Entertainment: बहू Vs वधू का वो अनोखा मुकाबला… इतने सालों में रिश्तों के अब तक कितने रूप बदल गए? – #iNA

पच्चीस साल कम नहीं होते. इन सालों में एक नई पीढ़ी तैयार हो जाती है. नई चेतना और नई सोच लाती है. कोविड के बाद हमें नया एक नया लब्ज़ मिला- वैरियंट. लेकिन इस पर भी बात नहीं थमी. फिर आया- नया वैरियंट. यकीनन पच्चीस साल पहले स्टार प्लस के जिस सीरियल ने नये परिवेश में रिश्तों की आधुनिक इमारत खड़ी की, उसकी यादें आज भी ताजा हैं. तुलसी की मुस्कान और उसकी हरेक अदा ने घर-घर सबका दिल जीत लिया. वही तुलसी एक बार फिर से क्योंकि सास भी कभी बहू थी 2 में अपने बिछड़े परिवार के साथ नजर आने वाली हैं- इस खबर ने दर्शकों की यादों के आंगन को महका दिया है. लोग इस इंतजार में है दूसरे पार्ट के सदस्यों में आखिर वो कौन-सा वैरियंट है जो आज के दौर के दर्शकों को लुभा पाएगा.

वैसे यादों के इस आंगन में महज तुलसी की गंध नहीं है. तुलसी के साथ-साथ बालिका वधू की आनंदी यानी अविका गौर भी बड़ी होकर एक अलग ही शो में नजर आने वाली हैं. इत्तेफाक देखिए कि डेढ़ दशक पहले दोनों अपने-अपने शोज के जरिए एक-दूसरे को टक्कर दे रही थीं, आज एक बार फिर छोटे पर्दे पर ही अपनी-अपनी पुरानी यादों और लोकप्रियता के साथ दिखाई देंगीं. यकीनन ये नजारा नॉस्टेल्जिया जगाने वाला होगा. यों गुजरा जमाना आता नहीं लेकिन साल 2008 का वह दौर एक बार फिर अपनी रौनक का अहसास कराएगा, जब एक तरफ विरानी परिवार की बहू की मुस्कान तो दूसरी तरफ छोटी-सी उमर में ब्याहने वाली आनंदी की मासूमियत दिखी.

मुस्कान बनाम मासूमियत में किसका पलड़ा भारी?

बहू बनाम वधू की उस जंग के पीछे दो बड़े चैनल्स की प्रतिस्पर्धा थी- स्टार प्लस और कलर्स. क्योंकि सास भी कभी बहू थी में मुस्कान तो बालिका वधू में मासूमियत-दोनों में किसका पलड़ा भारी पड़ा- ये टीआरपी चार्ट में दर्ज है. तुलसी की लोकप्रियता इतनी कि उसे पर्दे पर जीने वाली स्मृति ईरानी को जनता ने पसंद किया और संसद तक पहुंचाया. तो वहीं बालिका वधू की आनंदी के किरदार ने उस समाज पर इतना प्रभाव डाला जहां कच्ची उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती थी. आनंदी का किरदार निभाने वाली अविका गौर की अदाओं ने जागरुकता की नई अलख जगाई.

सीरियल के सामने चुनौतियों का नया वैरियंट

पहले बात क्योंकि सास भी कभी बहू थी की करते हैं. इस सीरियल ने एक मान्यता स्थापित की थी- कि रिश्तों के भी रूप बदलते हैं. नये नये सांचे में ढलते हैं. यकीनन पिछले पच्चीस सालों में रिश्तों ने न जाने कैसे-कैसे रूप बदल गए. संवेदनाएं, महत्वाकांक्षाएं और जरूरतों के नए-नए सांचे में ढल गए. क्योंकि सास भी कभी बहू थी का दूसरा सीजन अगर इन्हीं बदले हुए माहौल में फिर से दस्तक देने जा रहा है तो माना जाना चाहिए कि उसके सामने चुनौतियां भी नई हैं. इस सीरियल को जिस प्वाइंट पर समाप्त किया गया था और उस वक्त उसके सामने जिस प्रकार की नई चुनौतियां खड़ी हो गई थीं, वे आज भी बरकरार हैं और उन चुनौतियों के भी रूप बदल गए हैं, उसके नए वैरियंट आ गए हैं.

क्योंकि सास भी कभी बहू थी सीरियल की लोकप्रियता इसके किरदारों के दम पर था, इसकी कहानी में दिखाए गए मूल्यों को लेकर था, आदर्श और आस्था के साथ-साथ सामाजिकता और पारिवारिकता को पुनर्परिभाषित करने की नई चेष्टा थी. यह हमलोग या बुनियाद की दुनिया नहीं थी. यों यहां भी संयुक्त परिवार था लेकिन यह संयुक्त परिवार कॉरपोरेट घराने का था. गलाकाट बिजनेस की प्रतिस्पर्धा की होड़ में भी नैतिक मूल्यों के लिए कोई स्थान है, उस संदेश को इस सीरियल ने सामान्य से सामान्य और नव धनाढ्य घरानों तक में पहुंचाने में सफलता पाई थी.

जब कलर्स चैनल ने इस सीरियल को किया प्रभावित

लेकिन कहते हैं न कि हरेक सुबह की शाम आती ही है. क्योंकि सास भी कभी बहू थी की खट्टी-मिठी यादों में बहुत कुछ सकारात्मक है तो कुछ बातें इसे नुकसान पहुंचाने वाली भी. मिहिर विरानी का किरदार निभाने वाले अमर उपाध्याय का अलग होना, स्मृति ईरानी की बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियां और बालाजी टेलीफिल्म्स की एकता कपूर से टकराव के साथ-साथ कलर्स चैनल के उदय ने इस सीरियल की चमक फीकी कर दी.

कलर्स ने स्टार प्लस की नीतियों के ठीक उलट रणनीति अपनाई. स्टार प्लस अपने डेली सोप में जहां कॉरपोरेट घरानों की चकाचौंध भरी दुनिया की कहानियां दिखाने के लिए जाना गया, जिस पर वह आज भी कायम है; वहीं कलर्स गांव, कस्बों की उन कहानियों को तरजीह दी, जिनमें मखमली या लकदक कल्पना से इतर सोशल रियलिटी पर ज्यादा से ज्यादा फोकस किया. इसी दौर में कलर्स बालिका वधू जैसा सीरियल लेकर आ गया तो दर्शकों के एक बड़े समूह ने उसका दिल से स्वागत किया.

कलर्स की सोशल स्टोरीज ने दी स्टार प्लस को चुनौती

वे सामान्य घरानों के दर्शक जो स्टार प्लस की रंगीनियों को खुद की दुनिया से रिलेट नहीं कर पाते थे वे कलर्स के बालिका वधू, उतरन या न आना इस देश लाडो जैसे सामाजिक कहानियों वाले सीरियलों से तुरंत जुड़ गए. यह साल 2008 का समय था. कलर्स ने जैसे स्टारप्लस के सामने चुनौती पेश की, ठीक उसी तरह से बालिका वधू ने क्योंकि सास भी कभी बहू थी को कड़ी टक्कर दे दी. टीआरपी में कलर्स ने तेजी से छलांग लगाते हुए नंबर वन का पोजीशन हासिल कर लिया, और बालिका वधू ने भी. इसका नतीजा देखने में ज्यादा समय नहीं लगा. बालिका वधू सीरियल जुलाई 2008 में शुरू हुआ और जुुलाई 2000 में शुरू हुए क्योंकि सास भी कभी बहू सीरियल काआखिरी शो भी 2008 के नवंबर मेंप्रसारित किया गया. इस सीरियल का बंद होना टीवी की दुनिया में बड़ी खबर लेकर आया.

एकता कपूर की नई पहल ने नॉस्टेल्जिया जगाया

क्योंकि सास भी कभी बहू थी सीरियल एक बार फिर से नये कलेवर में आ रहा है. शो शुरू होने से पहले एकता कपूर की पहल ने इस मामले में सफलता हासिल कर ली है कि इतने सालों में अपने बिखरे कलाकारों को एकजुट कर लिया है. अमर उपाध्याय और स्मृति ईरानी को फिर से एक साथ लाना भी कम मशक्कत भरा कदम नहीं रहा होगा. इस सीरियल का अपना एक इतिहास है. अब दूसरे पार्ट में सीरियल की कहानी कैसी देखने को मिलेगी. रिश्तों के कैसे-कैसे रूप देखने को मिलेंगे. स्मृति ईरानी और अमर उपाध्याय की दूसरे पार्ट में कितनी प्रेजेंस होगी, उस प्रेजेंस का कितना असर दिखेगा- इसका इंतजार रहेगा.

वहीं अविका गौर अपने होने वाले पति के साथ जिस शो में नजर आएंगीं, वह कितना कामयाब होगा, इसकी भी प्रतिक्षा रहेगी. सबसे अनोखा सवाल तो ये है कि ये दोनों कलाकार नॉस्टेल्जिया की अपेक्षाओं पर दर्शकों को कितना संतुष्ट कर सकेंगे. इसका भी इंतजार रहेगा.

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बहू Vs वधू का वो अनोखा मुकाबला… इतने सालों में रिश्तों के अब तक कितने रूप बदल गए?

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