Entertainment: यहां कानून तोड़ने वाले से हाथ मिलाया जाता है…25 साल में कितना बदला मनोज बाजपेयी की ‘शूल’ वाला बिहार – #iNA

बिहार में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. उससे पहले वहां राजनीतिक घमासान मचा है. राज्य में अपराध और पलायन का मुद्दा आज भी उसी तरह बदस्तूर बरकरार है, जैसा कि आज से दो-ढाई दशक पहले कई फिल्मों में भी दिखाया गया था. इस सिलसिले में आज चर्चा करेंगे मनोज बाजपेयी की चर्चित फिल्म शूल की. राम गोपाल वर्मा की स्टोरी और अनुराग कश्यप के लिखे डायलॉग ने बिहार की राजनीति और अपराध के गठजोड़ को एक तरह से पर्दाफाश करके रख दिया था. यह फिल्म सन् 1999 में आई थी. शुरू में लोगों का ध्यान नहीं खींच सकी लेकिन बाद में मनोज बाजपेयी की कल्ट मूवी में से एक बन गई. इसकी शूटिंग बिहार के मोतिहारी में ही हुई थी.
शूल की कहानी में तब के बिहार के सामाजिक-राजनीतिक हालात का चित्रण किया गया था. दो गुटों के वर्चस्व की राजनीति, लूट-पाट, मर्डर, रेप के बरअक्स पुलिस और प्रशासन के रोल कितने पंगु हो चुके थे, इसे फिल्म ने दिखाया था. लेकिन ताजा सुर्खियां बताती हैं- हालात करीब ढाई दशक बाद भी नहीं बदले. सड़कें बनीं, ट्रेनें चलीं, बसें दौड़ीं, 5जी आया और देश के कोने-कोने में गए बिहार के लोग भी स्मार्ट हो गए लेकिन यहां की जमीनी राजनीति का चरित्र नहीं बदला. सरेआम मर्डर आज भी होते हैं. भ्रष्टाचार और दबंगई के जंगल राज में ईमानदारी आज भी पिसती है जैसा कि शूल में दिखाया गया था.
विधानसभा में MLA बच्चू यादव का मर्डर
फिल्म का आखिरी सीन रोंगटे खड़े कर देने वाला था. बिहार विधानसभा चल रही है, तभी खाकी वर्दी में इंस्पेक्टर समर प्रताप सिंह पिस्तौल लिये आया. एमएलए बच्चू यादव को पहले तो खींचकर स्पीकर की कुर्सी के पास लेकर गया और इसके बाद भरी विधानसभा में उसके सिर में गोली मार दी. बच्चू यादव खून से लथपथ वहीं ढेर हो गया. लेकिन उससे पहले समर प्रताप सिंह बने मनोज बाजपेयी ने जो डायलॉग बोला, उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं- “इसके सिवा कोई रास्ता ही नहीं बचा था. क्या गलती थी हमारी? यही कि हमने न्याय का साथ दिया, संविधान में विश्वास किया. तो इसमें गलत क्या था? अगर वह सब सही था तो बच्चू यादव जैसा राक्षस इस विधानसभा के अंदर क्या कर रहा है? यही एक सच है जो शूल की तरह हमें अंदर तक भेद रहा है.”
विधानसभा स्पीकर के टेबुल पर बच्चू यादव के सिर से पिस्तौल टिकाये समर प्रताप सिंह यहीं तक सीमित नहीं रहा. उसने अपने सामने मौजूद सफेद लिबास से लैस सैकड़ों एमएलए से कहा- “आप लोग नेता हैं. जनता आप से बहुत आशा करती है. जिस कुर्सी के लिए आप लड़ाई कर रहे हैं, वह लकड़ी की है. और हम लोग हाड़-मांस के इंसान हैं. अपने अंदर झांकिये. इसे अपने अंदर से और समाज से इस शैतान को हटाइए नहीं तो ये पवित्र स्थान एक दिन नरक हो जाएगा. और बच्चू यादव जैसा लीडर बार-बार पैदा होता रहेगा.”
1999 से 2025 तक कितना बदला बिहार?
वास्तव में यह सन् 1999 में रिलीज शूल फिल्म का आखिरी सीन था. फिल्म जब रिलीज हुई तब इस सीन ने नई बहस को जन्म दिया था. फिल्म में भरी विधानसभा के अंदर इंस्पेक्टर के हाथों एक क्रिमिनल नेता की गोली मारी जाती है. इस फिल्म में जैसे को तैसा न्याय दिखाया गया था. वह सीन सवालों में भी आया था. विधानसभा के अंदर गोली मारते हुए दिखाया जाना कितना जायज है? इससे पहले अमिताभ बच्चन की फिल्म इंकलाब के आखिरी सीन में भी भ्रष्ट नेताओं को एक लाइन से गोली मार दी जाती है. जबकि 1975 की शोले के आखिरी सीन को जैसे को तैसा न्याय दिखाने से रोका गया था. गब्बर सिंह को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है.
खैर, शूल के आखिरी सीन में मनोज बाजपेयी के मोनोलॉग में दो बातें प्रमुख थीं. एक कि इसके सिवा कोई रास्ता ही नहीं बचा था, दूसरा कि… वर्ना बच्चू यादव जैसा लीडर बार-बार पैदा होता रहेगा. वास्तव में शूल में दिखाया गया बच्चू यादव का कैरेक्टर किसी जाति, बिरादरी या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि उस जन प्रतिनिधि का प्रतिनिधित्व करता है जो कानून को ठेंगा दिखाता है, अपने हाथों से अपराध करता है, अपने गुर्गों से खून-खराबा करता है, दंगे फसाद करवाता है. बच्चू यादव का कैरेक्टर उस सफेदपोश की तरह है जो देश के संविधान और कानून के लिए खुली चुनौती है. वह विधानसभा में संविधान की शपथ लेता है लेकिन इलाके में अपना कानून सबसे ऊपर रखता है. वह कानून, जिसे बिहार में राजनीतिक पार्टियां विपक्ष में रहते हुए एक-दूसरे के शासन काल को जंगल राज कहती हैं.
शूल फिल्म में दिखाया गया बिहार का सच
यही वजह है कि फिल्म में एक जगह संवाद है- यहां तो कानून तोड़ने वाले से ही हाथ मिला लिया जाता है. 1999 का ये डायलॉग क्या आज के बिहार का सच नहीं है. बिहार की राजनीति का बच्चू यादव अब भी जिंदा है. काल्पनिक बच्चू यादव सिनेमा के पर्दे पर मारा गया लेकिन क्राइम और पॉलिटिक्स के कॉकटेल में सराबोर रहने वाला बच्चू यादव मरा नहीं है.बिहार में तब से लेकर आज तक जंगल राज कहे जाने का सिलसिला खत्म नहीं हुआ.
जंगल राज बिहार के विकास के रास्ते का सबसे बड़ा शूल है. पूरा सिस्मट शूल पर बिछा है. जनता इस शूल पर चलने को लाचार है. आज भी बैंक मैनेजर, व्यापारी के अपहरण होते हैं, उनकी हत्या करके लाश फेंकी जाती है. फिल्म बताती है यहां समर प्रताप सिंह जैसे ईमानदार कानून के रखवाले को उसकी निजी जिंदगी में किस प्रकार यह शूल चुभता रहता है. समर अपनी मासूम सी बेटी को खो देता है. पत्नी की मौत हो जाती है. पिता विमुख हो जाते हैं, दोस्त दूर हो जाते हैं, समाज को कई भी एक व्यक्ति उसकी कट्टर और देशभक्त ईमानदारी के साथ खड़ा नहीं है.
शूल फिल्म को मिला था नेशनल अवॉर्ड
हर तरफ से अकेला होने पर अब समर का यही मकसद बन जाता है कि बच्चू यादव जैसे अपराधी का जिंदा रहना इस समाज के लिए ठीक नहीं. ऐसे में समर कहता है- इसके सिवा कोई रास्ता ही नहीं बचा था और फिर बच्चू यादव को खत्म कर देता है. फिल्म की कहानी में खलनायक तो खत्म हो जाता है लेकिन जिस वास्तविक समाज से ऐसे खलनायक को उठाया गया था, वहां का ऐसा खलनायक आखिर कब खत्म होगा, यही अहम सवाल है.
आपको बताएं कि शूल फिल्म को सत्या बनाने वाले राम गोपाल वर्मा ने बनाया था और इसकी स्टोरी भी लिखी थी. इस फिल्म का डायरेक्शन उनके असिस्टेंट ईश्वर निवास ने किया था. तब इस शूल ने बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड भी जीता. इस फिल्म के लिए अनुराग कश्यप के लिखे डायलॉग्स में बिहारी पॉलिटिक्स और क्राइम पूरी तरह से जीवंत हो उठा था. मुख्य रोल में मनोज बाजपेयी के अलावा उनकी पत्नी के तौर पर रवीना टंडन, बच्चू यादव के रूप में सयाजी शिंदे ने यादगार भूमिका निभाई. लेकिन शूल जिस एक आइटम सांग के लिए भी मशहूर हुई, वह था- शिल्पा शेट्टी का… मैं आई हूं यूपी, बिहार लूटने. शिल्पा का वह आइटम सांग भी कल्ट बन चुका है.
चुनावी मौसम में बिहार की राजनीतिक और आपराधिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों पर यह चर्चा जारी रहेगी.
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