Entertainment: Sholay 15 अगस्त को ही क्यों रिलीज हुई, हिंसा प्रधान फिल्म के लिए स्वतंत्रता दिवस का मौका चुने जाने का मतलब – #iNA

शोले रिलीज के आज पचास साल पूरे हो गए. यह फिल्म सन् 1975 में 15 अगस्त को रिलीज हुई थी. इस आधी सदी में पीढ़ियां निकल गईं लेकिन पचास साल बाद भी शोले की चिंगारी में ताप बाकी है. बहुत जान है इसकी ताप में. शोले के डायलॉग आज फिर दोहराये जा रहे हैं, सीन-दर-सीन याद किये जा रहे हैं, पर्दे के पीछे के किस्से-कहानियां गॉसिप का हिस्सा हैं. शोले ने क्यों और कैसे इतिहास रचा, इस पर फिर से नया विमर्श चल रहा है. लेकिन इसी बीच एक अहम सवाल ये है कि शोले इतनी हिंसा प्रधान फिल्म थी, जिसमें क्रूरता की सारी हदें पार हो गई तो फिर यह स्वतंत्रता दिवस जैसे मौके पर क्यों रिलीज हुई.

इसे 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्व के दिन रिलीज करने का विचार क्यों बना. इसका क्या औचित्य था. क्योंकि मोटे तौर पर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में 15 अगस्त या 26 जनवरी के अवसर पर राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत या सामाजिक भाईचारा का संदेश देने वाली फिल्में रिलीज करने का रिवाज रहा है. शोले से पहले देशभक्ति की भावनाओं वाली कई फिल्में इस दिन रिलीज हुई थीं.

15 अगस्त पर देशभक्ति फिल्मों का रिवाज

हाल के सालों में इस रिवाज का और भी शिद्दत से पालन किया जा रहा है. मसलन चक दे इडिया, एक था टाइगर, शेरशाह, मिशन मंगल, गदर 2 या सत्यमेव जयते आदि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रिलीज हुईं वहीं लगान, बॉर्डर, रंग दे बसंती, राज़ी और उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक भी गणतंत्र दिवस से पहले रिलीज हुई थीं. कुछ पुरानी और प्रमुख हिंदी फिल्मों की रिलीज की तारीख गौर करें तो सुभाष घई की कर्मा 8 अगस्त को रिलीज हुई थी तो उससे पहले भारत कुमार के उपनाम से मशहूर मनोज कुमार की फिल्म उपकार स्वतंत्रता दिवस से पूर्व 11 अगस्त को रिलीज हुई थी. यह लिस्ट लंबी हो सकती है.

मार धाड़, हिंसा वाली फिल्म 15 अगस्त को

लेकिन शोले जैसी मार धाड़, हिंसा, हत्या, गोली, बारूद और आग उगलते गुस्से वाली फिल्म का इस दिन से क्या वास्ता. जिस फिल्म में डाकू एक पूरे परिवार का खात्मा कर देता है, ठाकुर के दोनों जवान बेटों, एक बहू, शादी के योग्य जवान बेटी की हत्या कर देता है, उसे इस दिन क्यों रिलीज किया गया. जिस फिल्म में डाकू गब्बर निहायत ही क्रूरता से ठाकुर के मासूम पोते के सीने पर गोली उतार देता है, इमाम साहब के किशोर वय बेटे अहमद की हत्या करके उसकी लाश को घोड़े पर लाद कर रामगढ़ गांव भेज देता है, जहां खौफ और मातम पसर जाता है. इमाम कहते हैं- उसके दो-तीन बेटे और क्यों न हुए जो इस गांव के काम आते. ऐसी खौफनाक दहशत भरी कहानी कहने वाली शोले को राष्ट्रपर्व पर देश भर में आखिर क्यों प्रदर्शित किया गया. इसका जवाब खोजा जाना चाहिए.

पारसी थिएटर की चीखने वाली मंचीय शैली

जबकि शोले फिल्म की कहानी बहुत तरह की विडंबनाओं से भरी है, कई सारे सीन और संवाद सालों से सवालों में रहे हैं. विदेशी फिल्मों की नकल से लेकर उसके औचित्य तक. उस दौर में जब हिंदी फिल्में पारसी ड्रामा की मंचीय शैली को धीरे-धीरे मुक्त हो रही थी, तब शोले ने सिल्वर स्क्रीन पर पारसी थिएटर को फिर से जिंदा कर दिया. गौर से देखिए तो यहां के सारे कलाकार ऊंचे स्वर में संवाद बोलते हैं मानो मंच के सामने बैठी जनता में सबसे आखिरी छोर के दर्शकों तक अपनी बात पहुंचानी हो.

गुजरे जमाने में पारसी थिएटर की यह एक खास विशेषता होती थी. मंच पर कलाकार चीख-चीख कर डायलॉग बोलते थे. बाद में इस शैली को राजनीतिक रैलियों के मंच पर नेताओं ने अपना लिया. फिल्म में अंग्रेज के जमाने के जेलर और सूरमा भोपाली के प्रसंग भी पारसी थिएयर के नाटकों में इस्तेमाल होने वाले प्रहसन जैसे ही थे. मूल कहानी से उसका कोई मेल नहीं था.

शोले की मूल कहानी पुलिस इस्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) और डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) की दुश्मनी है. बाकी कहानियां इसके ईर्द-गिर्द मनोरंजन मसाला के लिए बुनी गई हैं. और इसी कहानी में छिपी है आजादी और सामाजिक भाईचारा की मूल भावना. समझिए कैसे. गब्बर सिंह एक ऐसा डाकू है, जिसका खौफ उसके ठिकाने से पचास-पचास कोस दूर तक फैला हुआ है. ठाकुर जब जय-वीरू (धर्मेंद्र-अमिताभ बच्चन) को हायर करने के बाद गब्बर को जिंदा पकड़ने के लिए कहते हैं तो वीरू कहता है- ठाकुर साहब, गब्बर कोई बकरी का बच्चा है जो गया और पकड़ लिया. मतलब ये कि जय-वीरू जैसे बदमाश भी जानते हैं गब्बर से मुकाबला आसान नहीं. गब्बर से लड़ाई मतलब मौत की दावत.

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गब्बर ना हिंदू, न मुस्लिम, पूरे समाज का दुश्मन

अब डाकू गब्बर सिंह के चरित्र को देखिए. वह पूरे सामाजिक भाईचारा और अमन का दुश्मन बन चुका है. उसका गिरोह न हिंदू देखता है न मुस्लिम. जो उसकी राह में आता है, उसकी वह हत्या कर देता है. वह ठाकुर के पोते का भी हत्यारा है तो जबलपुर बीड़ी के कारखाने में काम के लिए घर निकले नवयुवक अहमद मियां का भी कातिल. गब्बर सिंह के गिरोह के लोग गांव में उसी तरह से अनाज लूटने आते हैं जैसे अंग्रेज लगान में बोरे के बोरे अनाज वसूलते थे. नहीं देने पर गांव के गरीब किसान पर जुल्म ढाते थे. फिल्म में जिस वक्त की यह कहानी दिखाई गई है, देश को आजाद हुए तकरीबन पच्चीस बरस बीत गये थे. देश अंग्रेजी दास्तां और जुल्म से तो आजाद हो गया था लेकिन गब्बर सिंह जैसे डाकुओं का खौफ कायम था.

अंग्रेजों की तरह गांवों में अनाज लूटता था

फिल्म का एक सीन याद कीजिए. गांव में गब्बर सिंह गिरोह के डाकू धावा बोल देते हैं. लोग अपने-अपने घरों में डर के मारे चले जाते हैं. खिड़की, दरबाजे बंद कर लेते हैं. तब घोड़े पर सवार कालिया चीखता है- अरे ओ कांशीराम, अरे ओ धौलिया, कहां मर गए सब लोग…
तभी एक शख्स घर के अंदर से अपने कंधे पर अनाज से भरा बोरी लाकर उसके सामने रखता है.

कालिया कहता है- आओ आओ शंकर, क्या लाए हो.

शंकर किसान-मालिक ज्वार लाया हूं.

कालिया- मालिक के बच्चे, हमारे लिए ये आधी मुट्ठी ज्वार लाया है, और बाकी क्या अपनी बेटी की बाराती के खिलाने के लिए रखी है.

शंकर किसान- माई-बाप जितनी थी, सब लाया हूं.

कालिया- जिस दिन एक गोली उतर गई खोपड़ी में, जितना भेजा है सब निकल आएगा

तभी गांव के कुछ और किसान अपने-अपने घर से अनाज आदि निकाल कर लाते हैं.

कालिया बोलता है- क्या लाये हो धौलिया…

धोलिया बोलता है- गेहूं है मालिक…

कालिया- ठीक है, रख दो सब माल वहीं पर.

लेकिन तभी ठाकुर वहां आते हैं और कहते हैं- ठहरो. वह कालिया को ललकारते हैं. गांव वालों को अपना-अपना अनाज वापस ले जाने को कहते हैं. कालिया को पानी की टंकी पर खड़े बंदूक लहराते जय और वीरू को दिखाते हैं और बोलते- मौत तुम्हारे सर पर खेल रही है कालिया… जाओ गब्बर से कह देना रामगढ़ वालों ने पागल कुत्तों से सामने रोटी डालना बंद कर दिया है.

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ठाकुर ने दिलाई रामगढ़ को गब्बर से आजादी

वास्तव में रामगढ़ जैसे गांव में गब्बर सिंह के खौफ से आजादी की यह पहली मुनादी थी. जय और वीरू देखते ही देखते गांव में हीरो बन जाते हैं. दोनों को गांववाले कंधों पर बिठा लेते हैं और गांव में जश्न का माहौल शुरू हो जाता है. लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू होती है. गब्बर सिंह खाली हाथ लौटे कालिया समेत अपने तीन डाकुओं को देखकर आग बबूला हो जाता है. और ठाकुर से बदला लेने की नई रणनीति बनाता है. वह होली का दिन चुनता है और रामगढ़ में लूटपाट करने के लिए फिर से धावा बोलता है.

लेकिन ठाकुर भी कहां मानने वाले थे- ठाकुर न झुक सकता है, न टूट सकता है, ठाकुर सिर्फ मर सकता है. जय और वीरू जोकि आदतन अपराधी हैं, वे दोनों इस गांव में आकर धीरे-धीरे बदलने लगते हैं. नई जिंदगी जीने लगते हैं. प्यार-मोहब्बत, खेती, किसानी, शादी, परिवार और बच्चे के बारे में सोचने लगते हैं. बाजू कटे ठाकुर के दोनों हाथ बनकर गब्बर से लोहा लेते हैं. गांव में खुशहाली लाने और डाकुओं के खौफ से आजादी दिलाने की इस लड़ाई में जय भले ही कुर्बान हो जाते हैं लेकिन वीरू गब्बर को मार-मार कर पस्त कर देता है. अंत में ठाकुर अपने सीने में बदले के दहकते शोले रोककर गब्बर को पुलिस के हवाले कर देते हैं. इस प्रकार रामगढ़ ही नहीं आस-पास के तमाम गांव गब्बर के गिरोह की दहशत से आजाद हो जाते हैं.

हालांकि फिल्म में स्वतंत्रता दिवस का जिक्र नहीं

हालांकि पूरी फिल्म में कहीं भी ना तो स्वतंत्रता दिवस दिखाया गया है न गणतंत्र दिवस. हां, दो बार होली के प्रसंग और सीन जरूर हैं. अच्छा होता फिल्म में कहीं पुलिस इस्पेक्टर पद पर कार्यरत रहते ठाकुर बलदेव सिंह तिरंगा फहराते हुए दिखते. या इससे जुड़ा कोई संवाद बोलते. लेकिन ऐसा नहीं था. दर्शकों ने पंद्रह अगस्त के मौके पर गब्बर जैसे दुर्दांत डकैत का अंत देखा. ठाकुर ने इसके लिए पूरे परिवार की कुर्बानी दी. वीरू ने दोस्त खोया और इमाम साहब ने जवान बेटा. रामगढ़ को इतनी कीमत चुकाने के बाद मिली आजादी.

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Sholay 15 अगस्त को ही क्यों रिलीज हुई, हिंसा प्रधान फिल्म के लिए स्वतंत्रता दिवस का मौका चुने जाने का मतलब

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