Entertainment: Jatadhara Review: ऐसा हॉरर, जिसे देखकर डर नहीं, हंसी आती है, पढ़ें सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म का पूरा रिव्यू – #iNA

Jatadhara Hindi Review: तेलुगू सिनेमा में हॉरर फिल्मों का एक तगड़ा इतिहास रहा है. फिर वो अरुंधति, विरुपाक्ष और मसूदा जैसी हॉरर फिल्में हो या मंत्र, रक्षा और देय्यमनी जैसे साइकोलॉजिकल थ्रिलर. यही वजह है कि जब किसी नई तेलुगू हॉरर-थ्रिलर फिल्म की घोषणा होती है, तब हम उम्मीद बांधते हैं कि अब कुछ ‘हटके’ और ‘रीढ़ की हड्डी में सिहरन’ पैदा करने वाला देखने को मिलेगा.
अभिषेक जयसवाल और वेंकट कल्याण की ‘जटाधरा’ के साथ भी ऐसी ही उम्मीदें थीं. खासकर तब, जब फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा जैसा बड़ा नाम एक ‘धन पिशाचिनी’ के अवतार में सामने आया. लेकिन, अफसोस! ये फिल्म उस उम्मीद पर ऐसा पानी फेर गई, कि अब हॉरर फिल्मों के नाम से भी डर लगने लगा है. असल में ये ‘डरावनी’ नहीं, बल्कि इतनी खराब है कि इसे देखकर हंसी आने लगती है.
कहानी
कहानी का प्लॉट सुनने में कसम से बड़ा मजेदार लगता है. कहानी के केंद्र में है शिवा (सुधीर बाबू), जो एक ‘घोस्ट हंटर’ है और जो खुद भूतों पर यकीन नहीं करता. अब आप कहेंगे, ये कैसा घोस्ट हंटर है? यही कहानी का शुरुआती ट्विस्ट है. शिवा को हर रात एक ही अजीबोगरीब सपना आता है, जिसके तार उसके अतीत, उसके बचपन से जुड़े हुए हैं. शिवा अपने सपनों के इस रहस्य को सुलझाने की तलाश में भटक रहा है. दूसरी तरफ, एक गांव है, जहां एक खजाना छिपा हुआ है और इस खजाने की रखवाली कोई साधारण भूत नहीं, बल्कि ‘धन पिशाचिनी’ (सोनाक्षी सिन्हा) कर रही है.
जो कोई भी उस कलश को छूने की कोशिश करता है, उसकी दर्दनाक मौत हो जाती है. अब सवाल ये है कि क्या शिवा, जो भूतों पर यकीन ही नहीं करता, उस गांव तक पहुंच पाएगा? क्या वह अपने बचपन के सपने और धन पिशाचिनी के बीच के संबंध को समझ पाएगा? और क्या वो उस ‘पिशाचिनी’ को हरा पाएगा, जिसकी वजह से पूरा गांव दहशत में है? ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर फिल्म देखनी होगी.
जानें कैसी है ये फिल्म
जब ये कहानी पर्दे पर खुलती है, तब लगता है कि ये सवाल बस कागज पर ही रहते तो अच्छा होता. कहानी का ‘इंटरेस्ट’ वहीं दम तोड़ देता है, जहां से कहानी शुरू होती है. ये फिल्म ऐसी लगती है, जैसे किसी ने बड़े उत्साह में बिरयानी बनाने की सोची हो, लेकिन तेल-मसाला डालना ही भूल गया हो. फिर भी इसे देखा जा सकता था. लेकिन कोई फिल्म खराब हो सकती है, कहानी कमजोर हो सकती है, लेकिन एक हॉरर फिल्म अगर ‘उबाऊ’ हो जाए, तो वो गुनाह है.
‘जटाधरा’ हॉरर कम और सजा-ए-अजीब ज्यादा लगती है. इस फिल्म को देखने के बाद आप उस आत्मा के लिए नहीं रोते, जिसे मोक्ष नहीं मिला, बल्कि अपनी उस आत्मा के लिए रोते हैं, जो टिकट के पैसे खर्च करके यह फिल्म देखने चली आई. अब आइए इस फिल्म पर विस्तार से चर्चा करते हैं कि कैसे 70 करोड़ के बजट में बनी ये फिल्म, फ्री के इंस्टाग्राम रील कंटेंट से भी ज्यादा वाहियात लगती है. देसी स्टाइल में कहें तो, ‘जटाधरा’ एक ऐसा ‘हॉरर पैकेट’ है, जिसके अंदर ‘कॉमेडी की भेलपूरी’ भरी हुई है.
निर्देशन और स्क्रीनप्ले
इस फिल्म को बनाने के लिए 70 करोड़ रुपये लगाए गए हैं, लेकिन फिल्म की बैकड्रॉप समझाने के लिए यहां AI का इस्तेमाल किया गया है, ये AI इतना घटिया है कि देखकर लगता है, इससे अच्छा इफेक्ट तो हम सोशल मीडिया पर देखते हैं. खराब वीएफएक्स दर्शक का मूड इस तरह से खराब कर देते हैं कि आगे की पूरी फिल्म माथे पर बल डालकर देखनी पड़ती है.
ऐसा लगता है जैसे निर्देशक अभिषेक जयसवाल और वेंकट कल्याण ने फिल्म अलग-अलग बनाई है. या तो दोनों ने कभी बैठकर आपस में बात ही नहीं की कि फिल्म में ‘कंटेंट’ क्या होगा. एक डायरेक्टर ने एक्शन सीन पर जोर दिया, तो दूसरे ने हॉरर सीन पर. नतीजा? फिल्म की ‘थीम’ ही अचानक भटक जाती है.
स्क्रीनप्ले तो ‘खिचड़ी’ से भी ज्यादा ‘गड़बड़झाला’ है. फिल्म की जगह एडिटिंग टेबल पर ऐसा संहार किया गया है कि दर्शक को समझ ही नहीं आता कि किस सीन के बाद कौन-सा सीन आ रहा है. बिना किसी कारण के एक दूसरे से कनेक्ट किए गए हैं. क्लाइमैक्स तक पहुंचने का रास्ता ऐसा है, जैसे आप किसी भूल-भुलैया में हों, जहां हर दरवाजा बंद है और आप बस हैरान-परेशान होकर ‘चल क्या रहा है भाई?’ सोचते रहते हैं. बैकस्टोरी जिसे ‘शॉक’ देना चाहिए था, वो क्लाइमैक्स में इतनी जल्दी-जल्दी पेश की जाती है कि आपको न कोई शॉक लगता है, न कोई इमोशन. कुल मिलाकर ‘जटाधरा’ किसी ‘कन्फ्यूज़्ड कस्टमर केयर एक्ज़ीक्यूटिव’ जैसी है, जो आपकी समस्या तो सुन रहा है, लेकिन समाधान के बजाय ‘रोबो-जवाब’ दे रहा है.
एक्टिंग
अगर इस पूरी फिल्म में सचमुच कोई ‘पॉजिटिव वाइब’ है, तो वो हैं सुधीर बाबू. शिवा के किरदार में उनकी मेहनत साफ दिखती है. चाहे उनका लुक हो, उनकी बॉडी लैंग्वेज हो, या एक्शन सीन में उनका एफर्ट—वो 100% देते हैं. पूरी फिल्म में वही एकमात्र ऐसे कलाकार हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि ये ‘प्रोफेशनल एक्टर’ हैं. क्लाइमैक्स में उनका शिव तांडव वाला सीन, हम पर हुई इस ‘पीड़ा’ को थोड़ा-सा सुकून देता है. सुधीर बाबू ने उस एक्टर का काम किया है, जो पूरी टीम के लिए ‘क्लीन बोल्ड’ होने से पहले ‘सिंगल’ लेकर स्ट्राइक चेंज करने की कोशिश कर रहा हो.
सोनाक्षी सिन्हा से बड़ी उम्मीदें थीं, खासकर जब वह एक ‘पिशाचिनी’ के डार्क और अलग अवतार में सामने आईं. उनके लुक और कॉस्ट्यूम पर टीम ने यकीनन काफी मेहनत की है, और वो दिखती भी अच्छी हैं. लेकिन एक्टिंग के मामले में बस रहने दीजिए. उनका किरदार पूरी फिल्म में सिर्फ ‘चीखने-चिल्लाने’ के लिए रखा गया है. उनके हिस्से में बमुश्किल तीन या चार डायलॉग होंगे, और उन्हें भी उन्होंने ऐसे चीख-चीखकर बोला है कि आपकी हंसी ही नहीं रुकती. हॉरर सीन में जब पिशाचिनी डराने आती है, तो दर्शक डरने के बजाय हंसने लगते हैं, और इसका बड़ा श्रेय सोनाक्षी के ‘ओवर-द-टॉप’ रिएक्शन को जाता है. उनका काम ऐसा लगता है, जैसे उन्हें एक्टिंग के लिए नहीं, बल्कि सबसे जोर से चिल्लाने की प्रतियोगिता जीतने के लिए बुलाया गया हो.
सुधीर बाबू के अपोजिट दिव्या खोसला हैं. उन्होंने अपने किरदार को न्याय देने की कोशिश की है. शिल्पा शिरोड़कर ने भी अच्छी एक्टिंग की है, लेकिन उनका स्क्रीन स्पेस बहुत ही कम है. रवि प्रकाश, इंदिरा कृष्णा, राजीव कनाकाला ने ‘ठीक-ठाक’ काम किया. लेकिन, पंडित जी बने सुभालेखा सुधाकर को पूरी फिल्म में सबसे अच्छे और सबसे लंबे डायलॉग बोलने का मौका मिला, और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है.
देखें या न देखे
अगर आप उन साहसी वीरों में से हैं, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री के विफल प्रयोगों में भी कला दिखती है, या जो सोनाक्षी सिन्हा को सिर्फ और सिर्फ नए लुक में देखने में ही खुश हो जाएंगे, तो आपकी मर्जी. पर बाद में हमें दोष मत दीजिएगा. लेकिन, अगर आप हॉरर के असली शौकीन हैं, तो इस फिल्म से दूर रहने में ही भलाई है.
Jatadhara Review: ऐसा हॉरर, जिसे देखकर डर नहीं, हंसी आती है, पढ़ें सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म का पूरा रिव्यू
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