Entertainment: Dharmendra’s action: शोला, शबनम और तूफान… धर्मेंद्र की आंखें बोलती थीं एक्टिंग की जुबान – #iNA

धर्मेंद्र की एक फिल्म थी- आंखें. सन् 1968 में रिलीज इस फिल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर और राइटर रामानंद सागर थे. यह अपने ज़माने की जबरदस्त सुपरहिट स्पॉय थ्रिलर थी. इस फिल्म में साहिर लुधियानवी का लिखा एक टाइटल गाना है, जिसकी पंक्तियों पर गौर कीजिए- आंखें ही मिलाती हैं जमाने में दिलों को… अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आंखें… हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आंखें… शबनम कभी शोला कभी तूफान हैं आंखें… यकीनन साठ और सत्तर के दशक की फिल्मों में जब हम धर्मेंद्र को देखते हैं- पर्दे पर उनकी आंखें भी कुछ इसी तरह के जज्बातों के भाव प्रकट करती हैं. हैंडसम और ही-मैन धर्मेंद्र जिस तरह अपनी पर्सनाल्टी के लिए जाने गए, उसी तरह के प्रभाव पैदा करने वाली आंखों के लिए भी मशहूर रहे.

वास्तव में धर्मेंद्र की आंखें एक्टिंग की जुबान बोलती थीं. ही-मैन के देखने के अंदाज में भी पौरुष झलकता था. पर्दे पर जब मुखातिब होते तो दर्शकों के दिलों की गहराइयों में उतर जाते. तीर की तरह उनकी आंखें दिलों दिमाग में चुभतीं. भले ही धर्मेंद्र रोमांटिक भूमिकाएं कर रहे हों… लेकिन उनकी आंखें मानो निशाना लगा रही होतीं, शिकार खोज रही होतीं, दुश्मन को खत्म करने के मिशन में जुटी होतीं. फिल्मी पर्दे पर आंखों का ऐसा रूप-स्वरूप बहुत कम अभिनेताओं में देखा गया.

आंखों में गजब का गुरूर का भाव

आंखें फिल्म के उस गाने की एक और पंक्ति है–आंखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती… तुलता है बशर जिस में वो मीज़ान हैं आंखें… हिंदी फिल्मों के पुरुष कलाकारों में अमिताभ बच्चन भी अपनी आवाज, लंबाई और आंखों के प्रभाव के लिए बखूबी जाने गए हैं. अमिताभ बच्चन की आंखों में एक अलग किस्म का थ्रिल था. वह जब गुस्सा करते तो पर्दे पर उनकी आंखें लाल सुर्ख हो जातीं. आग उगलने लगतीं लेकिन धर्मेंद्र की आंखों में गजब का गुरूर का भाव होता. वह पर्दे पर चलते-फिरते चीता नजर आते. यहां तक कि जब आप चुपके चुपके जैसी कॉमेडी फिल्म देखते हैं और जब प्रो. परिमल त्रिपाठी के रूप में उनके मुख से साहित्यिक व्यंग्यात्मक संवाद सुनते हैं, तब भी उनकी आंखें उतनी ही गर्वीली और चुलबुलाती प्रतीत होती हैं.

भेदिया आंखों का निराला अभिनय

धर्मेंद्र की फिल्मों की अनेक श्रेणियां हैं. वह किसी एक किस्म की छवि में कभी कैद नहीं रहे. सामाजिक विषय की फिल्मों में सत्यकाम, अनुपमा, बंदिनी, पूर्णिमा… देशभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत फिल्में मसलन हकीकत और आंखें हों या फिर जासूस कथाओं वाली फिल्में चरस, जुगनू, शालीमार आदि को गौर से देखिए. इन फिल्मों में धर्मेंद्र की उपस्थिति कितनी प्रभावित करती है. वह सत्यकाम में कभी धोती-कुर्ता पहने दिखते हैं तो शालीमार में एक जासूस की उनकी पोशाक चकित करती है. ड्रीम गर्ल या राजा जानी में उतने ही मॉडर्न बने हैं. या फिर धर्मवीर आदि फिल्मों के हरेक किरदार हरेक मिजाज के हैं… लेकिन आंखों का रंग कभी नहीं बदलता. वह सामने वाले को ऐसे घूरते हुए प्रतीत होते हैं मानों हर भेद को भली भांति जानते हों. भेदिया आंखों का ऐसा अभिनय निराला था.

अस्सी के दशक में आंखों का प्रभाव घटा

हां, शोले के बाद धर्मेंद्र के किरदारों का मिजाज काफी बदल गया. बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी या रमानंद सागर की फिल्मों में धर्मेंद्र के जो किरदार नजर आते थे, अब वे वैसे नहीं रहे. अस्सी के दशक में धर्मेंद्र ने कुछेक हल्की-फुल्की कहानियों वाली फिल्मों में भी काम किया था. ये फिल्में उनके करियर के ग्राफ को ऊंचा नहीं उठातीं. अस्सी के दशक की फिल्मों में धर्मेंद्र की चिर परिचित आंखों और उनका देखने का अंदाज बदल गया. कर्त्तव्य, राजपूत, गुलामी, क्रोधी, बगावत, जीने नहीं दूंगा, बदले की आग आदि फिल्मों में वह एक्शन और कॉमेडी तो खूब करते हैं, फौलादी जाबांज भी नजर आते लेकिन आंखों का वैसा जलवा नहीं दिखा पाते, जैसा कि पहले की फिल्मों के लिए जाने गए. बाद के दौर में उनकी फिल्में पहले की भांति कम सराही गईं तो इसकी वजह उनकी आंखों का बदला भाव और अंदाज ही था.

इंसान के सच झूठ की पहचान हैं आंखें

आंखें फिल्म के उस गाने की एक और पंक्ति पर गौर कीजिए- लब कुछ भी कहें इससे हकीकत नहीं खुलती…इंसान के सच झूठ की पहचान हैं आंखें… धर्मेंद्र की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई… वह फिल्में कम करते गए… उन्होंने सोशल मीडिया का रुख किया. शायरी शेयर करते रहे. टीवी चैनलों पर उनके अनेक इंटरव्यूज़ प्रसारित हुए. उनके तमाम वीडियोज में उनको बोलते हुए या शायरी सुनाते हुए उनकी आंखों पर भी जरूर गौर कीजिए. बोलते वक्त उनकी पलकें शायद ही कभी झपकती हैं. वह एकटक पूरी ठसक से अपनी बात कहते दिखते हैं. शायर दिल धर्मेंद्र बखूबी जानते थे- इंसान के सच झूठ की पहचान हैं आंखें.

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Dharmendra’s action: शोला, शबनम और तूफान… धर्मेंद्र की आंखें बोलती थीं एक्टिंग की जुबान

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