Entertainment: Netflix Movie: ‘सिंगल सलमा’ अकेली क्यों रह गई? बेटी की खुशियों का इजहार करता हुमा कुरैशी का किरदार कितना दमदार? – #iNA

हुमा कुरैशी की सिंगल सलमा फिल्म थिएटर में रिलीज हुई थी, संभव है तब इसे बहुत दर्शक नहीं मिले होंगे. लेकिन जब नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हुई तो इस किरदार की सराहना करने वालों की अब कमी नहीं. वास्तव में इस मिजाज की फिल्मों की खूबियां बड़े पर्दे की बजाय ओटीटी पर ही दिखती हैं. हक को ही लीजिए. यामी गौतम की हक ने थिएटर में रिकॉर्ड कलेक्शन नहीं किया लेकिन ओटीटी पर धूम मचा रही है. हुमा कुरैशी और श्रेयस तलपड़े की सिंगल सलमा भी रास आने लगी है. फिल्म के मकसद ने दर्शकों के दिलों दिमाग में आकार लेना शुरू कर दिया है. वास्तव में सिंगल सलमा केवल एक कुंआरी युवती की कहानी नहीं बल्कि उसके बहाने लखनऊ की ध्वस्त होती नवाबी विरासत और हालात को गिरवी रखी हवेली की दास्तां है.

नचिकेत सामंत के निर्देशन में बनी सिंगल सलमा की खासियत यही है यह किसी परंपरागत फॉर्मेट में नहीं बंधती. जिस तरह सलमा रि़ज़वी अपने किरदार में पुराने रिवाज और ख्यालात से जंग लड़ती है, उसी तरह यह फिल्म भी मनोरंजन और मैसेज के बीच तालमेल बनाती है. सलमा ऊपर से जितनी शांत दिखती है, उसके भीतर उतना ही तूफान है. वह एक नवाब खानदान की बेटी है. ऐसा नवाब जिसकी हवेली गिरवी पड़ी है.

सलमा की शादी सबसे बड़ी चिंता

सलमा उत्तर प्रदेश सरकार में नौकरी करती है. इंजीनियर है. स्मार्ट लखनऊ प्रोजेक्ट का हिस्सा है. पूरे घर की जिम्मेदारी उसके कंधे पर है. अपनी बजाय बहनों की शादी, माता-पिता की देखभाल और छोटे भाई की पढ़ाई को प्राथमिकता देती है. गिरवी पड़ी हवेली छुड़ाना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है.

सलमा रिज़वी को अपनी गिरवी पड़ी हवेली को छुड़ाने की जितनी चिंता है, उससे कहीं ज्यादा उसके हितैषियों को उसकी शादी की है. सलमा को वास्तव में ऐसा कोई लड़का मिलता ही नहीं जिससे वह शादी के बार में विचार कर सके. इसी कोशिश में उसका सामना लखनऊ के ही सिकंदर खान से होता है. सिकंदर का रोल श्रेयस तलपड़े ने बड़े ही सलीके से निभाया है. सिकंदर लखनऊ में ही रेडीमेड पोषाक का शोरूम चलाता है. सिकंदर से मिलकर सलमा पुराने ख्यालों वाले युवकों को लेकर पूर्वाग्रहों से मुक्त होती है.

लंदन जाकर बदली सलमा की दुनिया

धीरे-धीरे दोनों नजदीक होते हैं. शादी का फैसला करते हैं, दोनों की मंगनी होती है. लेकिन शादी से पहले सलमा को दो महीने के लिए स्मार्ट लखनऊ प्रोजेक्ट के सिलसिले में प्रतिनिधि मंडल के साथ लंदन जाना पड़ता है. लंदन जाने के बाद सलमा की जिंदगी में कई तरह के बदलाव आते हैं. लखनऊ की गलियों, आम लोगों के विचार, सोच के बीच बड़ी हुई सलमा को लंदन जाकर पता चलता है कि यहां की दुनिया इतनी विकसित कैसे हुई.

यहीं उसकी मुलाकात मीत सिंह साहनी से होती है, जिसका रोल सनी सिंह ने निभाया है. मीत के साथ वक्त गुजारने के बाद उसे अहसास होता है, हमारे परिवेश में लोग खुद की खुशी को दफ्न करके कितनी संकुचित जिंदगी को जीते हैं. जबकि उसके मुकाबले यहां के लोग हर प्रकार का आनंद उठाने में मशगूल होते हैं. जिंदगी को शौक और उल्लास से जीते हैं. नौकरी के साथ खेल कूद, रोमांस-रोमांच सब कुछ. दूसरी तरफ सिकंदर खान उसकी वापसी का इंतजार करता है.

जब सलमा बनी बिंदास जिंदगी की मालकिन

लेकिन इस बीच उसकी कुछ ऐसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल कर दी जाती है जो उसके परिवार, परिवेश और समाज के लिए उचित नहीं. लेकिन यही तस्वीरें एक दिन उसकी किस्मत का ताला खोल देती है और वह गिरवी रखी हवेली को छुड़ाती है और बिंदास जिंदगी की मालकन बन जाती है. लेकिन कैसे, यह सब जानने के लिए पूरी फिल्म देखें.

यकीनन सिंगल सलमा स्त्री प्रधान किरदार होकर भी नारी मुक्ति के नारों से लैस फिल्म नहीं है. यहां महिला आजादी की बात बिल्कुल नहीं की गई है. बल्कि मुक्ति से एक कदम बढ़कर यहां खुशी की ख्वाहिशें बुलंद की गई हैं. बेटी की खुशी, लड़कियों की तमन्ना और उसके सपनों के लिए भी मशविरा की वकालत है. सलमा ना तो प्रेमी संग भागती है और ना ही अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाती है.

वास्तव में वह एक किस्म की खुशी की तलाश में है, जिसे आमतौर पर मध्यवर्गीय परिवार की लड़कियां हासिल नहीं कर पातीं. इस आधार पर फिल्म की कहानी जितनी सरल लग सकती है, किरदार उतनी ही जटिल है. भले ही वह ढह चुके मुस्लिम सामंती खानदान की ऐसी लड़की है जिसे कदम-कदम पर परंपरागत सोच का सामना करना पड़ता है लेकिन वह जितनी आत्मविश्वासी है उतनी ही स्वाभिमानी भी. तीस साल की हो चुकी है, पर शादी की जल्दबाजी नहीं. परिवार, पड़ोसी और परिचित उसकी शादी के लिए चिंतित हैं. जबकि शादी के प्रति उसकी एक सोच है, जिसका खुलासा फिल्म के अंत में होता है.

हुमा और श्रेयस का अभिनय लाजवाब

सलमा जितनी परंपरावादी है, उतनी ही मॉडर्न भी. सलमा जितनी गंभीर है, उतनी ही चंचल भी. सलमा जितनी पारिवारिक है, आजाद ख्यालों के प्रति उतनी ही सजग भी. सबसे बड़ी बात ये कि हुमा कुरैशी सलमा के इन सभी मिजाज को बखूबी जीती है. वह दोहरे व्यक्तित्व को जीने वाली लड़की है. घर, परिवार, समाज के प्रति जितनी जिम्मेदार है, अपनी ख्वाहिशों की उड़ान के आगे उतनी ही बेपरवाह. उसे दकियानूस समाज के ख्यालात की कोई परवाह नहीं. श्रेयस तलपड़े जितने बेहतरीन दिखे, सनी सिंह भी उतने ही लाजवाब.

जिंदगी में शादी से बढ़कर भी बहुत कुछ है

फिल्म के अंदर सलमा जिस तरह की लड़की दिखाई गई है समाज में उसे खोजना बहुत आसान नहीं. मुदस्सर अजीज की लिखी कहानी में कुछ अतिरेक भी है. कहीं-कहीं जादुई-सी तो कुछ अनहोनी-सी घटनाएं भी हैं. वहां फिल्म थोड़ी कमजोर साबित हो जाती है लेकिन यह सब सिनेमाई पेशकश के लिए है. यथार्थ यही है कि सलमा एक मुस्लिम लड़की है जो यह जानती है कि जीवन में शादी से बढ़कर भी बहुत कुछ है. वह शादी के ज्यादा तवज्जो आत्म सम्मान और आजादी को देती है.

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