बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला सशक्तीकरण के सरकारी दावों के बीच अलीगढ़ का रोरावर-शाहजमाल इलाका एक अलग कहानी बयां कर रहा है। करीब एक लाख की आबादी वाले इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र में 36 साल से एक भी उच्च प्राथमिक विद्यालय नहीं खुल सका। नतीजा है कि हर साल सैकड़ों छात्राएं पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं। दूर स्थित विद्यालय, सुनसान रास्ते, हाईवे का खतरा और आर्थिक तंगी बेटियों की तालीम की राह में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।
बुधवार को प्राथमिक विद्यालय रोरावर में 466 बच्चों का पंजीकरण मिला जिनमें 245 छात्राएं थीं। विद्यालय परिसर में बच्चों की चहल-पहल तो दिखाई दी, लेकिन कक्षा पांच के बाद इन छात्राओं की शिक्षा का कोई स्पष्ट रास्ता नजर नहीं आया। आसपास एक भी उच्च प्राथमिक विद्यालय नहीं है। ऐसे में अधिकांश अभिभावक बेटियों को . पढ़ाने के बजाय घर बैठाना ही सुरक्षित समझते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इलाके में बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूर और निम्न आय वर्ग के परिवार रहते हैं। उनके लिए रोजी-रोटी की जद्दोजहद के बीच बेटियों को तीन से छह किलोमीटर दूर विद्यालय छोड़ना और वापस लाना संभव नहीं है। यही वजह है कि पांचवीं तक स्कूल पहुंचने वाली अनेक छात्राओं की पढ़ाई . नहीं बढ़ पाती।
पांचवीं के बाद कहां जाती हैं बेटियां?
कक्षा पांच के बाद रोरावर-शाहजमाल क्षेत्र की बेटियों के सामने पढ़ाई जारी रखना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए निजी स्कूलों की फीस वहन करना आसान नहीं है। सरकारी व्यवस्था में उन्हें शाहपुर कुतुब स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय जाना पड़ता है, जो करीब तीन किलोमीटर दूर है, जबकि तालसपुर कलां का विद्यालय लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर है। दूरी, सुनसान रास्ते और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण अधिकांश परिवार बेटियों को . नहीं पढ़ा पाते। नतीजतन बड़ी संख्या में छात्राएं पांचवीं के बाद घर बैठ जाती हैं और उनकी शिक्षा बीच में ही छूट जाती है।