Entertainment: ऑस्कर में फिर ‘नील बटे सन्नाटा’, 68 साल से ‘इंटरनेशनल फिल्म’ कैटेगरी में खाली हाथ भारत, आखिर कब खत्म होगा ये सूखा? – #iNA

Oscar Nominations 2026: लॉस एंजेलिस के डॉल्बी थिएटर से जब 98वें एकेडमी अवॉर्ड्स (Oscars 2026) के नॉमिनेशंस का एलान हुआ, तो कई भारतीयों की धड़कनें तेज थीं. उम्मीद थी कि नीरज घायवान निर्देशित और ईशान खट्टर-जान्हवी कपूर स्टारर फिल्म ‘होमबाउंड’ इतिहास रचेगी. फिल्म टॉप 15 की शॉर्टलिस्ट में शामिल थी, लेकिन जब अंतिम 5 फिल्मों के नाम आए, तो भारत एक बार फिर ‘आउट’ था. ये सिर्फ एक फिल्म की विफलता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के उस 68 साल पुराने जख्म पर एक और चोट है, जिसकी टीस ‘मदर इंडिया’ के वक्त से महसूस की जा रही है.
भारत ने 1957 में पहली बार अपनी आधिकारिक एंट्री अकादमी अवार्ड यानी ऑस्कर के लिए भेजी थी. तब से लेकर अब तक करीब भारत की तरफ से लगभग 60 से ज्यादा फिल्में भेजी जा चुकी हैं, लेकिन फोरेन फिल्म की कैटेगरी में जीत का खाता आज भी शून्य है. भारत ने तकनीकी श्रेणियों (जैसे गाना, कॉस्ट्यूम, साउंड) में तो झंडे गाड़े हैं, लेकिन एक ‘फिल्म’ के तौर पर हम दुनिया के सबसे बड़े मंच पर कभी नंबर-1 नहीं बन पाए.

इतिहास के वो 3 घाव, जब जीतते-जीतते रह गया भारत
भारतीय सिनेमा के इतिहास में केवल तीन ही ऐसे मौके आए जब हम ‘जीत’ के बिल्कुल करीब यानी फाइनल नॉमिनेशन (टॉप 5) तक पहुंचे थे.
1.मदर इंडिया (1958)
ऑस्कर में भारत की पहली और सबसे बड़ी उम्मीद. महबूब खान की इस एवरग्रीन फिल्म के बारे में कहा जाता है कि यह इटली की फिल्म ‘नाइट्स ऑफ कैबिरिया’ से मात्र 1 वोट के अंतर से हार गई थी. ये हार आज भी भारतीय फिल्म जगत के लिए सबसे बड़ा ‘मलाल’ है.
2.सलाम बॉम्बे! (1989)
मीरा नायर की इस फिल्म ने 31 साल के सूखे को खत्म कर भारत को नॉमिनेशन दिलाया. मुंबई की सड़कों पर रहने वाले बच्चों की इस कच्ची और असली कहानी ने दुनिया को भावुक कर दिया, लेकिन ट्रॉफी हाथ नहीं आई.
3.लगान (2002)
आमिर खान की ‘लगान’ ने पूरे देश में ऑस्कर का बुखार चढ़ा दिया था. लगान के डायरेक्टर आशुतोष गोवारीकर और आमिर खान ने महीनों तक अमेरिका में फिल्म की कैंपेनिंग की. फिल्म फाइनल 5 में पहुंची, लेकिन अंत में ‘नो मैन्स लैंड’ बाजी मार ले गई.
अलग है रहमान और ‘नाटु-नाटु’ की जीत
- अक्सर लोग यह समझते हैं कि ए.आर. रहमान या ‘आरआरआर’ की जीत भारतीय फिल्म की जीत है. लेकिन यहां हमें तकनीकी बारीकी समझना जरूरी है.
- ए.आर. रहमान और गुलजार ने साल 2009 में ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के लिए ऑस्कर जीता, लेकिन वो फिल्म मूल रूप से एक ब्रिटिश प्रोडक्शन थी. आरआरआर ने साल 2023 में अपनी फिल्म ‘नाटु-नाटु’ के लिए बेस्ट ओरिजिनल सॉन्ग जीता, लेकिन RRR उस साल भारत की तरफ से ‘बेस्ट इंटरनेशनल फिल्म’ की ऑफिशियल एंट्री नहीं थी. उस साल ‘छेलो शो’ को भारत की तरफ से भेजा गया था और ये जीत बेस्ट फॉरेन फिल्म कैटेगरी में नहीं मिली.
- गुनीत मोंगा की ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स (2023): ने ‘बेस्ट डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट’ कैटेगरी में जीत हासिल की, जो अपने आप में गर्व की बात है, लेकिन ये ‘इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ कैटेगरी नहीं थी.
आखिर भारत क्यों पिछड़ रहा है?
1. दरअसल ऑस्कर एक ‘चुनाव’ की तरह है. अकादमी अवॉर्ड्स में वोट देने वाले मेंबर्स (जूरी) की संख्या हजारों में है. उन्हें फिल्म दिखाने के लिए करोड़ों रुपये का पीआर (PR) और मार्केटिंग कैंपेन चलाना पड़ता है. भारतीय प्रोड्यूसर्स के पास अक्सर इसलिए बजट नहीं होता कि वे हॉलीवुड की सड़कों पर अपनी फिल्म के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगा सकें.
2. ज्यादातर विदेशी फिल्मों की लम्बाई बहुत कम होती है और जूरी अक्सर 90 से 120 मिनट की क्रिस्प फिल्में पसंद करती है. भारत की ढाई से 3 घंटे की फिल्में, जिनमें बीच-बीच में गाने और इंटरवल होते हैं, कई बार विदेशी जूरी को फिल्म की लय से भटका देते हैं.
3. भारत में ऑस्कर के लिए फिल्म चुनने वाली संस्था ‘फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (FFI) अक्सर विवादों में रहती है. कई बार बेहतरीन और ग्लोबल अपील वाली फिल्मों (जैसे ‘लंचबॉक्स’) को दरकिनार कर ऐसी फिल्में भेजी जाती हैं जो ऑस्कर के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं.
4. आलोचकों का तर्क है कि पश्चिमी जूरी भारत की उन्हीं फिल्मों को पसंद करती है, जिनमें गरीबी या संघर्ष दिखाया गया हो. जब हम ‘कंतारा’ या ‘तन्वी द ग्रेट’ जैसी विविधता भरी फिल्में भेजते हैं, तो शायद वे उनके सांस्कृतिक संदर्भ को समझ नहीं पाते.
5. दक्षिण कोरिया की ‘पैरासाइट’ या फ्रांस की फिल्में ऑस्कर से पहले कान्स या वेनिस जैसे फेस्टिवल्स में धूम मचाती हैं. भारतीय फिल्में अक्सर सीधे ऑस्कर की रेस में कूदती हैं, जिससे उनका ‘ब्रैंड नेम’ उतना मजबूत नहीं हो पाता.
क्या 2027 में बदलेगी तस्वीर?
‘होमबाउंड’ के बाहर होने से निराशा जरूर है, लेकिन हाल के वर्षों में भारत का ग्राफ बढ़ा है. ऑस्कर एकेडमी में अब सैकड़ों भारतीय सदस्य शामिल हो चुके हैं, जिससे वोटिंग पैटर्न में भारतीय फिल्मों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है. 2026 में भारत का हाथ भले ही खाली रहा हो, लेकिन ‘आरआरआर’ की ग्लोबल सफलता ने ये साबित कर दिया है कि अगर कंटेंट दमदार हो और मार्केटिंग सही हो, तो ऑस्कर दूर नहीं. वैसे तो 68 साल का इंतजार लंबा है, लेकिन जिस दिन हम अपनी कहानियों को वैश्विक स्तर पर सही तरीके से ‘पैक’ करना सीख जाएंगे, उस दिन ऑस्कर की ट्रॉफी मुंबई एयरपोर्ट पर जरूर लैंड करेगी.
ऑस्कर में फिर ‘नील बटे सन्नाटा’, 68 साल से ‘इंटरनेशनल फिल्म’ कैटेगरी में खाली हाथ भारत, आखिर कब खत्म होगा ये सूखा?
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