Entertainment: Basu Chatterjee Films: ‘छोटी सी बात’ में जिंदगी का तराना, सेल्युलाइड पर रचा बासु चटर्जी का वो रोमांटिक अफसाना – #iNA

छोटी सी बात… सुनने में किसी को भी बहुत ही मामूली सी लग सकती है लेकिन छोटी से छोटी बातों की यादें कितनी बड़ी होती हैं, जिंदगी में उन छोटी बातों के क्या मायने होते हैं, सफलता हासिल करने में आत्मविश्वास का कैसा रोल होता है, दिखावा और वास्तविकता में क्या अंतर है, बासु चटर्जी की इस फिल्म में शुद्ध हास्य के साथ बारीकी से समझा जा सकता है. यह फिल्म सेल्युलाइड पर रची एक रोमांटिक कविता की तरह है. साल 1975 से 76 तक जब दीवार, शोले जैसी धमाकेदार फिल्मों के डायलॉग की गूंज थी, उस शोर के दौर में बासु चटर्जी ने अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, अशोक कुमार और असरानी जैसे कलाकारों के माध्यम से रिश्तों के जज्बात की जो संवेदनशील दस्तक दी, उसकी यादें दिलों दिमाग में आज भी जज़्ब है.

गौरतलब है कि साल 1975 की सुपरस्टार वाली एक्शन फिल्मों की कहानियां संवेदनाओं को रौंद रही थीं. लाउड कैरेक्टर्स और थ्रिल पैदा करने वाले डायलॉग की शुरुआत उसी समय हो गई थी लेकिन गुलज़ार या बासु दा जैसे चंद निर्देशक और लेखक ऐसे भी थे जिन्होंने लीक से हटकर सिनेमा बनाने की अपनी रुचि विकसित की. बिमल रॉय जैसे दिग्गज निर्देशक की विरासत को अपने तरीके से आगे बढाया. छोटी सी बात अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की कोमल अदाकारी का एक यादगार झरोखा है. संवेदनाओं को पूरे अहसास के साथ जीकर दिखाया.

तारीख छोड़िए तासीर को समझिए

दिल को छू लेने वाली छोटी सी बात फिल्म सिनेमा घरों में कब आई- इसकी तारीख को लेकर कुछ कंफ्यूजन है. विकीपीडिया लिखता है- Initial Release 9 जनवरी 1975 जबकि फिल्म की शुरुआत में दिखाए गए सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट को जारी करने की तिथि 31 दिसंबर, 1975 दर्ज है. जाहिर है सर्टिफिकेट जारी होने की तिथि से पहले फिल्म रिलीज नहीं हो सकती. वहीं आईएमडीबी पर इसकी रिलीज की तारीख लिखी है- 9 जनवरी 1976. चलिए इस कंफ्यूजन या तारीख विवाद से हटकर हम फिल्म के आशय और अहमियत को रेखांकित करते हैं.

कहानी का बैकग्राउंड उसी मुंबई का है, और समय भी वही है. तब पर्दे पर एक तरफ अंडरवर्ल्ड डॉन के किरदारों की छवि गढ़ी जा रही थी, वहीं छोटी-सी बात में अपने अंदाज में मोहब्बत और संवेदना की तलाश की जा रही थी और रिश्तों को मजबूत बनाने की तरकीबें बताई जा रही थीं. सत्तर के दशक के महानगर का परिदृश्य भी कम नॉस्टेल्जिया जगाने वाला नहीं है. इसमें रिमझिम गिरे सावन… जैसा नजारा तो नहीं था लेकिन अहसास उससे भी कम रुमानी नहीं था.

धर्मेंद्र, हेमा और अमिताभ की झलक

फिल्म में थोड़ी देर के लिए धर्मेंद्र, हेमा मालिनी (जानेमन… जानेमन गाने में) और अमिताभ बच्चन की उपस्थिति (बतौर मेहमान कलाकार अशोक कुमार के साथ) 1975 के नॉस्टेल्जिक सुपरस्टारडम का स्पर्श बनाए रखती है. अमिताभ बच्चन इस फिल्म के वक्त ज़मीर फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. ज़मीर के निर्माता भी बी.आर. चोपड़ा थे और छोटी-सी बात के भी. यही वजह है कि पूरी फिल्म के दौरान जब-जब बस स्टॉप का सीन आता है, जहां अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा मिलते हैं- वहां ज़मीर फिल्म का पोस्टर दिखाई देता है.

छोटी-सी बात वास्तव में रॉबर्ट हैमर की सन् 1960 की ब्रिटिश फिल्म स्कूल फॉर स्कैंडल्स का हिंदी रीमेक है. जिस तरह से इसका फिल्मांकन हुआ है, वह पूरी तरह से मध्यवर्गीय भारतीय परिवार के ताने बाने से लैस है. फिल्म में अमोल पालेकर ने अरुण प्रदीप के उस किरदार को बखूबी निभाया है जिसमें आत्मविश्वास की कमी है, वह बेहद शर्मिला है और उस लड़की से अपने दिल की बात कह पाने में काफी झिझकता है, जिसे वह काफी चाहता है.

Chhoti Si Baat Basu Chatterjee

विद्या सिन्हा-अमोल पालेकर की जोड़ी

दरअसल अरुण और प्रभा (विद्या सिन्हा) रोजाना दफ्तर जाने के समय उसी बस स्टॉप पर मिल जाते हैं, जिसके बैकग्राउंड में ज़मीर फिल्म का पोस्टर लगा होता है. अरुण और प्रभा एक साथ बस का इंतजार करते हैं, बस में चढ़ते हैं. अरुण प्रभा की सुंदरता और सादगी पर मोहित हो जाता है. उसके दफ्तर तक उसका पीछा करता है, जिसके चलते कभी-कभार अपने दफ्तर में वह विलंब हो जाता है. वह प्रभा से रास्ते में बात करने की कोशिश करता है लेकिन झिझकता है, उसे आशंका होती प्रभा उसकी बात सुनकर कहीं नाराज न हो जाए, उसके दफ्तर में जाकर उसकी शिकायत न कर दे और उसकी नौकरी खतरे में न पड़ जाए.

नागेश के रोल में असरानी की भी टक्कर

हालांकि एक दिन दोनों की मामूली-सी बात होती है और वे एक-दूसरे से मिलने लगते हैं लेकिन प्रभा के दफ्तर में ही नागेश शास्त्री (असरानी) एक ऐसा युवक है जो जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा है. वह हर मोर्चे पर अरुण से तेज है और उससे आगे निकल जाता है. नागेश स्मार्ट और फास्ट है जबकि अरुण थोड़ा सुस्त और शर्मिला, नागेश टेबल टेनिस खेलता है और उसके पास स्कूटर भी है लेकिन अरुण दोनों ही मामले में फिसड्डी है, नागेश प्रभा से बात करने में जितना बहिर्मुखी और फर्राटेदार है, अरुण उतना ही अंतर्मुखी और संकोची. ऐसे में बार-बार उसके भीतर कुंठा जागती है. उसे लगता है प्रभा के आगे प्रभाव जमाने में नागेश उससे कहीं आगे है. उसमें हताशा है कि जिसके पास स्कूटर नहीं है, जो टेबल टेनिस नहीं खेल पाता, जो फर्राटेदार बातें करके लड़की को हंसा नहीं पाता, वह भला प्रभा को कैसे प्रभावित कर सकता है.

अशोक कुमार करते हैं अमोल पालेकर को तैयार

अब शुरू होता है अरुण यानी अमोल पालेकर के किरदार के मेकओवर का दौर. अरुण काफी जतन करता है. वह ज्योतिष के पास जाता है, सड़क किनारे तोता से अपने भाग्य निकलवाता है लेकिन कोई फायदा नहीं होने पर वह खंडाला के कठिन रास्तों से गुजरता हुआ पहुंच जाता है- रिटायर्ड कर्नल जूलियस नागेंद्रनाथ विल्फ्रेड सिंह यानी दादा मुनि अशोक कुमार के ठिकाने पर. अशोक कुमार एक ऐसे गुरु हैं, जिनके पास किसी भी बड़े संकट से छुटकारे की तरकीबें हैं. वह अरुण की पर्सनाल्टी को बदलने की ठानते हैं. अरुण के भीतर दबी बैठी कुंठा, हताशा को दूर करते हैं, आत्मविश्वास और जोश भरते हैं, टेबल टेनिस खेलना सिखाते हैं. कुल मिलाकर मेकओवर कर दिया जाता है.

इसके बाद अरुण जब वापस मुंबई आता है, दफ्तर ज्वाइन करता है तब एकदम बदल चुका होता है. अरुण की गैरहाजिरी में प्रभा उसे शिद्दत से याद करती है. अब उसे समझ आता है वाकई अरुण उसकी जिंदगी के लिए क्या मायने रखता है. फिल्म का अंत बहुत ही दिलचस्प और प्रेरणा जगाने वाला है. अरुण अब भी प्रभा के सामने अपना इम्प्रेशन जमाने की रणनीति में है. लेकिन आखिरी में जब प्रभा को इसका राज मालूम होता है तब वह कहती है- इतना सबकुछ करने की क्या जरूरत थी. वह तो पहले भी उसे उतना ही चाहती थी. दूसरी तरफ इस मिलन से निराश होकर अब नागेश शास्त्री रिटायर्ड कर्नल की शरण में प्रेम का पाठ पढ़ने के लिए चले जाते हैं. कहानी खत्म.

बासु चटर्जी को मिला था फिल्मफेयर अवॉर्ड

इस छोटी-सी बात की मामूली-सी लगने वाली कहानी में अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, अशोक कुमार या कि असरानी के अभिनय की जो ऊंचाई देखने को मिलती है, वह इस फिल्म को क्लासिक और यादगार बना देती है. निर्देशक बासु चटर्जी को इसकी सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला. फिल्म के संवाद खुद बासु चटर्जी ने लिखे थे. फिल्म के सारे गाने योगेश ने लिखे थे. उस वक्त योगेश आनंद फिल्म में ‘जिंदगी कैसी है पहेली…’ लिखकर चर्चा में आ चुके थे. सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में छोटी-सी बात फिल्म के गीतों को मुकेश, लता मंगेशकर, आशा भोंसले और येसुदास ने आवाज दी थी. मसलन जानेमन जानेमन तेरे दो नयन… ना जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ…ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने… ये गाने भी इस फिल्म की कहानी और किरदार की तरह क्लासिक हो चुके हैं.

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