Entertainment: प्रकाश झा की ‘दामुल’ वाला बिहार 40 साल बाद भी कितना बदला, लालटेन क्रांति से बिजली बिगुल तक – #iNA

जाने-माने निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा ने अपनी कई फिल्मों में बिहार की राजनीति और उस राजनीति को प्रभावित करने वाले जातिवाद और अपराध का बखूबी चित्रण किया है. इन्हीं में उनकी एक शुरुआती फिल्म थी- दामुल. खुद प्रकाश झा बाद के दौर में जिस तरह की फिल्में बनाने लगे उसमें दामुल का दर्द कहीं खो गया. यह फिल्म सन् 1985 में आई थी. अब 2025 है. यानी चालीस साल हो गए इस फिल्म के आए हुए. इस बीच बिहार में लालू यादव की लालटेन क्रांति भी आई और अब मौके पर चौका मारते हुए नीतीश सरकार ने बिजली बिगुल भी फूंक दिया लेकिन खुशहाली की रोशनी अब भी संभावना है. बिहार में विधानसभा का चुनाव होने वाला है. लड़ाई आर-पार की छिड़ी है और नीतीश सरकार ने विपक्ष के मंसूबे पर बिजली गिरा दी.

गौरतलब है कि बिहार के इस चुनावी माहौल में पक्ष-विपक्ष के बीच जितने मुद्दे छाए हैं वे चालीस साल पहले दामुल के दौर में बरकरार थे और आज भी मौजू हैं. मसलन बेकारी, पलायन, सामाजिक हिंसा और जातिवाद का मुद्दा आज भी बना हुआ है. ये चुनावी राजनीति का अपना मिजाज है कि विपक्ष में रहने वाली हर पार्टी सत्ताधारी दल से इन मुद्दों पर सवाल करती है. बिहार में इन दिनों भी वही हो रहा है जो सालों पहले देखा गया. सियासत का स्थायी भाव कभी नहीं बदलता.

दमन के सहारे समाज में वर्चस्ववाद

दामुल की कहानी का मूल मकसद सामंतवादी सत्ता की क्रूरता को दर्शाना था और यह दिखाना भी था कि सामंत किस भांति दमन के सहारे अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कुख्यात रहा है. जिसके दो प्रमुख आधार थे, एक- बंधुआ मजदूरी और दूसरा- पलायन के हालात का निर्माण. दशकों बाद बिहार में बहार या कि लिट्टी चोखा खाएंगे बिहार में बस जाएंगे- जैसे लुभावने नारे तो खूब लगाए गए लेकिन दूसरी तरफ इसी के बरअक्स बिहार में का बा का प्रतिपक्षी नारा भी बुलंद हुआ तो इसकी भी अपनी बुनियाद थी.

हिंदी के प्रसिद्ध लेखक शैवाल की कहानी कालसूत्र पर आधारित दामुल उस वक्त की फिल्म है, जब बिहार की सत्ता पर अकेले कांग्रेस पार्टी का कब्जा था. राज्य की 9वीं विधानसभा में कुल मिलाकर चार मुख्यमंत्री बदले जा चुके थे. राजनीतिक तौर पर बिहार में उथल-पुथल का भी दौर था. बाढ़, नक्सलवाद, जातीय हिंसा और बेरोजगारी सबकुछ भयानक स्तर पर था. सुदूर गांवों में कमजोर वर्ग का शोषण चरम पर था. छोटे-बड़े सामंत बंधुआ मजदूरी कराकर गरीबों का शोषण कर रहे थे. जो उनके चंगुल से छूटे वे पंजाब कमाने निकल गए जो नहीं निकले वहीं सामंत की गोली के शिकार हो गए.

दामुल में अन्नू कपूर का किरदार इसी पीड़ित दलित परिवार का प्रतिनिधित्व करता है तो मनोहर सिंह सामंत जमींदार का. अन्नू कपूर ने संजीवना राम का किरदार निभाया है जिसे उसके गांव का सामंत पांडे साजिशन अपने जाल में फंसा लेता है और कर्ज नहीं चुकाने पर बंधुआ मजदूर बना लेता है. फिर एक दिन उसकी संपत्ति पर कब्जा करने के लिए उसे एक हत्या के जुर्म में फांसी के फंदे तक पहुंचने पर मजबूर कर देता है. वहीं दीप्ति नवल एक ऐसी जवान विधवा की भूमिका में थीं, गांव का जमींदार जिसका केवल दैहिक शोषण ही नहीं करता बल्कि उसकी संपत्ति पर भी कब्जा कर लेता है.

गरीब वर्ग सामंतों की लड़ाई के मोहरे

फिल्म में दो सामंतों के वर्चस्व की लड़ाई भी दिखाई गई है. दोनों दो अलग-अलग जाति के हैं. अलग-अलग राजनीतिक धारा के प्रतिनिधि भी. दोनों के तनाव के बीच दलित बस्ती को मोहरा बनाया जाता है. लेकिन जब दोनों सामंत ठेकेदारी में समझौता कर लेते हैं तो गरीब बस्ती को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है. जिसके बाद उसके सामने सिवाय गांव से पलायन करने के दूसरा चारा नहीं रह जाता. फिल्म उस दौर की कहानी कहती है जिसमें बताया गया है कि यहां से मजदूरों का पलायन किस हालात में होना शुरू हुआ. दोनों सामंत दो राजनीतिक दलों के प्रतीक की तरह हैं जो एक दूसरे की रस्साकशी में आम गरीबों का केवल भावनात्मक दोहन करते हैं. दामुल इस स्तर की राजनीति भी दिखाती है.

जब पलायन का दायरा बढ़ने लगा

हालांकि सन् 1990 के बाद बिहार के सामाजिक हालात में बड़ा परिवर्तन आया. लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने. उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न लालटेन था, लिहाजा उनके शासनकाल को बिहार में लालटेन युग भी कहा गया क्योंकि बिजली हमेशा नदारद रहती थी. वैसे लालू यादव ने अपनी भाषण शैली से बिहार की सामाजिक संरचना को झकझोर के रख दिया. जो दलित, गरीब, किसान, मजदूर पहले के दौर में दबे-कुचले कहे जाते थे, उनमें आत्मविश्वास जाग उठा. लेकिन इस सामाजिक परिवर्तन के बावजूद राज्य में रोजगार, शिक्षा, व्यापार आदि में सुधार नहीं हुए. लिहाजा पहले जो पलायन केवल मजदूर वर्ग तक सीमित था उसका दायरा बढ़ गया. अमीर वर्ग की नई पीढी ने भी नौकरी और डिग्री के लिए बिहार छोड़ना शुरू कर दिया.

आज क्या है पलायन का हाल?

बेशक आज का बिहार दामुल की ग्रामीण पृष्ठभूमि वाला बिहार नहीं है लेकिन इस फिल्म में दिखाए गए बेकारी और पलायन दो ऐसे बुनियादी सवाल थे, जिसका जवाब भी आज के बिहार के पास नहीं है. इस मोर्चे पर बिहार नहीं बदला. कुछ आंकड़ों पर गौर कीजिए. बिहार से हर साल पचास लाख लोगों का रोजगार के लिए पलायन होता है. ये आंकड़े केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के है. मंत्रालय के मुताबिक बिहार मूल के करीब तीन करोड़ लोग दूसरे राज्यों में रोजी-रोजगार के लिए रह रहे हैं.

बेशक पिछले कुछ सालों में बिहार में बहुत से किसान मजदूरों की घर वापसी भी हुई है लेकिन जातिगत आधारित गणना का आंकड़ा चौंकाने वाला है. जातिगत गणना के मुताबिक आज की तारीख में सबसे ज्यादा सवर्ण समुदाय का पलायन हुआ है, यह आंकड़ा 9.98 फीसदी है. दरअसल जो लोग बिहार में उत्तम जीवन शैली और शिक्षा के योग्य माहौल नहीं पा रहे वे दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू, चेन्नई या दूसरे राज्यों में जाकर रहने को मजबूर हैं. इस तरह दामुल में दिखाए गए पलायन का दायरा आज और भी बढ़ गया. अब बिजली बिगुल से कितनी चकाचौंध आएगी, इसका इंतजार रहेगा.

बिहार की सामाजिक-राजनीतिक-आपराधिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों पर विश्लेषण जारी है.

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प्रकाश झा की ‘दामुल’ वाला बिहार 40 साल बाद भी कितना बदला, लालटेन क्रांति से बिजली बिगुल तक

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