Entertainment: Govardhan Asrani: फिल्मों में कॉमेडी को नया मुकाम देने वाले असरानी ‘जोकर’ नहीं, एक्टर बनना चाहते थे – #iNA

Govardhan Asrani Death: सिनेमा के पर्दे पर हंसाने वाले, रुलाने वाले और अपने अनोखे अंदाज से ‘एंटरटेनमेंट’ की परिभाषा बदलने वाले सीनियर एक्टर गोवर्धन असरानी अब हमारे बीच नहीं रहे. अपनी दमदार कॉमेडी और बेहतरीन कैरेक्टर रोल्स से कई दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले असरानी जी का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया है. इस दुखद खबर की पुष्टि उनकी मैनेजर बाबूभाई थीबा ने की है. मैनेजर के साथ-साथ उनकी मौत पर उनके परिवार का भी रिएक्शन सामने आया है. उन्होंने लिखा है कि हम सभी के प्रिय, सबके चेहरे पर मुस्कान लाने वाले असरानी जी अब हमारे बीच नहीं रहे. उनका जाना हिंदी सिनेमा और हमारे दिलों, दोनों के लिए अपूरणीय क्षति है. उन्होंने अपने अभिनय से जो अमिट छाप छोड़ी है, वो सदैव अमर रहेगी. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें.

अपनी मौत से कुछ ही घंटों पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर फैंस को दिवाली की शुभकामनाएं दी थीं. गोवर्धन असरानी का जाना बॉलीवुड के उस सुनहरे दौर के एक अध्याय का अंत है, जिसे उनके बिना पूरा नहीं माना जा सकता.

बड़े पर्दे का वो ‘जेलर’, जिसके बिना ‘शोले’ अधूरी

असरानी का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले उनकी कुछ यादगार भूमिकाएं घूम जाती हैं, लेकिन उनका सबसे अमर किरदार रमेश सिप्पी की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘शोले’ (1975) का ‘जेलर’ है. फिल्म में उनका डायलॉग – “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं” – भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा मुहावरा बन गया, जो आज भी हर किसी की ज़ुबान पर है. उनकी डरी हुई लेकिन रौब जमाने की कोशिश करती हुई शख्सियत, और जेल के अंदर कैदियों के सामने उनकी बेबसी… असरानी ने इस छोटे से रोल को बड़े परदे पर इस तरह से जीवंत किया कि इस किरदार को भी फिल्म के नायक-खलनायक के साथ हमेशा याद रखा जाता है.

संघर्ष से सफलता तक

गोवर्धन असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई जयपुर में ही हुई. अभिनय का शौक उन्हें मुंबई खींच लाया, लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी. उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से एक्टिंग की ट्रेनिंग ली. साल 1967 में ‘हरे कांच की चूड़ियां’ से बॉलीवुड में कदम रखने के बाद, असरानी को अपनी पहचान बनाने में थोड़ा समय लगा. उनके शुरुआती संघर्ष के दिनों में ही उनकी प्रतिभा को मशहूर फिल्ममेकर ऋषिकेश मुखर्जी ने पहचाना. ‘गुड्डी’ और ‘बावर्ची’ जैसी फिल्मों में उन्होंने छोटे लेकिन प्रभावी किरदार निभाए. सिर्फ हिंदी में ही नहीं पंजाबी और गुजराती फिल्मों में भी अपना कमाल दिखाया. असरानी ने बतौर निर्देशक भी हाथ आजमाने की कोशिश की. लेकिन उनकी वो फिल्में कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाईं.

कॉमेडी से जीत लिया दिल

गोवर्धन असरानी ने अपने करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया, और उनका नाम बॉलीवुड के उन चुनिंदा कलाकारों में शुमार है, जिन्होंने कॉमेडी को एक नई ऊंचाई दी. लेकिन उनकी एक्टिंग सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं थी. ‘अभिमान’ (1973) हो या ‘चुपके चुपके’ अपने हर किरदार में उन्होंने अपना एक अलग रंग भरा. उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की थी. उनका चेहरा, उनकी आवाज़ का उतार-चढ़ाव और उनकी बॉडी लैंग्वेज ही ऐसी थी कि दर्शक बिना बोले ही हंस पड़ते थे.

जोकर नहीं एक्टर बनना चाहते थे

एक फिल्म के प्रमोशनल इवेंट में उन्होंने कहा था, “मैंने हमेशा कोशिश की कि मैं कॉमेडी को हल्का न बनाऊं, मेरा हर रोल, चाहे वो कितना भी छोटा क्यों न हो, कहानी को आगे बढ़ाता था. मैं सिर्फ जोकर नहीं, बल्कि एक कैरेक्टर एक्टर बनना चाहता था.”

पुरस्कार और पहचान

अपने लंबे और शानदार करियर में असरानी ने दो बार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता. पहली बार उन्हें ‘आज की ताजा खबर’ (1974) और दूसरी बार ‘मलिका वधू’ (1976) के लिए यह सम्मान मिला. अपने समकालीन कलाकारों जैसे महमूद, जगदीप और जॉनी वॉकर के साथ उन्होंने कॉमेडी की दुनिया में अपनी एक खास जगह बनाई. उनकी फिल्में आज भी जब टीवी पर आती हैं, तो परिवार एक साथ बैठकर हंसता है.

नया दौर, नया अंदाज

समय बदला, लेकिन असरानी का जादू कम नहीं हुआ. उन्होंने 2000 के दशक में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी. हाल के वर्षों में उन्हें ‘हंगामा’ (2003), ‘ड्रीम गर्ल 2’ (2023) और प्रियदर्शन की सुपरहिट फिल्म ‘भूल भुलैया’ (2007) में देखा गया, जहां उनका किरदार दर्शकों ने फिर से खूब पसंद किया. वो सोशल मीडिया पर भी एक्टिव रहते थे और अपनी निजी जिंदगी से जुड़े पल और पुरानी यादें अक्सर साझा करते थे. निधन से कुछ ही घंटे पहले उनकी ओर से आया दिवाली का शुभकामना संदेश अब एक आखिरी अलविदा बन गया. गोवर्धन असरानी उस पीढ़ी के उन चुनिंदा एक्टर्स में से एक थे, जिन्होंने बिना किसी बड़े प्रमोशन या चमक-दमक के, सिर्फ अपनी कला के दम पर दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. उनकी यादें – उनके किरदार, उनके डायलॉग और उनकी बेजोड़ हंसी – हमारे सिनेमाई सफर का एक यादगार हिस्सा बनकर हमेशा जिन्दा रहेंगी.

Govardhan Asrani: फिल्मों में कॉमेडी को नया मुकाम देने वाले असरानी ‘जोकर’ नहीं, एक्टर बनना चाहते थे

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