर लिया जाता है. इसी सिलसिले में फिल्म के आखिरी हिस्से में अमिताभ (पूरब कोहली) वानी अहमद (कृतिका कामरा) से कहते हैं- “देश भी एक फैमिली की तरह होता है… यहां उथल-पुथल चलती रहती है… दुनिया में कहां जाओगी, सब जगह हालात कमोबेश एक जैसे हैं.”

फिल्म के अंदर अनेक ऐसे संवाद हैं, जिसके जरिए कहानी की मुख्य पात्र वानी अहमद का दर्द व्यक्त होता है. इस रोल को कृतिका कामरा ने बड़ी ही खूबसूरती से निभाया है. कृतिका ने हर मूड को भली भांति पकड़ा है. वास्तव में वानी अहमद तलाकशुदा है. वह अपने फ्लैट में अकेली रहती है. वह यूएस की किसी कंपनी में नौकरी के लिए प्रयासरत है. जिसके लिए वह स्पेशल प्रोजेक्ट तैयार कर रही हैं. संयोग की बात है कि जिस दिन उसके प्रोजेक्ट की डेडलाइन है, उसी दिन उसके घर पर बारी-बारी से उसके सारे रिश्तेदार और दोस्त आने लगते हैं. वह प्रोजेक्ट पर काम करे कि खातिरदारी- उसकी उलझन धीरे-धीरे बढ़ती जाती है.

महज एक दिन की कहानी में कई ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, ऐसी कई बड़ी बातें कही जाती हैं, जो आज इस फिल्म को सुर्खियां दिला रही हैं. सोशल मीडिया पर उसकी खासतौर पर चर्चाएं हैं. वानी की स्टडी के समय उसकी कजिन इरम अहमद (श्रेया धनवंतरी) अपने बैग में पच्चीस लाख कैश लेकर पहुंच जाती है. वजह पूछने पर पता चलता है कि उसका पति उसे मेहर की रकम कैश में देकर चला गया और अब उसे बैंक में जमा कराने की जद्दोजहद है.

यहां के हालात देख रहे हो…!

यानी इरम भी वानी की तरह तलाकशुदा है. दिलतस्प बात ये कि पच्चीस लाख कैश वाले प्रसंगों के दौरान फिर से झूठ बोला जाता है. यहीं उसका दोस्त अमिताभ (पूरब कोहली) अपनी गर्लफ्रेंड लतिका (जोईता दत्ता) के साथ पहुंच जाता है. दोनों की बातचीत के दौरान खुलासा होता है वानी यूएस कंपनी ज्वाइन करना चाहती है. तब अमिताभ चिंतित होकर पूछता है- अमेरिका क्यों? वानी कहती है- यहां के हालात देख रहे हो…!

इसके बाद वानी के घर में बारी-बारी से उसके कुछ और रिश्तेदार पहुंचते हैं. कृतिका कामरा की ये रिश्तेदार बनी हैं- डॉली अहलूवालिया, जूही बब्बर, नताशा रस्तोगी और शीबा चड्ढा आदि. इन सबने प्रभावशाली अभिनय किये हैं. इन सबके आने पर झूठ-फरेब की कहानियों से पर्दे हटते जाते हैं. लेकिन इसी बीच सबसे बड़ी घटना तब होती है जब उसका कजन ज़ोहेब (निशांक वर्मा) पल्लवी (अनुष्का बनर्जी) को लेकर आ जाता है, जिससे वह शादी करना चाहता है.

अब सारे सदस्यों के बीच सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि जोहेन मुस्लिम है और जबकि पल्लवी हिंदू- आखिर ये शादी कैसे होगी? फिल्म का करीब आखिरी आधा हिस्सा इसी पर केंद्रित है. कहानी पच्चीस लाख कैश के मुद्दे से हटकर दो अलग-अलग मजहब और रिश्ते की ओर घूम जाती है.

देश के हालात एक परिवार का मसला

इसके बाद कहानी में क्या होता है- इसे जानने के लिए आपको निश्चित तौर पर पूरी फिल्म देखनी चाहिए. लेकिन महज करीब पौने दो घंटे की इस फिल्म ने कई मुद्दे एक साथ उठाकर नई चर्चा छेड़ दी है. फिल्म में एक तरफ दिल्ली-गुरुग्राम रोड पर सांप्रदायिक तनाव की छोटी-सी लपट तो दिखती है लेकिन दूसरी तरफ जोहेब-पल्लवी की शादी और अमिताभ-लतिका से वानी अहमद की दोस्ती के जरिए सद्भाव भी दिखाया गया है. फिल्म में वानी मौजूदा हालात पर चिंता तो व्यक्त करती है लेकिन अमिताभ उसे एक परिवार जैसा मसला बताकर शांत करता है.

भई, रिश्वत तो सेक्युलर है

फिल्म में एक संवाद बहुत ही चुटीला है. यह तंज करता है तो हास्य भी पैदा करता है- भई, रिश्वत तो सेक्युलर है. दी ग्रेट शमसुद्दीन फैमिली फिल्म का सबसे खूबसूरत पक्ष यही है कि यहां हालात से परेशान होकर कोई भी शख्स कहीं पलायन नहीं करता बल्कि मिलकर समाधान निकालता है. एक-दूसरे की मदद करते हैं. क्योंकि देश एक परिवार की तरह है. जिस तरह परिवार में सभी सदस्य मिलकर समस्या का हल खोजते हैं उसी तरह देश की हर समस्या का हल भी मिलकर, हंस-खेलकर, शिकवे-शिकायतें भूलकर निपटाया जा सकता है. ग्रेट शमसुद्दीन परिवार के सदस्यों ने भी ऐसा ही किया.

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