Entertainment: Happy Patel को रिजेक्ट कर सकती है देसी पब्लिक, समझिये वो 5 कारण जो इस फिल्म को बना सकते हैं ‘फ्लॉप’ – #iNA

5 Reasons Happy Patel Might Struggle : वीर दास की फिल्म ‘हैप्पी पटेल’ को लेकर सोशल मीडिया पर खूब शोर है. इस फिल्म के जरिए एमी अवॉर्ड विनर वीर दास ने डायरेक्शन में हाथ आजमाया है और आमिर खान ने पैसा लगाया है, लेकिन क्या ये फिल्म दिल्ली-मुंबई के मल्टीप्लेक्स से निकलकर छोटे शहरों के सिंगल स्क्रीन तक पहुंच पाएगी? या फिर ये सिर्फ ‘साउथ दिल्ली’ और ‘बांद्रा’ के लोगों तक सिमट कर रह जाएगी? क्योंकि देखो सीधी बात है. इंडियन ऑडियंस को ‘बिरयानी’ पसंद है, और वीर दास ‘सुशी’ परोस रहे हैं.
अब सुशी देखने में तो कूल लगती है, लेकिन जो स्वाद की आदत मसाले-दार जासूसी फिल्मों की है, उसे ये कितनी रास आएगी, ये बड़ा सवाल है. आइये जान लेते हैं वो 5 कारण बता रहे हैं, जिसकी वजह से ये फिल्म जनता की कचहरी में ‘रिजेक्ट’ हो सकती है.
1. ‘अल्फा मेल’ की इमेज से छेड़छाड़
इंडियन ऑडियंस ने पर्दे पर जासूस का मतलब सिर्फ ‘शेर’ समझा है. चाहे वो सलमान खान की टाइगर हो या शाहरुख खान की पठान, उनके लिए जासूस मतलब वो आदमी जो अकेला 100 लोगों को धूल चटा दे. लेकिन यहां हैप्पी पटेल बैले डांस कर रहे हैं, कुकिंग कर रहे हैं और लड़की से थप्पड़ खा रहे हैं. ये जो ‘नया जमाने का जासूस’ वीर दास दिखा रहे हैं, वो मास ऑडियंस के लिए ‘हजम’ करना थोड़ा मुश्किल होगा. जनता को जब तक हीरो का डोला और उड़ती हुई गाड़ियां न दिखें, उन्हें जासूसी फिल्म ‘फीकी’ लगती है.
2. हर किसी के पल्ले नहीं पड़ेगी ये कॉमेडी
आमिर खान प्रोडक्शन की इस फिल्म का ह्यूमर बहुत ‘एब्सर्ड’ (एक तरह से बेतुका) है. ये वो कॉमेडी है जो ‘डेल्ही बेली’ या ‘गो गोवा गॉन’ जैसी फिल्मों में दिखती थी. ये फिल्में ‘कल्ट’ तो बन जाती हैं, लेकिन थिएटर में भीड़ नहीं जुटा पातीं. छोटे शहरों की ऑडियंस को ‘किक’ देने वाले डायलॉग्स चाहिए होते हैं, जबकि यहां डेडपैन ह्यूमर और सिचुएशनल कॉमेडी का तड़का है. अगर जोक समझने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़े, तो देसी ऑडियंस उसे कॉमेडी नहीं, बल्कि ‘खिंचाई’ समझकर इग्नोर कर देती है.
3. ‘टू इंडियास’ का फ्लेवर
फिल्म के कई हिस्सों में वीर दास के शो ‘आई कम फ्रॉम टू इंडियाजस ‘ की झलक मिलती है. ये फिल्म एक ऐसे एनआरआई की कहानी है जो इंडिया को ‘बॉलीवुड’ के चश्मे से देखता है. ये कॉन्सेप्ट ग्लोबल ऑडियंस या मेट्रो शहरों के लिए तो बढ़िया है, लेकिन भारत के दिल यानी ग्रामीण इलाकों के दर्शकों को ये ‘बेगाना’ लग सकता है. उन्हें लगेगा कि एक विदेशी भारत आकर हमारी ही फिल्मों और आदतों का मजाक उड़ा रहा है.
4. लॉजिक की ‘लंका’
रिव्यू में भी ये बात सामने आई है कि फिल्म के राइटर्स ने मस्ती-मस्ती में कलम को कुछ ज़्यादा ही ढील दे दी है. फिल्म का प्लॉट कई बार अपनी दिशा खो देता है. इंडियन ऑडियंस भले ही फिल्मों में गाने और ड्रामा पसंद करती हो, लेकिन उन्हें एक ‘सीधी’ कहानी चाहिए होती है. जब कहानी स्पाई थ्रिलर से अचानक ड्रामा और फिर गैंगस्टर कॉमेडी बन जाए, तो दर्शक कन्फ्यूज हो जाते हैं. ये ‘नैरटिव शिफ्टिंग’ आम दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल सकती है.
5. वीर दास की इमेज
वीर दास की पहचान एक एलीट क्लास स्टैंड-अप कॉमेडियन की है. उनकी फैन फॉलोइंग उन लोगों की है जो नेटफ्लिक्स देखते हैं और इंग्लिश जोक्स समझते हैं. मिडिल क्लास ऑडियंस, जो अपने पूरे परिवार के साथ रविवार को फिल्म देखने निकलती है, वो वीर दास के लिए शायद ही सिनेमाघर तक आए. ऐसे में, फिल्म की पूरी सफलता सिर्फ ‘वर्ड ऑफ माउथ’ पर टिकी है. अगर फिल्म शुरू के दो दिनों में मास ऑडियंस को नहीं खींच पाई, तो आमिर खान का ये एक्सपेरिमेंट सिर्फ ओटीटी या यूट्यब तक ही रह जाएगा.
वीर दास ने ‘हैप्पी पटेल’ के जरिए एक बड़ी हिम्मत दिखाई है. उन्होंने बॉलीवुड के उन खोखले स्टीरियोटाइप्स को चुनौती दी है जो सालों से चले आ रहे हैं. लेकिन सिनेमा का इतिहास गवाह है कि यहां सिर्फ ‘हिम्मत’ से काम नहीं चलता, ‘हवा’ भी चाहिए होती है. अगर ‘हैप्पी पटेल’ को रिजेक्शन झेलना पड़ता है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह होगी इसका ‘ज़रूरत से ज्यादा कूल’ होना.
Happy Patel को रिजेक्ट कर सकती है देसी पब्लिक, समझिये वो 5 कारण जो इस फिल्म को बना सकते हैं ‘फ्लॉप’
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