Entertainment: Throwback: 49 साल पहले पॉपुलर गाना था ‘दो दीवाने शहर में’, गुलजार ने जीता था फिल्मफेयर, अब टाइटल पर आई फिल्म चर्चा में – #iNA

Do Deewane Shaher Mein Film Title on Popular Song: दौर सोशल मीडिया का है और इस दौर में कुछ चले ना चले ट्रेंड हमेशा चलता है. जो ट्रेंड बन गया वही चलेगा. मौजूदा समय में जैसे हॉरर कॉमेडी फिल्मों का ट्रेंड चल रहा है. एक के बाद एक 3-4 सालों में कई सारी ऐसी फिल्में आई हैं जो हॉरर-कॉमेडी जॉनर की रही हैं. इन फिल्मों में कई ने तो अच्छा परफॉर्म भी किया है. मतलब कि ऑडियंस को रास आ रही हैं. वैसे ही एक ट्रेंड और चल पड़ा है. वो है पुराने गानों से फिल्म का टाइटल उठाना. पिछले कुछ सालों में कई सारी ऐसी मूवीज देखने को मिली हैं जिनका टाइटल किसी पुराने गानों की लिरिक्स पर बेस्ड होता है. आमतौर पर अधिकतर केसेज में तो पुराने गानों के टाइटल पर ही फिल्मों का नाम रखा जा रहा है.
हॉरर कॉमेडी वाला ट्रेंड सक्सेसफुल रहा है और मनोरंजन से भरपूर रहा है. लेकिन ये फिल्मों का टाइटल गानों से उठाने वाला ट्रेंड कुछ खास हजम नहीं हो रहा. बॉलीवुड की फिल्मों की मूल भाषा हिंदी है. ऐसे में हिंदी के विशालकाय शब्दकोश में क्या शब्द कम पड़ गए? या इंडस्ट्री के फिल्ममेकर्स पुरानी लोकप्रियता के सहारे ही अपनी सक्सेस की रोटी सेंक रहे हैं और पुराने गानों के टाइटल से फिल्मों के नाम चुन रहे हैं. ऐसा अगर कुछ मौकों पर किया जाता है तो कोई ऐतराज नहीं लेकिन बार-बार ऐसा देखने को मिल रहा है.
लो चल पड़ा एक नया ट्रेंड…
उदाहरण के तौर पर अजय देवगन की दे दे प्यार दे, रणबीर कपूर की बचना ए हसीनों, ओम शांति ओम और कभी अलविदा ना कहना जैसी फिल्मों के नाम गानों के टाइटल पर ही रखे गए हैं. चलिए चाहें जो भी हो लेकिन इन टाइटल्स के जरिए कम से कम एक बार फिर से कोई पुराना गाना हाइलाइट हो जा रहा है और बॉलीवुड के गोल्डन एरा के सुनहरे गीत रात के अंधेरे में टिमटिमाते तारों की तरह जगमगा जा रहे हैं.
जैसे हाल ही में सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की फिल्म दो दीवाने शहर में रिलीज हुई मेरे जेहन में भूपिंदर सिंह और रूना लैला की आवाज में गुलजार का लिखा गीत दो दीवाने शहर में गूंज उठा. मैंने ये गाना टीवी पर सुना था. इस गीत को सुन कर और देखकर एक अलग सी ताजगी महसूस होती है. गाने में जयदेव ने गुलजार के बोलों को कुछ इस रिदम से पिरोया कि गीत अपने आप में एक मिशाल बन गया. इसके लिए गुलजार साहेब को बेस्ट लिरिसिस्ट के फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था.
जब तारे जमीं पर चलते हैं…
40 साल पहले आई घरौंदा फिल्म का ये गाना अमोल पालेकर और जरीना वहाब पर फिल्माया गया था. इस गाने की वाइब आपमें अलग तरंग भर देगी. इसकी मस्तमौजी-मलंग धुन पर सजी गुलजार की सधी हुई लिरिक्स अलग ही माहौल बना देती है. जब दूसरा अंतरा शुरू होता है- ‘जब तारे जमीं पर चलते हैं आकाश जमीं हो जाता है, उस रात नहीं वो घर जाता वो चांद वहीं सो जाता है.’ जब ये लाइन भूपिंदर और रूना गाते हैं तो ऐसा लगता है कि मानें इंसान सुरों पर सफर कर सुकून की आकाशीय यात्रा पर है.
एक अकेला इस शहर में…
इसी तर्ज पर फिल्म में एक सोलो सॉन्ग भी है जिसके बोल हैं एक अकेला इस शहर में आबोदाना ढूंढता है. इस गाने में ठहराव जरा ज्यादा है लेकिन सुकून तो इसमें भी है, जरा खामोश कर देने वाला. दोनों ही गाने उस समय भी खूब पसंद किए गए थे और आज भी सुने जाते हैं. अगर सुने नहीं जाते तो कहीं ना कहीं इस्तेमाल में आ जाते हैं कहीं बजते हुए सुनाई दे देते हैं.
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49 साल पहले आई थी घरौंदा
1977 में आई इस फिल्म का निर्देशन भीमसेन ने किया था जिन्हें भारतीय फिल्म जगत में फादर ऑफ एनिमेशन माना जाता है. इस फिल्म में डॉक्टर श्रीराम लागो ने भी काम किया था और उन्हें शानदार एक्टिंग के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था. फिल्म अपने दौर की क्लासिक फिल्मों में शुमार की जाती है.
दो दीवाने शहर में फिल्म का हाल कैसा?
दो दीवाने शहर में फिल्म की बात करें तो ये फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज कर दी गई है. फिल्म से काफी उम्मीदें लगाई जा रही थीं लेकिन इस रोमांटिक फिल्म ने पहले दिन सैकनिल्क की रिपोर्ट्स के मुताबिक 1.25 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया है. मतलब कि फिल्म को अभी एक्सपेक्टेड ऑडियंस नहीं मिल रही है.
Throwback: 49 साल पहले पॉपुलर गाना था ‘दो दीवाने शहर में’, गुलजार ने जीता था फिल्मफेयर, अब टाइटल पर आई फिल्म चर्चा में
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