Entertainment: Border 2 आने से पहले जानिए 1997 की बॉर्डर की कुछ बड़ी बातें, वॉर मूवी की वो इमोशनल दास्तां – #iNA

सनी देओल, वरुण धवन, दिलजीत दोसांझ और अहान शेट्टी की बॉर्डर 2 आगामी 23 जनवरी को रिलीज होने जा रही है. इसे 1997 की ब्लॉकबस्टर बॉर्डर का सीक्वल बताया गया है. ऐसे में दोनों फिल्मों की कहानी, संवाद, अभिनय, गीत-संगीत, लोकेशन और डायरेक्शन की तुलना होना लाजिमी है. 1997 की बॉर्डर को एक कल्ट वॉर मूवी का दर्जा हासिल है. रेगिस्तान में भी जवान जिस हौसले के साथ तैनात दिखे, संदेवनाओं और जिंदादिली से बंजर को भी मानो हरा भरा बना दिया- उसमें जेपी दत्ता के डायरेक्शन और राइटिंग का जादू दिखा. यहां घमासान युद्ध तो था लेकिन अंत एक इमोशनल नोट के साथ होता है, जहां दोनों ही तरफ लाशें बिछी हैं, यु्द्ध के औचित्य पर सवाल हैं और बैकग्राउंड में गाना है- तेरा भी वतन, मेरा भी वतन.
1997 की बॉर्डर के किरदार भारतीय इतिहास के सच्चे रणबांकुरे नजर आते थे. वह जितने योद्धा दिखते हैं, उतने ही भावुक प्रेमी भी. अपने यहां रणभूमि के योद्धाओं के बारे में कहा गया है कि वह एक तरफ युद्ध के मैदान में तलवार की धार से खेलता है तो एकांत में पायल की झंकार भी सुनता है. पायल की झंकार का मतलब केवल इश्क से नहीं, मानवीय पहलू से भी है. 1997 की बॉर्डर में यह खूबी दिखाई देती है. उस साल की बॉर्डर के सारे योद्धा किरदार इन गुणों से लैस हैं. उन्हें घर की याद आती है, चिट्ठियां आती हैं तो स्कूली बच्चों की तरह डाक की ओर लपकते हैं. कोई अकेली मां को याद करता है तो कोई प्रेमिका, मां बनने वाली पत्नी तो मंगेतर को.
करीब आधी फिल्म खत्म होने के बाद युद्ध होता है
लेकिन जैसे ही डंके की चोट पड़ती है, युद्ध का आह्वान होता है, बहाने कर छुट्टी पर जाने वाला जवान मथुरा दास (सुदेश बेरी) लौट आता है, तो कैंट की रसोई में खाना बनाने वाला फौजी (कुलभूषण खरबंदा) भी राइफल उठा लेता है और दुश्मन का सीना छलनी करने में जान की बाजी लगा देता है. ऐसी थी सन् 1997 की बॉर्डर की कहानी. युद्ध था, लेकिन युद्धोन्माद नहीं था. बहादुरी में मानवतावादी सोच शामिल थी. आपको जानकर हैरत हो तो इसे दोबारा देख सकते हैं. फिल्म के शुरू होने के करीब 35 मिनट बीत जाने पर भारतीय जवान गोलियां चलाते हैं. दूसरी बार गोलियां करीब 1.14 मिनट पर चलती हैं. कहानी में दोनों ही बार भारतीय फौज ने पाकिस्तानी मुखबिरों को निशाना बनाया था.
कहानी का बैकग्राउंड यह है कि सन् 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध का शुरू हो चुका है. पाकिस्तान की तरफ से लगने वाले सभी बॉर्डर पर सैनिकों की तैनाती की जानी है. इसी क्रम में 120 जवानों के साथ मेजर कुलदीप सिंह को राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात करने का हुक्म जारी होता है. मेजर कुलदीप सिंह सनी देओल बने हैं, जिनके साथ पुनीत इस्सर, सुनील शेट्टी, अक्षय खन्ना आदि कलाकार भी हैं. सबके परिवार की, प्रेम, शादी की बैक स्टोरी के साथ कहानी आगे बढ़ती है. चौंकाने वाली बात ये कि फिल्म का तकरीबन आधा हिस्सा बीतने तक भी दोनों देशों के बीच जंग नहीं छिड़ती.
रेगिस्तान में जवानों की जिंदादिली देखते बनती है
उससे पहले करीब दस मिनट का संदेशे आते हैं… गाने के फिल्मांकन में जवानों की जिंदादिली देखते ही बनती है. जहां ठहरे, वहां एक नई दुनिया बसा ली. रेडियो पर समाचार आता है- कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साफ शब्दों में कहा है कि दूसरे देश हमें शांति का पाठ न पढ़ाएं, भारत अपनी सुरक्षा के लिए कोई समझौता नहीं कर सकता. हालांकि भारतीय सेना को यह भी आदेश है कि जब दुश्मन देश हमला करेगा, तभी हमें उसका जवाब देना है. इसके बाद जैसे ही संदेशे आते हैं… गाना खत्म होता है, करीब 1.45 मिनट पर पाकिस्तान के हमले की सूचना मिलती है और दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू होती है.
समय ने लंबी छलांग लगाई है. करीब तीन दशक बीतने जा रहे हैं. गौरतलब है कि हिंदी फिल्मों के इतिहास में जितनी भी वॉर मूवी बनी हैं, उनमें चेतन आनंद की हकीकत के बाद जेपी दत्ता की बॉर्डर का प्रमुख स्थान है. जेपी दत्ता ने उस फिल्म को खुद ही लिखा था, और डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी थे. अब बॉर्डर 2 के डायरेक्टर अनुराग सिंह हैं. जबकि प्रोड्यूसर जेपी दत्ता और निधि दत्ता के साथ भूषण कुमार और कृष्ण कुमार. अब भैरों सिंह बने सुनील शेट्टी नहीं होंगे बल्कि उनके बेटे अहान शेट्टी दिखेंगे. हालांकि सनी देओल नई फिल्म में भी प्रमुख चेहरे के तौर पर मौजूद हैं. सनी के लिए बॉर्डर भी वैसी ही अहमियत रखती है, जैसी गदर-एक प्रेम कथा. संयोगवश दोनों के सीक्वल में उनका अहम किरदार है.
तब ना गणतंत्र दिवस था और ना स्वतंत्रता दिवस
1997 में जब बॉर्डर रिलीज हुई थी, तब ना तो गणतंत्र दिवस का मौका था और ना ही स्वतंत्रता दिवस का. वह फिल्म 13 जून को रिलीज हुई थी. फिल्म देश भर में लोकप्रिय हुई. अगले साल नेशनल अवॉर्ड हो या फिल्मफेयर अवॉर्ड- फिल्म ने हर समारोह में सारे अहम पुरस्कार बटोर लिए. फिल्म की की यादें आज भी बरकरार हैं. उस समय के युवक तकरीबन आज प्रौढ़ हो चुके हैं और उस साल पैदा हुए बच्चे अब 29 साल के. जबकि साल 2000 के बाद पैदा हुई पीढ़ी जेन ज़ी कहलाती है, जिनके लिए वरुण धवन वाली बॉर्डर निश्चय ही आकर्षण की नई सौगात है.
बॉर्डर एक भयंकर वॉर मूवी थी, लेकिन जेपी दत्ता ने उसे मानवतावादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया था. फिल्म के प्लॉट में कोई भी किरदार सीधे युद्ध के लिए नहीं टूट पड़ता था. बॉर्डर पर हमला होने पर करारा जबाव देने के लिए जांबाज तैनात रहते थे. फिल्म के कुछ खास प्रसंगों का जिक्र जरूरी है. भारत-पाक की जंग छिड़ चुकी है. पाकिस्तानी हमले में बॉर्डर के गांव खाली कराए जा रहे हैं. उनके घर जल गए. इसी बीच एक मुस्लिम शख्स सुनील शेट्टी से कहता है- जलते घर के अंदर तख्त पर उसकी कुरान रखी है, उसे लेकर जाना है.
देवी माता का भक्त भैरों सिंह बने सुनील शेट्टी धधकते घर के अंदर जाते हैं और कुरान को बाहर निकाल कर उसे माथे से लगाकर मुस्लिम शख्स के हाथों में सौंप देते हैं. मुस्लिम शख्स कहता है- तुम हिंदू हो फिर भी तुमने हमारी कुरान बचाई. जिसके बाद सुनील शेट्टी कहते हैं- यही तो हिंदू होने का मतलब है. इसके बाद मुस्लिम शख्स सुनील शेट्टी को शुक्रिया कहकर चला जाता है. फिल्म के आखिरी दृश्यों में एक जगह एक पाकिस्तानी सैनिक भारतीय जवानों के कब्जे में आ जाता है. वह हाथ जोड़ कर गुहार लगाने लगता है- मुझे मत मारो, मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं. इसके बाद कुलदीप सिंह बने सनी देओल उसे बंदी बनाकर जान बख्श देते हैं और अपने साथी फौजी को उसे पानी पिलाने के लिए कहते हैं. चाहते तो मार सकते थे.
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फिल्म के आखिरी सीन में मानवतावादी संदेश
इस प्रकार के मानवतावादी दृष्टिकोण यहीं पर खत्म नहीं होते. हाल ही रिलीज हुई इक्कीस फिल्म में निर्देशक श्रीराम राघवन ने युद्ध के दुष्परिणाम को दिखाया था, जबकि वह भी एक वॉर मूवी थी. करीब उनतीस साल पहले की बॉर्डर में भी जेपी दत्ता ने इसी नोट के साथ फिल्म को समाप्त किया था. याद कीजिए फिल्म के आखिरी सीन को. दोनों देशों के बीच युद्ध खत्म हो चुका है. भारत और पाकिस्तान दोनों ही तरफ से सैकड़ों जवानों की जानें जा चुकी हैं. भारत 1971 की लड़ाई जीत चुका है. सीन में अकेले सनी देओल और कुलभूषण खरबंदा दिखाई दे रहे हैं.
रेगिस्तानी ज़मीन पर बिखरी लाशें और चारों तरफ आग और धुआं…इसी दौरान बैकग्राउंड में हरिहरण की आवाज में गाना बजता है- जंग तो चंद रोज होती है, जिंदगी बरसों तलक रोती है…मेरे दुश्मन, मेरे भाई, मेरे हमसाए… आ खाएं कसम अब जंग न होने पाए… और उस दिन का रास्ता देखें… जब खिल उठे तेरा भी चमन….जब खिल उठे मेरा भी चमन… तेरा भी वतन, मेरा भी वतन…
दी एंड
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