Entertainment: Sholay-The Final cut: शोले में कानून को दी गई चुनौती तो ‘परिवार नियोजन’ पर भी था तंज! समझिए कैसे? – #iNA

रमेश सिप्पी की ऑलटाइम ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले पचास साल बाद दोबारा रिलीज हुई है. इस बार दर्शक इसे ना केवल 4k क्वालिटी में रीस्टोर्ड वर्जन के साथ आनंद उठा रहे हैं बल्कि सेंसर किए गए कुछ सीन के साथ भी देख रहे हैं. डॉल्बी 5.1 साउंड में ओरिजनल क्लाइमेक्स का भी मनोरंजन है. गौरतलब है कि देश में लगे राष्ट्रीय आपातकाल के सख्त नियमों के चलते फिल्म को कुछ कट्स के साथ 15 अगस्त 1975 को रिलीज किया गया था. इसके बावजूद फिल्म के कॉन्टेंट और डायलॉग खूब मशहूर हुए थे. कुछ मसलों को लेकर फिल्म बहस में भी आई. खासतौर पर ठाकुर बलदेव सिंह और डाकू गब्बर सिंह की दुश्मनी में कानूनी उसूलों की जिस प्रकार से धज्जियां उड़ाई गईं, उस पर गाहे-बहागे चर्चा आज भी होती है. इसी के साथ जय-वीरू बने धर्मेंद्र और अमिताभ के कुछ ऐसे हास्यापरक संवाद भी थे जो परिवार नियोजन कार्यक्रम पर तंज प्रतीत होते हैं.
सबसे पहले बात शोले में कानून को दी गई चुनौती की. शोले आखिर कौन सी सामाजिक समस्या की तरफ इशारा करती है, यह तो आज तक ठीक से किसी को पता नहीं चल सका लेकिन निर्देशक रमेश सिप्पी और लेखक सलीम-जावेद की जोड़ी ने इस फिल्म को हर तरह से बहुत ही चुनौतीपूर्ण जरूर बना दिया था. इस आर्टिकल में फिलहाल हम केवल कानूनी उसूलों की चुनौती की बात करेंगे. फिल्म के कथानक में ठाकुर यानी संजीव कुमार पहले पुलिस इंस्पेक्टर होते हैं. कानून के रखवाले हैं. ईमानदार छवि है. अपराधी कांपते हैं. इसी तेवर में वह डाकू गब्बर सिंह को जेल की सलाखों के पीछे भेजते हैं.
कानून का रखवाला कैदियों की मदद लेता है
लेकिन इसके बाद कहानी गब्बर बनाम ठाकुर की हो जाती है. चूंकि गब्बर सिंह डाकू है, आदतन जेल से भागने के बाद वह ठाकुर के पीछे पड़ जाता है, उसके दोनों हाथ काट देता है और समूचे परिवार को खत्म कर देता है. संयोगवश राधा बच जाती है. इसके बाद निहत्था ठाकुर खूंखार डकैत से बदला लेने के लिए दो सजायाफ्ता कैदियों की मदद लेता है. कहानी की फैंटेसी बहुत ही चौंकाती है. जिस पूर्व पुलिस ऑफिसर के दोनों हाथ कटे हैं वह दुर्दांत डाकू से बदला लेने के लिए दो ऐसे बदमाशों को अपने हाथ बनाता है जो कानून की नजरों में गुनहगार है. ठाकुर कितना बदल चुका है, एक समय जो कानून का रखवाला था, वही दूसरे समय में कानून को तोड़ने वाले को हायर करता है. इसको वह जस्टीफाई भी करता है कि लोहा लोहे को काटता है.
क्लाईमेक्स में कानून को पैरों तले कुचला गया
शोले में ठाकुर के सीने में बदले की आग इतनी धधक रही है कि वह कीलनुमा जूते से गब्बर सिंह को कुचल कर मार डालना चाहता है. रमेश सिप्पी और लेखक सलीम-जावेद ने इस कहानी का पहले जो मूल ड्राफ्ट तैयार किया था और उसके मुताबिक ठाकुर के पैरों तले से क्रूरता से गब्बर सिंह को मार डालने का क्लाईमेक्स सूट किया था, उसका एक मैसेज जा रहा था- कि ठाकुर ने कानून को अपने हाथों में नहीं लिया बल्कि कानून को पैरों तले कुचला. क्रूरता का जवाब क्रूरता से दिया. हालांकि तब के सेंसर बोर्ड के आदेश पर उसे बदल दिया गया, जिसे पचास साल बाद दर्शक फिर से उस क्लाईमैक्स को देख रहे हैं. तब बोर्ड का तर्क था कि इससे समाज में हिंसा को बढ़ावा देने वाला संदेश जा सकता है.
‘बच्चे दो ही अच्छे’ के दौर में ‘ढेर सारे बच्चे’
शोले में कानून को दी गई चुनौती वाले प्रसंग के बाद अब आइये बताते हैं कि जाने-अनजाने फिल्म में परिवार नियोजन का कैसे मखौल भी उड़ा दिया गया था. लेकिन उससे पहले जान लीजिए कि देश में सन् 1956 में ही परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत हो गई थी. जनसंख्या विस्फोट जैसे हालात सत्तर के दशक में दिखने लगे थे. यही वजह थी कि सन् 1970 में सबसे पहले नारा दिया गया- ‘बच्चे दो ही अच्छे’. बाद में ‘छोटा-परिवार सुखी परिवार’ का नारा भी बुलंद किया गया था. लेकिन शोले के वीरू और जय के एक सीन के संवाद सुनेंगे तो इसमें इस प्लानिंग और स्लोगन का मखौल दिखेगा.
अब ये संवाद लेखक सलीम-जावेद ही बता सकते हैं कि इस हास्यपरक संवाद के पीछे उनका कौन-सा मंसूबा छिपा था. यह केवल हास्य के प्रयोजन के लिए था या इसमें वाकई परिवार नियोजन कार्यक्रम पर तंज था. हालांकि सन् 1975 तक आते-आते देश के जो सामाजिक हालात बनने लगे थे उसे देखते समझते हुए पहली नजर में तो यह राजनीतिक तंज ही प्रतीत होता है. बहरहाल वीरू और जय के दोनों सीन और संवाद निम्न प्रकार से हैं-
सीन- एक.
फिल्म में कोई हसीना जब रूठ जाती है… गाना खत्म हो चुका है. अगले सीन में चट्टान पर अमिताभ बच्चन धूप में जरा आराम मुद्रा में लेटे हैं, वहीं दूसरी तरफ धर्मेंद्र ने दारू की बोतल थाम रखी है. तभी धर्मेंद्र कहते हैं- आज मैंने कुछ सोचा है.
अमिताभ- हां, कभी-कभी ये काम भी कर लेना चाहिए.
धर्मेंद्र- आज मैंने बहुत बड़ा फैसला किया है.
अमिताभ- मैं बताऊं तुम्हारा फैसला क्या है.. तू बसंती से शादी करना चाहता है.
धर्मेंद्र- वाह वाह…एक यार ही दूसरे यार का फैसला जान सकता है.
अमिताभ- और इस साल शादी का ये तेरा आठवां फैसला है.
इसके बाद धर्मेंद्र अमिताभ को मौसी से बसंती के साथ शादी की बात करने के लिए कहते हैं. लेकिन जब अमिताभ इनकार कर देते हैं तब धर्मेंद्र के डायलॉग पर गौर कीजिए. धर्मेंद्र नशे में धुत् होकर लगातार बोलते जाते हैं- जरा सोच, शादी के बाद एक घर होगा…एक बीवी होगी…सात-आठ बच्चे होंगे…और तुम्हें ही तो चाचा-चाचा बोलकर कहानियां सुनाने की जिद करेंगे…
जी हां, गौर कीजिए ‘सात-आठ बच्चे होंगे’… धर्मेंद्र से इस फिल्म में यह डायलॉग बोलवाया गया.
सीन- दो.
अब जरा दूसरे सीन पर आते हैं. अमिताभ और जया के बीच भावनाओं की तार जुड़ने लगती है. जया के लैम्प बुझाने और अमिताभ के माउथ ऑर्गन पर संगीत की धुन छेड़ने में एक अव्यक्त-सा रिश्ता बनने लगता है. दोनों तरफ संवेदनाएं जाग चुकी होती हैं. ऐसा कई बार होता है. इसके बाद के एक सीन में अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र एक साथ ठाकुर के सामने वाले बंगले के बरामदे पर हैं. इस बार धर्मेंद्र आराम की मुद्रा में लेटे हैं और अमिताभ जरा उलझन में हैं.
अब दोनों के बीच के संवाद पर गौर कीजिए-
अमिताभ- वीरू, मैंने एक फैसला किया है.
धर्मेंद्र- अच्छा, अब तू भी फैसला करने लगा!
अमिताभ- हां, यार तू तो कर ही रहा है, सोचा मैं भी शादी कर लूं.
धर्मेंद्र- (ठहाके के साथ) यार अब तू भी शादी करेगा!
अमिताभ- हां, यार, अब तो यही सोचा है कि एक सीधी सादी जिंदगी हो, एक घर हो, बीवी हो, ढेर सारे बच्चे हो. तेरे कंधे पर खेले और तू उन्हें कहानियां सुनाएं.
जी हां, अब गौर कीजिए ‘ढेर सारे बच्चे होंगे’… यह संवाद इस बार अमिताभ बच्चन की जुबान से इस फिल्म में बोलवाया गया था.
वीरू और जय के इन संवादों में ‘सात-आठ बच्चे’ और ‘ढेर सारे बच्चे’ पर कभी गौर नहीं किया गया. दर्शकों ने इसे महज हास्यबोध के साथ सुनकर टाल दिया है. वैसे लेखक-निर्देशक और दर्शक शायद ये समझने और समझाने की कोशिश करें कि जय और वीरू तो बदमाश हैं, चोरी-चकारी करते हैं और जेल आते-जाते हैं, वह क्या जाने परिवार नियोजन!
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