Entertainment: पोस्टर से पोस्ट तक: 25 सालों में बदल गया प्रमोशन का ढंग, अब सोशल मीडिया तय करता है फिल्मों की तकदीर! – #iNA

Revolution In Film Promotion: सिनेमाई दुनिया में एक वक्त ऐसा था जब फिल्म के पोस्टर से ही उस फिल्म के भविष्य का फैसला होता था. पोस्टर पर अगर बड़े सुपरस्टार का चेहरा है, तो उसका सफल होना लगभग तय माना जाता था. पर वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है. पिछले 25 सालों में (2000-2025) भारतीय फिल्म इंडस्ट्री कई बड़े बदलाव से गुजरी. इसमें कहानी कहने का अंदाज, तकनीक और फिल्मों को प्रमोट करने के तरीके में सबसे ज्यादा तब्दीली देखने को मिली. इस दौर में फिल्मों की तकदीर किसी दीवार पर चिपके पोस्टर से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के पोस्ट से तय हो रही है. इस दौर में सोशल मीडिया ही फिल्म को हिट या फ्लॉप कराने का बड़ा हथियार बन चुका है.
इस सदी की शुरुआत, यानी साल 2000 के दौर में फिल्मों का प्रचार टीवी चैनलों पर गाने, सितारों के इंटरव्यू, अखबरों पर फुल पेज विज्ञापन और मैगजीन के जरिए किया जाता था. प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन होता था, जहां तमाम बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को बुलाया जाता था. फिल्म कब रिलीज हो रही है, उसमें कौन-कौन से सितारे हैं, ऐसी तमाम जानकारियों के लिए पत्रकारों को प्रेस रिलीज दी जाती थी, CD कसेट मिलते थे. लेकिन साल दर साल प्रचार-प्रसार के तरीकों में क्रांति आती चली गई. चलिए समझते हैं कि कैसे ये रिवोल्यूशन धीरे-धीरे प्रिंट और टीवी से होते हुए डिजिटल और सोशल मीडिया तक पहुंचा.
2000-2005: TV और प्रिंट से प्रमोशन
सोशल मीडिया का वजूद नहीं था. इंटरनेट था, लेकिन इस्तेमाल सीमित और आम लोगों की पहुंच से दूर. प्रमोशन का जरिया– टीवी, न्यूजपेपर, मैगजीन और अलग-अलग इलाकों में फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर्स थे. पोस्टर्स में स्टार का चेहरा देखकर ही लोग सिनेमाहॉल का रुख करते थे. संवाद एकतरफा था. मेकर्स अपनी फिल्म ऑडियंस तक पहुंचा देते थे, लेकिन जनता की बात मेकर्स तक सीधे तौर पर नहीं पहुंच पाती थी. फिल्मों को वर्ड ऑफ माउथ का भी सहारा मिलता था, लेकिन गति धीमी थी और पहुंच सिर्फ स्थानिय स्तर तक. शुरू से ही मेकर्स प्रमोशन के लिए एक अलग बजट रखते आ रहे हैं. उस दौर में उस बजट का अधिकतर हिस्सा टीवी और प्रिंट में जाता था.
2006-2007: Youtube में बनाए गए चैनल
साल 2006 में जब भारत में यूट्यूब की शुरुआत हुई तो T-series जैसे कुछ प्रोडक्शन हाउस ने अपना चैनल बनाया. हालांकि, काम बहुत सीमित था. यूट्यूब और जनता के बीच में काफी फासला था. ऐसे में उस समय भी प्रमोशन का पूरा भार टीवी, अखबार और मैगजीन पर ही रहता था. फिर धीरे-धीरे वेबसाइट पर ब्लॉग पोस्ट के जरिए प्रमोशन का सिलसिला शुरू हुआ.
2008: गेम से फिल्म गजनी का प्रमोशन
आमिर खान की फिल्म गजनी कई मायनों में भारतीय सिनेमा के इतिहास में अहम फिल्म है. यही वो फिल्म है, जिसके प्रमोशन के लिए पहली बार मेकर्स ने इंटरनेट का इस्तेमाल किया था. ये फिल्म साल 2008 के आखिरी में आई थी. फिल्म को प्रमोट करने के लिए वेबसाइट भी बनवाया गया था. इसके अलावा लोगों को जोड़ने के लिए उन्हें टास्क दिए जाते थे और लोग उसे गेम समझ कर खेलते थे. इसका सोशल मीडिया पर भी प्रचार-प्रसार हुआ था.
Ghajini
#’मिसिंग गर्ल कल्पना‘ स्ट्रैटजी भी अपनाई गई थी. कल्पना (असिन) के किरदार के पोस्टर सर्कुलेट करवाए गए थे. पोस्टर पर न आमिर, न फिल्म का नाम, बस यही लिखा था कि ‘मिसिंग गर्ल कल्पना’. इससे लोगों में उत्सुकता पैदा होती थी और फिल्म को अच्छा फायदा हुआ था.
2009-2013: डिजिटल और सोशल का दबदबा
- ट्रेलर यूट्यूब पर रिलीज किए जाने लगे.
- स्टार्स भी फेसबुक औरट्विटर पर आए.
- सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ सूचना देने तक सीमित था.
- फिल्म रिव्यू वेबसाइट पर छपने लगे थे, लेकिन राय अखबरों में ही बनती थी
- प्रमोशनल बजट का हिस्सा प्रिंट और टीवी से निकलकर सोशल मीडिया पर भी खर्च होने लगा था.
2014-2015: फोन पर फिल्मी राय की शुरुआत
- आम लोगों के हाथों में स्मार्टफोन आने लगे.
- सितारों के पोस्ट पर राय देने का सिलसिला शुरू हुआ
- अभी भी राय फिल्म देखने के बाद ही बनती थी.
2016-2017: फिल्म के छोटे सीन से हुए प्रमोट
- 4G इंटरनेट की शुरुआत.
- अनलिमिटेड इंटरनेट, हर मुद्दे पर अनलिमिटेड राय.
- मीम बनने लगे, फिल्म के सीन इंटरनेट पर वायरल होने लगे.
2018-19: इंटरनेट ने फिल्मों को पहुंचाया फायदा
2018-19 के बीच दो ऐसी फिल्में आईं, जिन्होंने फिल्म प्रमोशन के लिए सोशल मीडिया को हाईप भी दिया और कंट्रोवर्सी भी पैदा की. पहली फिल्म शाहरुख खान की ‘जीरो‘. दूसरी शाहिद कपूर की ‘कबीर सिंह‘ थी.
#ये पहली बार था जब किसी फिक्शनल बॉलीवुड कैरेक्टर की सोशल मीडिया पर मौजूदगी थी. प्रमोशन का अलग अंदाज़ भले ही अपनाया गया,लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई.
कबीर सिंह को कंट्रोवर्सी का फायदा
- फिल्म को लेकर बंपर विवाद हुआ और टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी और पैट्रिआर्की चर्चा का विषय बन गया.
- जनता के हाथ में मोबाइल फोन था और सोशल मीडिया पर जबरदस्त बहस छिड़ी.
- निगेटिव और पॉजिटिव, दोनों तरह का ट्रेंड देखने को मिला.
2020-2025: सोशल मीडिया पर शिफ्ट हुआ प्रमोशन
टीवी और प्रिंट से फिल्म प्रमोशन लगभग पूरी तरह सोशल मीडिया पर शिफ्ट हो गया. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस दौर में लगभग 70 प्रतिशत तक प्रमोशनल बजट का हिस्सा सोशल मीडिया पर खर्च होने लगा. जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल शुरू हुआ तो पहले सिर्फ ट्रेलर आता था. अब पोस्टर, प्रिव्यू, ट्रेलर, गाने और BTS क्लिप्स और फोटोज भी आने लगे, जिससे रिलीज से पहले ही फिल्म चर्चा का विषय बनने लगी. संवाददो तरफा हो गया. मेकर्स भी अपनी सूचना देने लगे और दर्शक भी अपनी राय बनाने लगे कि फिल्म देखना है कि नहीं.
उदाहरण के तौर पर डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स‘ ले सकते हैं. सोशल मीडिया पर ये फिल्म एक मूवमेंट के तौर पर उभरी थी. फिल्म के समर्थक और विरोध करने वाले, सभी सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात लिख रहे थे. फिल्म को लेकर हाइप बढ़ता चला गया. नतीजा ये हुआ कि 20 करोड़ में बनी फिल्म ने वर्ल्डवाइड 300 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार कर लिया.
इन्फ्लुएंसर्स का दौर
सोशल मीडिया जहां फिल्म प्रमोशन का एक नया जरिया बना, जिसका सीधा कनेक्शन ऑडियंस के साथ है, वो भी बिना किसी ताम-झाम के, तो वहीं दूसरी तरफ उसी सोशल मीडिया ने कई युवाआों को रोजगार भी दिया, जो कहलाए इंफ्लुएंसर्स. पिछले चार-पांच सालों में इंफ्लुएंसर्स भी फिल्म प्रमोशन का एक बड़ा माध्यम बन गए. बड़े-बड़े सितारे ऐसे इंफ्लुएंसर्स के पास जाते हैं, जिनके पेज और चैनल की रीच मीलियन में होती है, जिससे फिल्म को फायदा होता है.
शाहरुख खान जैसे एक्टर्स ने इंटरव्यू देना बिल्कुल ही बंद कर दिया. ट्विटर पर #AskSRK के नाम से Q&A सेशन करने लगे, जिससे ऑडियंस और हीरो के बीच कनेक्शन मजबूत हुआ. साल 2023 में उन्होंने अपनी तीनों फिल्मों (पठान, जवान और डंकी) के प्रमोशन के लिए यही हथकंडा अपनाया. तीन में से दो फिल्मों ने 1000 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया.
पेड प्रमोशन के आरोप
2025 में ही YRF की एक फिल्म आई. सैयारा. हीरो अहान पांडे और हिरोइन अनीत पड्डा. ऑडियंस के लिए दोनों ही नए चेहरे. दोनों में से किसी ने भी फिल्म रिलीज से पहले कोई इंटरव्यू नहीं दिया. पर सोशल मीडिया पर ऐसे रील बनने लगे, जिसमें दिखाया गया कि लोग थिएटर में फिल्म देखकर पागल हो रहे हैं, आंखों से आंसू निकल रहे हैं, जैसे मानों पहले ऐसी लव स्टोरी बनी ही नहीं. फिल्म को उन रील्स का फायदा हुआ और बिजनेस 500 करोड़ रुपये के पार चला गया.
आरोप ऐसे भी लगे कि मेकर्स ने माइक्रो इंफ्लुएंसर्स से इस तरह के पेड वीडियोज बनवाए, ताकि जो फिल्म नहीं भी देखना चाह रहे थे, उनके अंदर भी उत्सुकता पैदा हो और वो फिल्म को देखें कि आखिर इसमें ऐसा क्या है, जो दर्शक फूट-फूटकर रो रहे हैं. हालांकि, ये सिर्फ आरोप थे. रील और रियल का सच कभी सामने नहीं आता. अब कुछ वैसा ही डायरेक्टर आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर‘ के साथ हो रहा है. अक्षय खन्ना, जो 28 सालों से फिल्मों में काम कर रहे हैं, इस फिल्म से उनका एक डांस स्टेप ऐसा वायरल हुआ कि फिल्म के लीड हीरो रणवीर सिंह भी ओवरशैडो हो गए और हर तरफ सिर्फ अक्षय की बातें होने लगीं.
जहां एक तरफ सोशल मीडिया पर अक्षय खन्ना छाए, तो वहीं दूसरी तरफ ऐसी बातें होने लगीं कि ये भी मेकर्स की एक टेक्निक है कि पहले कुछ छोटे मीम और बॉलीवुड पेजेस से पेड वीडियो बनवाकर वायरल करवाओ, फिर खुद-ब-खुद वो सीन इतना वायरल हो जाएगा कि लोग सिर्फ उसकी बातें करेंगे और फिर पेड और अनपेड के बीच का फर्क ही खत्म हो जाएगा.
सोशल मीडिया ऑडियंस रिपोर्ट
मई 2025 में Zipdo की एक रिपोर्ट सामने आई. वो रिपोर्ट फिल्म और ऑडियंस के बीच के कनेक्शन को साफ जाहिर करती है. अगर उस रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि सोशल मीडिया ने क्यों पारंपरिक प्रचार के सालों पुराने तरीके को टेकओवर कर लिया.
रिपोर्ट बताती है-
- 55% फिल्म मार्केटिंग कैंपेन में यूज़र-जनरेटेड कंटेंट शामिल होता है
- 85% ऑडियंस एंगेजमेंट फिल्म रिलीज़ के पहले हफ्ते में होता है
- 56% दर्शक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की रिकमेंडेशन से नई फिल्म खोजते हैं
- 39% लोग मोबाइल ऐप पर कैंपेन से जुड़कर फिल्म देखने जाते हैं
- 58% कैंपेन में नॉस्टैल्जिया का इस्तेमाल किया जाता है
- 45% लोग ऑनलाइन फैन कम्युनिटी से प्रभावित होकर फिल्म चुनते हैं
- 78% मिलेनियल्स और Gen-Z सोशल मीडिया पर अपकमिंग फिल्मों के वीडियो देखते हैं
- 69% ऑनलाइन कैंपेन में हैशटैग चैलेंज शामिल होते हैं
- 47% फिल्मों के प्रमोशन में Instagram और Snapchat के AR फिल्टर होते हैं
- 53% फिल्म कैंपेन में इन्फ्लुएंसर्स का इस्तेमाल होता है
- 42% फिल्म प्रमोशन में गेमिंग कम्युनिटी के साथ पार्टनरशिप होती है
- 82% फिल्ममेकर मानते हैं कि रिव्यू और कमेंट टिकट सेल पर असर डालते हैं
- 64% स्टूडियोज़ AI-आधारित मार्केटिंग टूल्स इस्तेमाल करते हैं
- 50% कैंपेन पिछली फिल्मों के डेटा से रणनीति बनाते हैं
- 70% स्टूडियोज़ को इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग से बेहतर ROI (Return on Investment) मिला
- 88% मार्केटर्स सोशल मीडिया को सबसे असरदार प्रमोशन टूल मानते हैं
- 64% मार्केटर्स को डिजिटल कैंपेन से ज्यादा रिटर्न मिला
- 80% इंटरनेशनल फिल्म कैंपेन लोकल ऑडियंस के हिसाब से बनाए जाते हैं
- 75% फिल्म मार्केटिंग बजट डिजिटल एडवर्टाइजिंग में जाता है
- 72% बड़े स्टूडियोज़ इन्फ्लुएंसर्स का सहारा लेते हैं
- डिजिटल मार्केटिंग बजट हर साल लगभग 10% बढ़ रहा है
- 40% थिएटर डिजिटल डिस्प्ले का इस्तेमाल करते हैं
- 39% Independent फिल्मों का भी प्रमोशन मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर होता है
- 67% फिल्म मार्केटिंग बजट अब डिजिटल/स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर खर्च हो रहा है
बहरहाल, प्रोडक्शन हाउस के लिए सोशल मीडिया अपनी फिल्मों को प्रमोट करने का एक आसान तरीका है. इतना आसान कि संवाद सीधा जनता से होता है और ज्यादातर फिल्मों का भविष्य रिलीज से पहले ही तय हो जाता है. यानी जहां एक समय में राज पोस्टर का था, तो वहीं अब पोस्टर के बजाय सोशल मीडिया पोस्ट रूल कर रहा है.
पोस्टर से पोस्ट तक: 25 सालों में बदल गया प्रमोशन का ढंग, अब सोशल मीडिया तय करता है फिल्मों की तकदीर!
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