Entertainment: अभिनेत्री रेखा संसद की कार्यवाही में हिस्सा क्यों नहीं लेती थीं, जया की सीट वाला ‘सिलसिला’ था कारण? – #iNA

रेखा को अपने समय की सबसे ग्लैमरस अभिनेत्री का दर्जा हासिल रहा है. उसी रेखा को जब राज्यसभा सांसद के रूप में मनोनीत किए जाने की घोषणा हुई तो मीडिया में उनके फिल्मी गानों की बहार आ गई थी. ज्यादातर उमराव जान फिल्म के गाने बजाए जाते- इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं… या फिर सिलसिला फिल्म का गाना- ये कहां आ गए हम… इन गानों के बैकग्राउंड म्यूजिक पर ढेर सारे स्पेशल शोज बनाए जाने लगे थे. पत्र-पत्रिकाओं में इनके गानों की पंक्तियों पर आधारित आर्टिकल्स लिखे जाने लगे थे. यह साल 2012 का समय था. तारीख थी- 17 अप्रैल. तब तमाम लेखों और गॉसिप्स में तरह-तरह के सवाल उठते थे- आखिर इस पिक्चर के डायरेक्टर कौन. इशारा सोनिया गांधी की तरफ था. तब संसद में सपा की सांसद जया बच्चन भी होती थीं. यही वजह है कि सिलसिला पार्ट 2 भी गॉसिप का हिस्सा था.

साल 2012 में रेखा के साथ ही पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को भी राज्यसभा सांसद मनोनीत किया गया था. दोनों का चयन यूपीए सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना गया. रेखा ने जब संसद में कदम रखा तो लिखा जाने लगा- आ गईं रेखा, छा गईं रेखा- इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार… दीवारों दर को गौर से पहचान लीजिए… संसद में जब-जब रेखा आतीं- न्यूज़ मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक इन पंक्तियों के साथ उनकी तस्वीरें वायरल होतीं. ये अलग बात है कि संसद में रेखा का आना या न आना दोनों एक ही समान था. छह साल के अपने कार्यकाल में रेखा महज 18 दिन ही संसद में उपस्थित हुईं. तब उदास होकर लोगों ने लिखा- ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन सा दयार है… हद्दे निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है…

पूरे कार्यकाल में केवल 18 दिन रेखा क्यों आईं संसद?

अहम सवाल ये कि रेखा अपने छह साल के राज्यसभा सांसद के कार्यकाल में महज 18 दिन ही क्यों हाजिर हुईं. रेखा को जितने उत्साह के साथ संसद में लाया गया, उनके प्रशंसकों ने आगे बढ़कर उनका जिस अंदाज में गर्मजोशी से स्वागत किया, रेखा ने उतना ही सबको निराश क्यों कर दिया. रेखा को लेकर जितने भी रहस्य और राज़ हैं, उनमें एक सवाल यह भी है. इसका सही-सही जवाब अब तक सामने नहीं आ सका है कि रेखा संसद गैरहाजिर क्यों रहती थीं. अगर रेखा को संसद की कार्यवाहियों में सक्रियता से भाग नहीं लेना था, या उन्हें राजनीतिक चर्चाओं में कोई अभिरुचि नहीं थी, तो उन्होंने राज्यसभा सांसद बनना क्यों स्वीकार किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि संसद आने के बाद उनके इरादे बदल गए?

गौरतलब है कि बतौर सांसद अभिनेत्री रेखा का कार्यकाल 27 अप्रैल 2012 से लेकर 26 अप्रैल 2018 तक का रहा है. लोग सबसे ज्यादा बात पर अचंभित हुए कि रेखा अपने फेयरवेल पर भी नहीं पहुंचीं. क्या कोई नाराजगी थी, फिल्म शूटिंग की व्यस्तता थी या सेहत से जुड़ा कोई मसला था, या विदेश में थीं- ये सवाल आज भी रेखा के गहरे राज़ हैं. लेकिन उससे पहले रेखा को केंद्र में रखकर कई तरह की राजनीति हो चुकी थी.रेखा को राज्यसभा सांसद मनोनीत किए जाने के पीछे कई राजनीतिक कयासबाजी लगाई गई थी.

रेखा को सांसद बनाने का क्या मकसद था?

साल 2012 आते-आते केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगा था. सबसे पहली वजह यही समझी गई कि रेखा और सचिन अगर राज्यसभा सांसद बनते हैं तो सुर्खियां मिलेंगीं और महाराष्ट्र के साथ-साथ तमिलनाडु की सियासत को भी साधा जा सकेगा. याद कीजिए सचिन को साल 2013 में ही भारत रत्न सम्मान देने का ऐलान किया गया था. जबकि सांसद के रूप में रेखा की तरह ही सचिन की उपस्थिति भी काफी कम दिनों की थी, महज 23 दिन. ऐसा समझा जाता है रेखा को राजनीति में लाने के पीछे कांग्रेस का मकसद तमिलनाडु में एक लोकप्रिय चेहरा उतारना था तो संसद के भीतर जया बच्चन के खिलाफ एक स्टार चेहरा बिठाना था.

रेखा कांग्रेस के प्रस्ताव पर पहले तैयार तो हो गईं लेकिन उन्हें राजनीति रास नहीं आई. रेखा के सदन में प्रवेश करते ही सपा की राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने अपनी सीट बदल दी. उससे पहले रेखा के शपथ ग्रहण के समय एक दिलचस्प घटना हो चुकी थीं. उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रेखा जब शपथ ले रही थीं तब सबसे ज्यादा जया की प्रतिक्रिया और उनके चेहरे के भाव को परखा जा रहा था. यह मामला तब सदन में भी सभापति के समक्ष भी उठा था. कुछ सदस्यों ने इस बात पर आपत्ति दर्ज कराई कि जिस वक्त रेखा शपथ ले रही थीं, उस वक्त कैमरे का फोकस जया बच्चन के चेहरे पर क्यों था. चूंकि शपथ ग्रहण का सीधा प्रसारण दूरदर्शन पर हो रहा था और देश भर में इसे एक नजरिए से देखा जा रहा था. इससे गॉसिप्स को हवा दी गई.

Amitabh Rekha Jaya In Silsila

सिलसिला में अमिताभ, रेखा और जया

संसद में सिलसिला पार्ट 2 को लेकर गॉसिप गर्म

जाहिर है यह सारा मुद्दा ना तो रेखा को पसंद आया और ना ही जया बच्चन को. जैसा कि हम सभी जानते हैं रेखा और जया बच्चन ने अमिताभ बच्चन के साथ सबसे आखिरी बार सिलसिला फिल्म में काम किया था. दूसरी बात कि अमिताभ बच्चन और रेखा की नजदीकी को लेकर फिल्म पत्रकारिता में लंबे समय से गॉसिप्स चलती रही हैं. हालांकि अमिताभ बच्चन ने कभी भी अपने इस रिश्ते पर खुलकर बात की और ना ही जया और रेखा ने भी कुछ आधिकारिक तौर पर कहा है. हां, रेखा कई बार केवल इतना जरूर इजहार करती रही हैं कि वो अमिताभ बच्चन की बहुत बड़ी फैन हैं. तमाम फिल्मी समारोहों में जया और रेखा कई बार साथ-साथ नजर आ चुकी थीं. जब भी दोनों एक फ्रेम में दिखीं, दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगाया और एक-दूसरे का हाल चाल पूछा.

लेकिन संसद के अंदर का मामला पूरी तरह से राजनीतिक था. रेखा कांग्रेस की तरफ से मनोनीत सांसद थीं जबकि जया बच्चन समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सांसद थीं. तब राजनीतिक टीका-टिप्पणियों में रेखा के पीछे सोनिया गांधी को डायरेक्टर और जया के पीछे मुलायम सिंह यादव को डायरेक्टर बताया जा रहा था. वहीं संसद के अंदर रेखा और जया की उपस्थिति को सिलसिला पार्ट 2 कह कर भी तंज कसे जाते थे. ऐसे में रेखा के शपथ लेने के बाद जया बच्चन ने अपनी सीट बदलने की ठानी. पहले जया बच्चन 91 नंबर की सीट पर बैठती थीं लेकिन जैसे ही रेखा को 99 नंबर की सीट अलॉट हुई उन्होंने सीट बदलवाने की प्रार्थना आगे बढ़ाई. क्योंकि दोनों सीटें आस-पास ही थीं.

कैमरे के सिंगल फ्रेम में ना आएं, इसलिए बदली सीट

जया ये बिल्कुल नहीं चाहती थीं कि कैमरा उन दोनों को एक फ्रेम में कैप्चर करे और मीडिया में सुर्खियां बने. जया की इस अपील की बहुत चर्चा भी हुई लेकिन आखिरकार उनको रेखा के फ्रेम के दायरे से बहुत दूर 143 नंबर की सीट दे दी गई. अब दोनों एक फ्रेम में कैप्चर नहीं हो सकती थीं. सवाल अहम है क्या इन घटनाक्रमों ने रेखा को बहुत आहत किया, जिसके बाद उन्होंने संसद की कार्यवाहियों से ही दूरी बना ली? अपने छह साल के कार्यकाल में वह केवल 18 दिन ही आईं. कई बार तो कुछ ही घंटे के लिए आतीं और चली जाती थीं. वह किसी भी संसद सत्र के किसी एक दिन ही सदन में आती थीं.

वैसे फिल्म जगत से संसद के भीतर गए तमाम सितारों की उपस्थिति का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. भारत रत्न और स्वर कोकिला लता मंगेशकर के अलावा प्रख्यात फिल्मकार मृणाल सेन या बैजयंती माला जैसे कई सितारे सदन में कम ही आते थे. लता मंगेशकर केवल 12 दिन ही सदन में आ सकीं थीं. हालांकि उन्होंने ना तो कोई वेतन लिया और ना ही अन्य भत्ते लिये. वहीं दूसरी तरफ शबाना आजमी, जावेद अख्तर, जया प्रदा या उनसे भी पहले नरगिस, सुनील दत्त और पृथ्वीराज कपूर आदि सक्रियता से भाग लेते रहे हैं, मौके पर अपने विचार रखे और सवाल भी पूछे.

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