Entertainment: बलूचिस्तान में जन्मे, बने बॉलीवुड में ‘राजकुमार’, मीना कुमारी क्या दिलीप कुमार भी उन पर हावी न हो सके – #iNA

अपने दमदार डायलॉग और स्टाइलिश अदाकारी की बदौलत खास पहचान बनाने वाले राजकुमार के साथ मीना कुमारी का जिक्र इसलिए क्योंकि यह अभिनेत्री जिस फिल्म में आईं, प्रशंसकों का ध्यान सबसे अधिक खींचा. पूरी फिल्म की लोकप्रियता लूट लेती थीं. अपने कंधे पर फिल्म को उठा लेती थी. मीना कुमारी के सामने नायक गुम हो जाता था. रोल कैसा भी हो, कहानी के फोकस में रहती थीं. यहां तक कि धर्मेंद्र और गुरुदत्त जैसी पर्सनाल्टी भी मीना कुमारी की शख्सियत के आगे हल्की पड़ गई. लेकिन एकमात्र राजकुमार ही थे, जिस पर मीना कुमारी कभी हावी नहीं हो सकी. यही बात दिलीप कुमार की भी है. ट्रेजेडी किंग अपने दौर में अभिनय सम्राट कहे जाते थे, उनकी अदायगी से कई कलाकार प्रभावित रहे लेकिन राजकुमार जिस भी फिल्म में उनके साथ आए, आमने-सामने की टक्कर दिखी.

राजकुमार-मीना कुमारी या फिर राजकुमार-दिलीप कुमार की विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन उससे पहले इस एक्टर की कुछ बड़ी बातें बताते हैं. राजकुमार का वास्तविक नाम कुलभूषण पंडित था. पचास के दशक में जब फिल्मों में आए तब दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद, गुरु जैसे कलाकार छा चुके थे. राजकुमार ना तो किसी फिल्मी खानदान से ताल्लुक रखते थे और ना ही फिल्मों का उनको शौक था. उनके बारे में यहां तक कहा जाता है कि अभिनय जरूर करते थे लेकिन फिल्में बहुत कम देखते थे, यहां तक कि अपनी फिल्में देखने को लेकर भी उदासीन थे. बाद के दौर में हीर रांझा और वक्त जैसी फिल्मों से ख्याति पाई.

,सब-इंस्पेक्टरी छोड़ी, नाम भी बदला

चालीस-पचास के दशक में अभिनेताओं में अपना नाम बदलने और अपने नाम के साथ कुमार लिखने का बड़ा चलन था. जो सिलसिला अशोक कुमार से ही शुरू हुआ वह दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार से होता हुआ राजकुमार, मनोज कुमार और सुजीत कुमार तक पहुंचा. यह चलन बांग्ला सिनेमा में भी देखा गया, मसलन उत्तम कुमार. दरअसल राजकुमार चालीस के दशक में ही मुंबई आ चुके थे. तब उनका नाम कुलभूषण पंडित था. कश्मीर पंडित परिवार से ताल्लुक रखते थे. उनके पूर्वज श्रीनगर के थे लेकिन आजादी से पहले बात है, उनका परिवार बलूचिस्तान में जा बसा, जो कि अभी पाकिस्तान के कब्जे में हैं.

कुलभूषण पंडित मुंबई पुलिस में सब-इंस्पेक्टर की नौकरी करने आ गए. जिस थाने में ड्यूटी थी, वहां फिल्मवालों का भी आना जाना लगा रहता था. कुलभूषण दिखने में पतले-दुबले थे लेकिन बोलने-बतियाने का उनका अंदाज काफी रोबीला था. नाटकीयता झलकती थी. बाद के दौर में पर्दे जो उनके हाव-भाव नजर आते हैं, वे उनकी वास्तविक जिंदगी का हिस्सा शुरू से रहे. अपने किरदारों में हमेशा के लिए एक पुलिस अफसर वाला तेवर अपनाए रखा. इसी थाने में आने वाले फिल्मी कलाकार या निर्माता-निर्देशक उनकी स्टाइल को देखकर एक्टिंग करने के लिए प्रेरित करते फिर यहीं से उनको फिल्मों में जाने की इच्छा हुई और नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और फिल्मी नाम रखा- राजकुमार.

न पारिवारिक बैकग्राउंड न रोमांटिक चेहरा

लेकिन बिना पारिवारिक बैकग्राउंड और बिना रोमांटिक चेहरा के कामयाब हीरो बनना आसान नहीं था. कुलभूषण से राजकुमार बने इस कलाकार को काफी संघर्ष करना पड़ा. उनकी शुरुआती कोई फिल्म नहीं चली. उन्हें अहसास होने लगा कि उनका चेहरा रोमांटिक हीरो के लायक नहीं. अब उन्हें कुछ और करना चाहिए. दिलीप कुमार, देव आनंद के आगे तो उनके चेहरे की कोई हैसियत भी नहीं. इसी बीच उनको महबूब खान की फिल्म सन् 1957 की मदर इंडिया में काम करने का मौका मिला. यह नायिका प्रधान फिल्म थी, जिसमें नरगिस मुख्य नायिका थी लेकिन राजकुमार ने अपने छोटे रोल से सभी को प्रभावित कर लिया. मदर इंडिया की प्रसिद्धि ने राज कुमार की किस्मत के दरबाजे खोल दिए.

पैगाम में दिलीप कुमार के साथ पहली बार टकराए

दो साल बाद ही 1959 में राज कुमार को दिलीप कुमार जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ काम करने का मौका मिला. यह फिल्म थी- पैगाम. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी. उस वक्त दिलीप कुमार वैसे भी बड़े स्टार थे. उनकी हर फिल्म खूब पसंद की जाती थी. सिनेमा हॉल में दर्शकों की भीड़ खींचने वाली मानी जाती थी. पैगाम अपनी कहानी, गीत-संगीत के साथ-साथ दो कुमारों की टक्कर की फिल्म भी मानी जाती है. राजकुमार अपनी अदायगी और डायलॉग डिलीवरी से दिलीप कुमार के सामने जरा भी फीके नहीं पड़े. लेकिन इसके बाद इन बड़े कलाकारों को एक साथ सीधे सुभाष घई की सन् 1991 की फिल्म सौदागर में देखने का मौका मिला. सौदागर में दोनों साथ-साथ गाने गाये- इमली का बूटा बेरी का बेर… और इसी के साथ दोनों के बीच खूब डायलॉगबाजी भी हुई. यहां भी राजकुमार दिलीप कुमार से उन्नीस साबित नहीं हुए.

वास्तव में राजकुमार ने आगे चलकर पारसी थिएटर वाली नाटकीयता को अपनाये रखा, और सामने वाले किसी भी कलाकार को खुद पर हावी नहीं होने देते थे. दिलीप कुमार या मीना कुमारी अपनी गंभीर अदाकारी के लिए विख्यात हैं. एक ट्रेडेजी किंग तो दूसरी ट्रेजेडी क्वीन. दोनों कलाकारों की उपस्थिति एक माहौल बना देती रही है. दोनों कलाकार जिस भी फिल्म में आए उस फिल्म की लोकप्रियता अपने नाम कर गए. मीना कुमार के बारे में कहा जाता है कि उनकी प्रतिभा और पर्सनाल्टी के आगे सारे कलाकार दब जाते थे. लेकिन केवल राजकुमार ही थे जो पर्दे पर मीना कुमारी की प्रतिभा से नहीं दबे.

पाकीजा, काजल, दिल एक मंदिर में मीना संग जोड़ी

राजकुमार और मीना कुमारी ने कई फिल्मों में साथ-साथ काम किया है. पाकीजा के सीन याद कीजिएगा. आपके पांव देखे, बड़े हसीन हैं, इसे ज़मीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे… फिल्म में यह डायलॉग जब-जब गूंजता है, राजकुमार उपस्थित ना होकर भी जैसे दस्तक दे देते हैं. पाकीजा भी नायिका प्रधान फिल्म थी. यह फिल्म आज भी मीना कुमारी के नाम से विख्यात है. मीना कुमारी के बिना इस फिल्म की कोई पहचान नहीं. लेकिन राजकुमार जितनी बार भी मीना कुमारी के साथ स्क्रीन शेयर करते हैं, वजन प्रदान करते हैं.

पाकीजा के अलावा काजल और दिल एक मंदिर जैसी फिल्मों को याद करें. धर्मेंद्र और मीना कुमारी की काजल अपने दौर की एक बहुचर्चित फिल्म रही है. याद कीजिए इस फिल्म में मो. रफी का गाया गाना- छू लेने को नाजुक होठों को… कुछ और नहीं जाम है ये… इस गाने को राजकुमार पर फिल्माया गया है और सामने अदाकारा मीना कुमारी हैं. राजकुमार अपने खास अंदाज में एक शराबी का अभिनय कर रहे हैं. यह गाना जितना मकबूल हुआ, उतनी ही राजकुमार की अदाकारी भी.

इसी तरह दिल एक मंदिर का वह सीन याद करें, जब मीना कुमारी अपने बीमार पति (राजकुमार) की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए दुल्हन की लिबास में गा रही हैं- रुक जा रात, ठहर जा रे चंदा… बीते ना मिलन की ये बेला… यहां का सीन काजल के उलट है. मीना कुमारी गा रही हैं और राजकुमार देख-सुन रहे हैं. अपने खामोश अंदाज में भी राजकुमार की आंखें मानो कोई डायलॉग बोल रही थीं.

ताउम्र राजकुमार की स्टाइल में एक पुलिस अफसर वाला रौब दिखता रहा. पर्दे पर अदाकारी और वास्तविक जिंदगी में भी. उनके डायलॉग के बहुत से किस्से हैं और भूलने वाली कहानियां भी, उस पर बातें फिर कभी.

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