Entertainment: एआर रहमान की मुरीद आशा भोसले भी… विवाद से हटकर आज फिल्म संगीत में योगदान की बात – #iNA

दिग्गज संगीतकार एआर रहमान इन दिनों बॉलीवुड में कम बल्कि दक्षिण और विदेश में ज्यादा व्यस्त हैं. लेकिन एक समय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनके नाम का जादू था. साल 1992 की बात है. मणिरत्नम एक फिल्म लेकर आए- ‘रोज़ा’. कश्मीर घाटी में आतंकवाद और प्रेम संबंध पर मूलत: तमिल की एक यादगार पेशकश. हिंदी के आम दर्शक इसके सितारों अरविंद स्वामी और मधु को ठीक से नहीं जानते थे. इसके बावजूद जब यह फिल्म हिंदी में डब होकर आई तो देशव्यापी ब्लॉकबस्टर हो गई. इसका सबसे बड़ा कारण कश्मीर और आतंकवाद वाला विषय तो था ही, एआर रहमान का संगीत और गानों का भी उतना ही योगदान था. दिल है छोटा-सा, छोटी-सी आशा… गाना लोकप्रियता के चरम था. लोग ना तो गायिका मिनमिनी को जानते थे और ना ही एआर रहमान को. बोल और गायकी में एक ताजगी थी. संगीत अलग-सा था. ‘रोजा’ के लिए एआर रहमान को नेशनल अवॉर्ड भी मिला.
यह गाना मूल रूप से तमिल में लिखा गया था, जिसे हिंदी में इतनी खूबसूरती से डब किया गया और गाया गया कि वह मौलिक लगने लगा और जन-जन की जुबान पर चढ़ गया. दक्षिण के किसी गीत-संगीत का हिंदी में संभवत: ऐसा चमत्कार पहली बार हुआ. यों इससे पहले येसुदास, एसपी बालसु्ब्रण्यम और कविता कृष्णमू्र्ति के माध्यम से हिंदी वाले दक्षिण के सुर और स्वर से परिचित थे लेकिन एआर रहमान ने ऐसी मेलोडी पेश कर दी कि उसका नशा नई पीढ़ी के दिलो दिमाग पर सवार हो गया. आम दर्शक, श्रोता ही नहीं बल्कि फिल्म इंडस्ट्री में भी एआर रहमान का जादू चल गया.
‘दिल से’ में छैंया छैंया का जादू
दो साल बाद एआर रहमान और मणिरत्नम की जोड़ी ने एक बार फिर कमाल किया. सन् 1995 में फिल्म आई- ‘बॉम्बे’ और 1997 में आई- ‘दिल से’. ‘बॉम्बे’ की कहानी के केंद्र में था- सांप्रदायिक सद्भाव. हीरो अरविंद स्वामी ही थे लेकिन अभिनेत्री थीं- मनीषा कोइराला. जबकि ‘दिल से’ फिल्म में मनीषा कोइराला के साथ शाहरुख थे. रहमान ने ‘रोज़ा’ के संगीत से लोगों के दिलो दिमाग पर जो नएपन और फ्यूज़न का अहसास कराया था, उसका फ्लेवर ‘बॉम्बे’ और ‘दिल से’ में भी बरकरार था. मणिरत्नम की इन दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की. इसकी सफलता के पीछे भी थीम के साथ मधुर गीत-संगीत का अहम योगदान था.
‘बॉम्बे’ में हरिहरण, कविता कृष्णमू्र्ति और उदित नारायण की आवाज में कुची कुची रकमा… तू ही रे…और कहना ही क्या… जैसे गानों ने धूम मचा दी तो ‘दिल से’ में सुखविंदर सिंह की आवाज में गाया छैंया छैंया… गाने का नॉस्टेल्जिया सालों तक शुमार रहा. इसी फिल्म में पहली बार एआर रहमान को लता मंगेश्कर का साथ मिला- जिया जले जान जले… गाने पर. मणिरत्णम के साथ अलावा उस दौर में एआर रहमान को जिस फिल्मकार ने बड़ा मौका दिया, वो हैं- रामगोपाल वर्मा. फिल्म थी- ‘रंगीला’. उर्मिला मांतोंडर की आकर्षक अदायगी पर आशा भोसले की खनकती आवाज़- रंगीला रे… जैसे ही आया हर तरह रामू, रहमान और उर्मिला के साथ आशा भोसले की चर्चा आम हो गई.
रंगीला से रहमान की प्रशंसक हो गईं आशा
‘रंगीला’ फिल्म में गाने के बाद आशा भोसले यह कहने से खुद को नहीं रोक सकीं कि वह एआर रहमान की फैन हैं. गाने में जो आनंद उन्हें गुजरे दौर में आरडी बर्मन के संगीत निर्देशन में मिला, उसकी याद रहमान के साथ गाने में हो आई. आशा भोसले एआर रहमान के संगीत की विविधता की कायल हो चुकी थीं. उन्होंने आगे चलकर कई लोकप्रिय गाने गाए. ‘कभी ना कभी’ में मेरे दिल का वो शहजादा… भी काफी लोकप्रिय हुआ. रहमान के संगीत निर्देशन में आशा भोसले के गाये गानों की सूची लंबी है. सब की चर्चा लाजिमी नहीं.
ताजा हवा के झोंका की तरह रहमान का संगीत
वास्तव में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एआर रहमान के शुरुआती साल ही इतने करिश्माई साबित हुए कि हर कोई इनके संगीत बनाने के तरीके के मुरीद होते गए. हर फिल्म में रहमान का संगीत खूब पसंद किया जाने लगा. लेकिन इसकी कुछ बड़ी वजहें भी थीं. हिंदी फिल्मों के दिग्गज संगीतकारों की जोड़ियों का करिश्मा खत्म हो चुका था. अस्सी के दशक के जादूगर बप्पी लाहिड़ी के संगीत को भी नब्बे के बाद की पीढ़ी खारिज कर चुकी थी. आनंद-मिलिंद, अनु मलिक आदि जैसे संगीतकारों के बीच एआर रहमान का संगीत ताजा हवा का झोंका की तरह था. इसमें कई लेयर के फ्यूज़न थे. वह परकशन ( Percussion) यानी परंपरागत वाद्य यंत्रों के बेस पर इस प्रकार फ्यूज़न गढ़ते कि संगीत प्रेमियों में एक ताजगी का अहसास होता.
केवल संगीतकार नहीं विविध संगीत के स्कॉलर भी
एआर रहमान अपने संगीत में तबला, सितार, बांसुरी जैसे वाद्ययंत्रों का भी प्रयोग करते साथ ही पाश्चात्य संगीत मसलन पियानो, गिटार और ड्रम का भी. हालांकि फिल्म संगीत में इनका उपयोग करने वाले रहमान अकेले नहीं थे. शंकर-जयकिशन, रवि, ओपी नैय्यर, कल्याण जी-आनंद जी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भी इन सभी वाद्ययंत्रों का बखूबी उपयोग करते थे. लेकिन एआर रहमान का संगीत इन संगीतकारों के मुकाबले किन्हीं प्रमुख वजहों से जुदा साबित हुआ. एआर रहमान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्हें दक्षिण भारतीय संगीत का भी उतना ही ज्ञान था, जितना कि हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल होने वाले पॉपुलर और अरबी देशों का संगीत. रहमान वास्तव में केवल संगीतकार नहीं बल्कि विविध प्रकार के संगीत के स्कॉलर भी हैं. दुनिया के कई देशों के संगीत का उनका अध्ययन व्यापक है. वह तमिल, अंग्रेजी, उर्दू के अलावा हिंदी भाषा पर भी उनका ठीक-ठाक अधिकार रखते हैं.
कंप्यूटर पर संगीत रचना करने वाले तब इकलौते
एआर रहमान के संगीत की दूसरी सबसे बड़ी खासियत तकनीक है. उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सबसे पहले कंप्यूटर पर वॉयस और म्यूज़िक का ग्राफ तैयार किया था. आरोह-अवरोह को भी कंप्यूटर से ही नियंत्रित किया. कंप्यूटर तकनीक और कंप्यूटर की भाषा पर पूरा अधिकार रखने वाले रहमान बॉलीवुड के पहले संगीतकार हैं. आशा भोसले ने उनकी इसी तकनीक-कला की प्रशंसा कई बार की है. यों गायन और वादन की अलग-अलग रिकॉर्डिंग पहले के दौर में भी अलग होती थी लेकिन रहमान ने इस चलन को पुरजोर तरीके से स्थापित ही कर दिया. मान लिया कि एक गाने में अगर चार गायक गा रहे हैं तो जरूरी नहीं कि चारों गायक एक ही साथ गाएं. चारों गायक अलग-अलग टाइम में भी गाकर रिकॉर्डिंग करवा सकते हैं और कंप्यूटर पर बाद में उनकी मास्टरिंग हो सकती है. रहमान ने इसे अपना ही लिया. इसे मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में बहुत से संगीतकारों ने अपनाया क्योंकि इससे रिकॉर्डिंग आसान हो गई.
वंदे मातरम की संगीत रचना भी हाई नोट पर
इसके अलावा हिंदी फिल्म संगीत में ओपी नैय्यर और उनके बाद आरडी बर्मन ने जिस प्रकार से हाई नोट का चलन आवश्यकतानुसार शुरू किया, उसे इलैयाराजा के अलावा एआर रहमान जैसे संगीतकारों ने भी अपने फ्यूज़न में आगे बढ़ाया. यही वजह है कि एआर रहमान जब वंदे मातरम पर संगीत देते हैं तब भी नोट को हाई लेवल पर रखते हैं. वंदे मातरम पर उनके संगीत की पेशकश परंपरा से एकदम जुदा है. वह हाई नोट पर रिकॉर्ड किया गया है लेकिन मधुरता से समझौता नहीं किया गया. इसी तरह ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फिल्म में एआर रहमान के जय हो… की संगीत रचना को भी देखें. वो अगर आमिर खान की ‘लगान’ में विशुद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की रचना करते हैं तो ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ में वर्ल्ड क्लास म्यूजिक भी देते हैं.
पदम भूषण भी मिल चुका है एआर रहमान को
अपनी इन्हीं विशेषताओं की वजह से एआर रहमान को कई बड़े पुरस्कार मिले हैं. जिसमें दो ऑस्कर, ग्रैमी अवॉर्ड, गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड, बाफ्टा, पद्म भूषण, पद्मश्री, सात बार राष्ट्रीय पुरस्कार, हिंदी और तमिल मिलाकर तीस से अधिक बार फिल्मफेयर पुरस्कार के अलावा रहमान को टाइम पत्रिका के पन्ने पर 2009 में दुनिया के प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में भी शामिल किया गया था. निश्चय ही इतनी सारी उपलब्धियां हासिल होने के समय उनका मजहब कभी नहीं देखा गया. हमेशा उनकी कला और प्रतिभा ही देखी गई. आशा की जानी चाहिए कि एआर रहमान अपनी पिछली उपलब्धियों के भी पार जाएंगे और दुनिया के मंच पर भारतीय संगीत की पताका लहराएंगे.
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