Entertainment: अरिजीत सिंह की ‘बोरियत’ और सोनू निगम का ‘प्रयोग’, न कोई रफ़ी, न किशोर; कैसे बनते हैं यादगार गाने? – #iNA

भाई अरिजीत सिंह, फिल्मी गायन से रिटायरमेंट के लिए आपकी ‘बोरियत’ वाली बात कुछ जंची नहीं. आप बिना ‘बोरियत’ शब्द का इस्तेमाल किए भी प्लेबैक से विराम ले सकते थे. क्योंकि इस ‘बोरियत’ में सदाबहार-यादगार फिल्म गीत-संगीत की विरासत के साथ ही मौजूदा दौर के गाने-तराने की रेंज, स्केल और वैरायिटी पर भी जाने-अनजाने सवाल खड़ा हो गया. इसका इल्जाम केवल गीतकार-संगीतकार पर ही क्यों, गायक-गायिकाओं पर भी क्यों नहीं. इसकी मिसाल आज के सोनू निगम और श्रेया घोषाल से पहले हमारी विरासत में भी मौजूद हैं.

मो. रफ़ी साहब के कद्रदान हमेशा तुम मुझे यूं भुला न पाओगे… के साथ याद करते हैं, वो हमेशा कलाकारों की इमेज और पर्सनाल्टी के हिसाब से आवाज़ में प्रयोग करते थे. उनके गायन में शम्मी कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद या धर्मेंद्र की अदायगी को महसूस किया जा सकता है. इसी तरह लता मंगेशकर को मेरी आवाज ही पहचान है… के साथ हम याद करते हैं, जिन्होंने मधुबाला, मीना कुमारी से लेकर काजोल तक को आवाज़ दी. लता की तरह आशा भोसले का भी पूरा जीवन प्रयोग को समर्पित है.

पल पल दिल के पास वाले गाने

गायन में प्रयोगधर्मिता की अलग-अलग रेंज और वैरायिटी देखनी हो किशोर कुमार की गायकी के खजाने से जुड़िए. प्रारंभ से लेकर आखिरी दिनों तक प्रयोग ही प्रयोग. किशोर कुमार जिंदगी इक सफर है सुहाना या फिर पल पल दिल के पास… जैसे गानों के लिए याद किए जाते हैं. हमारे फिल्म जगत के ऐसे कई लीजेंड्स हैं, जिनको गाने से कभी बोरियत नहीं हुई. कई बार इन्हें औसत दर्जे के गीत-संगीत भी मिले लेकिन अपने सुर से उसे भरसक संवारा था.

संगीत में रियाज और प्रयोग जरूरी

आज की तारीख में सोनू निगम भी इसका एक अहम उदाहरण है. जिन्होंने अपनी गायकी में नए-नए प्रयोग से अपनी बोरियत को दूर करने का भरसक प्रयास किया. फिल्मी गायन से कुछ समय के लिए विलुप्त भी हुए लेकिन प्रयोग की ताजगी के साथ फिल्मों में फिर-फिर लौटते रहे. हमारे दिग्गज संगीतकारों-कलाकारों ने इसीलिए निरंतर रियाज और प्रयोग को अहम बताया है. जिन्होंने इसका पालन किया, उनके गीत-संगीत यादगार बन गए. सालों साल से सदाबहार हैं. बेशक आज के दौर में सोनू निगम और श्रेया घोषाल जैसे कलाकार इसी के नजीर हैं.

‘बोरियत’ के बाद अरिजीत सिंह की रिटायरमेंट की खबर सुनते ही मुझे सोनू निगम के कई सारे प्रयोग याद आने लगे. यों सोनू के अत्यधिक प्रयोग का मैं भी कभी बहुत हिमायती नहीं रहा. बिना मांग वाले अत्यधिक प्रयोग से किसी भी पार्श्व गायक के सामने छवि की स्थिरता का संकट खड़ा हो सकता है. सोनू निगम ने भी ऐसे आरोप झेले हैं. इसके बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा और आलोचना करने वालों को खरी-खरी भी सुनाई. उन्होंने जवाब दिया था- चूंकि मैं प्रयोग कर सकता हूं, इसलिए प्रयोग करता हूं, जो नहीं कर सकते, वे नहीं करते हैं. यानी उन्होंने प्रयोग करके अपने दौर के गायकों के आगे चुनौती पेश कर दी.

Singer Rafi Kishore Kumar

‘बोरियत’ दूर करने के अनेक उपाय हैं

बहरहाल अब अरिजीत सिंह की कथित ‘बोरियत’ के सामने आने के बाद सोनू निगम के प्रयोग का औचित्य समझ आने लगा. ‘बोरियत’ दूर करने के कई उपाय हो सकते हैं. अगर आप एक ऐसी शख्सियत कहलाते हैं, जिसकी धाक है तो आप किसी प्लेटफॉर्म के जरिए नई-नई आवाज, नए-नए गाने और नए-नए संगीतकार की तलाश कर सकते हैं. इससे नई प्रतिभाओं को मौका मिलेगा और मौजूदा दौर के गीत-संगीत की धारा में नई-नई लहरें भी पैदा होंगी. गीत-संगीत के कद्रदानों को रेंज और वैरायिटी की सौगात मिलेगी. यादगार गाने के ये नुस्खे साबित हो सकते हैं.

सोनू निगम और अरिजीत में अंतर समझें

गौरतलब है कि साल 2012-2013 के बाद अरिजीत सिंह की बढ़ती लोकप्रियता का सबसे ज्यादा असर सोनू निगम पर देखा गया. सोनू के गानों की संख्या अचानक कम हुई और अरिजीत के गानों की संख्या लगातार बढ़ती गई. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इन दोनों कलाकारों की गायकी में कोई तुलना ही नहीं. संगीत के पारखी बखूबी समझ सकते हैं कि सोनू निगम विविधता के लिए जाने गए. आवाज में मधुरता के साथ विविधता के चलते ही उन्हें मॉडर्न दौर का मो. रफी कहा गया. हालांकि दूसरा रफी कोई हो नहीं सकता फिर भी मॉडर्न दौर में जैसे गाने और संगीत का सृजन हुआ, उसे साध कर सोनू निगम ने अपने लिए अपना-सा शिखर बनाया.

सोनू निगम जिस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में आए तब उनके सामने उदित नारायण और कुमार सानू जैसे कई और गायक पहले से स्थापित थे. उन्होंने इनके बीच संघर्ष करके अपना स्थान बनाया, अपनी छाप छोड़ी. वो एक प्रकार से स्ट्रीट सिंगर थे. रियलिटी शो से निखार पाकर रुपहले पर्दे के चमकते सितारे बने. वहीं सोनू के मुकाबले अरिजीत सिंह की गायकी में विविधता का अभाव है. उन दोनों के तमाम गानों को गौर से सुनें और स्केल की वैरायिटी परखें. जितनी वैरायिटी सोनू की गायकी में मिलेगी, उतनी अरिजीत सिंह के सुर में नहीं.

अरिजीत सिंह जेन ज़ी के पसंदीदा गायक

सोनू करीब साढ़े तीन दशक से गा रहे हैं. लिहाजा उनके श्रोताओं में सभी उम्र के हैं जबकि अरिजीत की तकरीबन उम्र ही उतनी है. अरिजीत को सोनू की तरह अपने दौर में किसी लीजेंड की चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा. उनके सामने ज्यादातर रियलिटी शोज और लाइव कंसर्ट के सितारे थे. लिहाजा अरिजीत जेन ज़ी के गायक बन कर छाए.

हालांकि अरिजीत सिंह की फिल्मी गायन से रिटायरमेंट यादगार और सदाबहार गीत-संगीत के लिए शुभ संकेत है. अरिजीत कुछ नया करना चाहते हैं. यह नया क्या होगा- इसका इंतजार रहेगा. उनके नएपन से नई पीढ़ी के कलाकार लाभांवित हों- इसकी शुभेच्छा.

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अरिजीत सिंह की ‘बोरियत’ और सोनू निगम का ‘प्रयोग’, न कोई रफ़ी, न किशोर; कैसे बनते हैं यादगार गाने?

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