अलीगढ़ में 400 पुलिसकर्मियों पर चला चाबुक: निचले अमले पर गिरती गाज, तो क्या ‘दूध के धुले’ हैं राजपत्रित अधिकारी?

आगरा ( मोहम्मद शाहिद कि कलम से ): उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में कानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने और पुलिस बल के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार, लापरवाही और अनुशासनहीनता को जड़ से समाप्त करने के उद्देश्य से हाल ही में एक अभूतपूर्व प्रशासनिक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ देखने को मिली है। जिले में ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की जिस नीति के तहत अपराधियों पर शिकंजा कसा जा रहा है, ठीक उसी तर्ज पर अब पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली को भी कठोर निगरानी के दायरे में लाया गया है। 20 सितंबर 2025 को अलीगढ़ जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के रूप में कार्यभार संभालने वाले नीरज जादौन के नेतृत्व में पिछले साढ़े सात महीनों के भीतर 400 से अधिक पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई की गई है। यह आंकड़ा न केवल जिले के पुलिस इतिहास में अप्रत्याशित है, बल्कि यह पूरे उत्तर प्रदेश पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली, जवाबदेही के पदानुक्रम और व्यवस्थागत विसंगतियों पर एक व्यापक बहस को भी जन्म देता है।
- अलीगढ़ में 'जीरो टॉलरेंस' नीति का क्रियान्वयन और दंडात्मक कार्यवाहियों का पैमाना
- पदों के आधार पर अनुशासनिक कार्यवाहियों का सांख्यिकीय विश्लेषण
- जन-शिकायत निवारण तंत्र और हेल्पलाइन का प्रभाव
- राजपत्रित अधिकारियों की अनुपस्थिति: एक ज्वलंत प्रश्न का प्रशासनिक अन्वेषण
- कमान का उत्तरदायित्व और संस्थागत भ्रष्टाचार की वास्तविकता
- उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 की जटिलताएं
- आगरा और प्रयागराज के उदाहरणों से तुलना
- राजपत्रित अधिकारियों पर कार्रवाई: एक दुर्लभ यथार्थ
- पुलिस बल के मनोबल पर प्रभाव और भविष्य की चुनौतियाँ
जनसामान्य और विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठना नितांत स्वाभाविक है कि जब किसी एक जिले में 400 पुलिसकर्मियों पर कदाचार और भ्रष्टाचार के आरोप में एक साथ कार्रवाई होती है, तो उस सूची में एक भी राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) का नाम क्यों नहीं होता। क्या उच्च पदों पर आसीन राजपत्रित अधिकारी भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं, या इसके पीछे कोई गहरी प्रशासनिक, विधिक और संरचनात्मक व्यवस्था कार्य कर रही है जो उन्हें इस तरह की त्वरित कार्यवाहियों से अछूता रखती है? यह रिपोर्ट अलीगढ़ जिले के मूल आंकड़ों का सूक्ष्म परीक्षण करते हुए, पुलिस विभाग की संगठनात्मक संरचना, भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त संरक्षण, उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के प्रावधानों, और प्रशासनिक कार्यप्रणाली के अंतर्निहित तंत्र का गहराई से विश्लेषण करती है।
अलीगढ़ में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का क्रियान्वयन और दंडात्मक कार्यवाहियों का पैमाना
अलीगढ़ जिले में वर्तमान में महिला थाना सहित कुल 31 पुलिस थाने कार्यरत हैं, जिन्हें प्रशासनिक दृष्टिकोण से 9 सर्किलों (Circles) में विभाजित किया गया है। 20 सितंबर 2025 को एसएसपी नीरज जादौन ने जब जिले का प्रभार ग्रहण किया, तो उन्होंने पुलिस बल को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जनता के साथ किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार, लापरवाही या अवैध क्रियाकलापों में संलिप्तता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पूर्ण मनोयोग से जनहित में कार्य करने के निर्देशों के बावजूद, जब भी किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ अनुशासनहीनता या भ्रष्टाचार की कोई भी प्रामाणिक शिकायत प्राप्त हुई, तो एसएसपी कार्यालय द्वारा बिना किसी रियायत के सीधे और कठोर दंडात्मक कदम उठाए गए।
साढ़े सात माह (लगभग 15 मई 2026 तक) के इस कार्यकाल के दौरान कुल 400 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की गई। इन कार्यवाहियों की प्रकृति को समझना आवश्यक है क्योंकि ये केवल सामान्य स्थानांतरण नहीं थे, बल्कि पुलिसकर्मियों के सेवा इतिहास (Service Record) को गहरे स्तर पर प्रभावित करने वाले दंडात्मक उपाय थे। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस अवधि में 105 पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) किया गया है। निलंबन की यह कार्रवाई आमतौर पर तब की जाती है जब प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर होते हैं और विभागीय जांच के दौरान कर्मचारी को उसके पद के प्रभाव से दूर रखना आवश्यक होता है । इसके अतिरिक्त, 119 पुलिसकर्मियों को ‘लाइन हाजिर’ (Police Lines Transfer) किया गया है, जो थानों में उनकी कार्यप्रणाली के प्रति असंतोष का परिचायक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 163 पुलिसकर्मियों के खिलाफ ‘मिस-कंडक्ट’ (Misconduct) या कदाचार की कार्रवाई की गई है, जिसके तहत उनके चरित्र पंजिका (Character Roll) में ‘बैड एंट्री’ (Bad Entry) दर्ज की गई है। एक पुलिसकर्मी के करियर में बैड एंट्री उसके भविष्य की पदोन्नति और सेवा लाभों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालती है।
केवल यहीं तक सीमित न रहते हुए, अपराधों की गंभीरता को देखते हुए तीन आरक्षियों (Constables) को पुलिस सेवा से पूरी तरह बर्खास्त (Dismiss) कर दिया गया है। बर्खास्तगी सबसे कठोर विभागीय दंड है जो किसी भी कर्मचारी को भविष्य में सरकारी नियोजन के लिए अयोग्य बना देता है । वहीं, पांच पुलिसकर्मियों को उनके पद के सबसे न्यूनतम वेतनमान पर प्रत्यावर्तित (Demote) कर दिया गया है, जिनमें दो मुख्य आरक्षी (Head Constables) और तीन आरक्षी शामिल हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जिले में बरती जा रही सख्ती का आलम यह है कि अब तक पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीधे भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराया जा चुका है।
पदों के आधार पर अनुशासनिक कार्यवाहियों का सांख्यिकीय विश्लेषण
अलीगढ़ पुलिस द्वारा की गई इस ऐतिहासिक कार्रवाई का यदि पदवार सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि गाज पूरी तरह से थाने के मैदानी स्तर (Ground level) पर काम करने वाले अराजपत्रित कर्मचारियों पर गिरी है। निम्नलिखित तालिका इन 400 पुलिसकर्मियों पर की गई दंडात्मक कार्यवाहियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है:
| पद (Rank) | निलंबित (Suspended) | कदाचार / बैड एंट्री (Misconduct) | भ्रष्टाचार के केस (Corruption Cases) | लाइन हाजिर (Line Hazir) |
|---|---|---|---|---|
| निरीक्षक (Inspector) | 7 | 13 | 1 | 13 |
| उप-निरीक्षक (Sub-Inspector) | 41 | 83 | 1 | 38 |
| सहायक उप-निरीक्षक (लिपिक) | 1 | 5 | 0 | 0 |
| मुख्य आरक्षी (Head Constable) | 26 | 28 | 1 | 25 |
| आरक्षी (Constable) | 29 | 33 | 2 | 43 |
| उर्दू अनुवादक (Urdu Translator) | 1 | 0 | 0 | 0 |
| अनुचर (Follower) | 0 | 1 | 0 | 0 |
| कुल योग (Total) | 105 | 163 | 5 | 119 |
इस डेटा से कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। सबसे अधिक प्रभावित वर्ग उप-निरीक्षकों (Sub-Inspectors) का है। 41 उप-निरीक्षकों का निलंबन और 83 को बैड एंट्री मिलना यह दर्शाता है कि विवेचना (Investigation) और क्षेत्र की कानून व्यवस्था में सबसे अधिक लापरवाही या भ्रष्टाचार इसी स्तर पर पाया गया है। उप-निरीक्षक थाने का वह महत्वपूर्ण अंग होता है जो सीधे मामलों की जांच करता है और आम जनता के सबसे करीब होता है। दूसरी ओर, आरक्षियों (Constables) और मुख्य आरक्षियों की बड़ी संख्या (क्रमशः 29 और 26 निलंबित) यह इंगित करती है कि बीट प्रणाली (Beat System) और गश्त के दौरान भी व्यापक अनियमितताएं मौजूद थीं।
जन-शिकायत निवारण तंत्र और हेल्पलाइन का प्रभाव
इस पूरी कार्रवाई को गति प्रदान करने में उस जन-संवाद तंत्र की बड़ी भूमिका रही है जिसे एसएसपी अलीगढ़ द्वारा विकसित किया गया था। पुलिस की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाने और आम जनता को सीधे उच्चाधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने का मंच प्रदान करने के लिए 23 जनवरी 2026 को एसएसपी की ओर से एक विशेष हेल्पलाइन नंबर (9458224499) जारी किया गया था। इस हेल्पलाइन के माध्यम से कोई भी नागरिक अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।
इस तंत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका बहुआयामी उपयोग है। नागरिक केवल गली-मोहल्लों या सड़कों पर होने वाले सामान्य अपराधों जैसे जुआ, सट्टा, गांजा या अवैध शराब की बिक्री की सूचना ही नहीं देते, बल्कि पुलिस कर्मियों द्वारा किए जाने वाले गलत व्यवहार, पैसों की मांग या किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की शिकायत भी सीधे इस नंबर पर कर सकते हैं। शिकायतकर्ता की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए सूचना देने वाले कॉलर का नाम पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है। यह हेल्पलाइन नंबर व्हाट्सएप (WhatsApp) पर भी सक्रिय है, जिससे नागरिक किसी भी अवैध गतिविधि या पुलिसकर्मी के भ्रष्ट आचरण की फोटो या वीडियो साक्ष्य के रूप में सीधे एसएसपी कार्यालय को भेज सकते हैं।
इस तकनीकी हस्तक्षेप ने निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के उस पारंपरिक एकाधिकार को तोड़ दिया है जहां वे थाने के भीतर किसी भी मामले को दबा सकते थे। जब साक्ष्य सीधे जिले के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी के पास पहुंचते हैं, तो त्वरित कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है। यह हेल्पलाइन उस ‘फीडबैक लूप’ का कार्य कर रही है जिसने मात्र साढ़े सात महीने में 400 कर्मचारियों की अनियमितताओं को उजागर कर दिया।
राजपत्रित अधिकारियों की अनुपस्थिति: एक ज्वलंत प्रश्न का प्रशासनिक अन्वेषण
अलीगढ़ की इस विस्तृत दंडात्मक सूची को देखने के बाद जनता और मीडिया के मन में सबसे बड़ा और स्वाभाविक प्रश्न यही उठता है कि 400 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई जिसमें एक भी गजटेड (राजपत्रित) पुलिस कर्मी नहीं निकला, ऐसा कैसे हो सकता है? क्या राजपत्रित पुलिस कर्मी वास्तव में ‘दूध के धुले’ हुए हैं, या भ्रष्टाचार की कोई भी आंच उन तक नहीं पहुंचती?
इस प्रश्न का उत्तर पुलिस विभाग के पदानुक्रमिक ढांचे (Hierarchical Structure), विधिक शक्तियों के बंटवारे और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों में छिपा है। इसे समझने के लिए हमें उत्तर प्रदेश पुलिस बल की संरचना और भारतीय संविधान के अनुच्छेदों का सूक्ष्मता से परीक्षण करना होगा।
उत्तर प्रदेश पुलिस बल मुख्य रूप से दो भागों में बंटा हुआ है: राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officers) और अराजपत्रित कर्मचारी (Non-Gazetted Staff)। अराजपत्रित कर्मचारियों की श्रेणी में आरक्षी (Constable), मुख्य आरक्षी (Head Constable), उप-निरीक्षक (Sub-Inspector) और निरीक्षक (Inspector) आते हैं । वहीं, राजपत्रित अधिकारियों की श्रेणी पुलिस उपाधीक्षक (DSP/ACP) से शुरू होकर पुलिस महानिदेशक (DGP) तक जाती है ।
यह एक विधिक वास्तविकता है कि भारत के संविधान के भाग 14 (संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं) के तहत सरकारी कर्मचारियों को कुछ विशेष संरक्षण प्राप्त हैं। संविधान के अनुच्छेद 311(1) के अनुसार, किसी भी सरकारी सेवक को उस प्राधिकारी द्वारा पदच्युत या सेवा से नहीं हटाया जा सकता, जो उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी (Appointing Authority) से अधीनस्थ या नीचे के स्तर का हो ।
यहीं पर राजपत्रित और अराजपत्रित अधिकारियों के बीच जवाबदेही का सबसे बड़ा विधिक और प्रशासनिक अंतर उत्पन्न होता है। एक पुलिस कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, सब-इंस्पेक्टर या इंस्पेक्टर की नियुक्ति का अधिकार स्थानीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), पुलिस आयुक्त (CP) या रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) को होता है । चूँकि SSP ही उनके ‘नियुक्ति प्राधिकारी’ या उसके समकक्ष होते हैं, इसलिए वे जिले के भीतर तत्काल प्रभाव से किसी भी अराजपत्रित पुलिसकर्मी को भ्रष्टाचार या लापरवाही की शिकायत मिलने पर निलंबित कर सकते हैं, लाइन हाजिर कर सकते हैं या उन्हें विभागीय दंड दे सकते हैं । अलीगढ़ में एसएसपी नीरज जादौन द्वारा की गई 400 पुलिसकर्मियों की कार्रवाई इसी प्रशासनिक अधिकार का सीधा उपयोग है।
इसके विपरीत, एक राजपत्रित अधिकारी (जैसे प्रांतीय पुलिस सेवा का DSP या भारतीय पुलिस सेवा का SP) की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल (Governor) या भारत के राष्ट्रपति (President) द्वारा की जाती है । उनकी नियुक्तियों और पदोन्नतियों की अधिसूचना आधिकारिक राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित होती है। इसलिए, कोई भी एसएसपी (SSP), डीआईजी (DIG) या यहाँ तक कि पुलिस महानिदेशक (DGP) भी किसी राजपत्रित अधिकारी को सीधे अपने स्तर से निलंबित या बर्खास्त नहीं कर सकता। वे केवल उनके विरुद्ध एक गोपनीय रिपोर्ट तैयार करके शासन (गृह विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार) को भेज सकते हैं। गृह विभाग ही मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अनुमोदन से किसी राजपत्रित अधिकारी को निलंबित करने या उसे दंडित करने का अधिकार रखता है।
कमान का उत्तरदायित्व और संस्थागत भ्रष्टाचार की वास्तविकता
“क्या राजपत्रित अधिकारी दूध के धुले हैं?” इस सवाल का समाजशास्त्रीय और संस्थागत उत्तर ‘नहीं’ है। भ्रष्टाचार या लापरवाही कभी भी पूर्णतः निचले स्तर तक सीमित नहीं रहती। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पुलिस थानों में पनपने वाला भ्रष्टाचार अक्सर एक सुव्यवस्थित नेटवर्क का हिस्सा होता है। जब किसी एक जिले में 105 पुलिसकर्मी निलंबित होते हैं और 163 को कदाचार की प्रविष्टि मिलती है, तो यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार एक व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत विफलता (Systemic Failure) है।
एक थाना प्रभारी (Inspector) अराजपत्रित कर्मचारी होता है , जो सीधे तौर पर सर्कल ऑफिसर (CO/DSP – जो कि एक राजपत्रित अधिकारी होता है) के पर्यवेक्षण में कार्य करता है। अलीगढ़ में 9 सर्किल हैं और प्रत्येक सर्किल का प्रभार एक राजपत्रित अधिकारी के पास होता है। यदि किसी सर्किल के अंतर्गत आने वाले थानों में जुआ, सट्टा या अवैध शराब का कारोबार चल रहा है, जिसके लिए थानों के सिपाहियों और दरोगाओं को निलंबित किया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर उस राजपत्रित अधिकारी (सर्किल ऑफिसर) की “पर्यवेक्षकीय विफलता” (Supervisory Failure) है। यह असंभव है कि एक थाना महीनों तक भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहे और उसके पर्यवेक्षक राजपत्रित अधिकारी को इसकी भनक तक न लगे।
फिर भी, जब गाज गिरती है, तो केवल सिपाही और दरोगा नपते हैं। विधिक दृष्टि से, किसी अधिकारी को भ्रष्टाचार के लिए तब तक दण्डित नहीं किया जा सकता जब तक कि उसके खिलाफ रिश्वत लेने का प्रत्यक्ष साक्ष्य (Direct Evidence) न हो। राजपत्रित अधिकारी सीधे जनता से पैसे नहीं लेते; वे फाइलों, नीतिगत निर्णयों और निर्देशों के माध्यम से कार्य करते हैं। निचले स्तर के कर्मचारी अक्सर ‘संग्रहकर्ता’ (Collection Agents) के रूप में काम करते हैं और जब वे रंगे हाथों पकड़े जाते हैं या वीडियो वायरल होता है, तो उच्चाधिकारी तुरंत उन्हें निलंबित करके खुद को भ्रष्टाचार-विरोधी सिद्ध कर देते हैं। इस प्रकार, राजपत्रित अधिकारी अपनी संरचनात्मक दूरी और पर्यवेक्षकीय भूमिका की आड़ में प्रत्यक्ष दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षित बच निकलते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 की जटिलताएं
विभागीय कार्यवाहियों को और अधिक सूक्ष्मता से समझने के लिए ‘उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999’ के तहत दी जाने वाली शास्तियों और जाँच प्रक्रिया का विश्लेषण अत्यंत प्रासंगिक है ।
इस नियमावली में दण्ड को लघु शास्तियों (Minor Penalties) और दीर्घ शास्तियों (Major Penalties) में बांटा गया है। अलीगढ़ में 5 पुलिसकर्मियों को न्यूनतम वेतनमान पर लाना या 3 को बर्खास्त करना दीर्घ शास्तियों की श्रेणी में आता है, जिसके लिए एक पूर्ण और औपचारिक विभागीय जाँच (Departmental Inquiry) अनिवार्य होती है । जब यह प्रक्रिया किसी अराजपत्रित कर्मचारी पर लागू होती है, तो जिले का एसएसपी आसानी से किसी राजपत्रित अधिकारी (जैसे क्षेत्राधिकारी) को जाँच अधिकारी नियुक्त कर देता है।
परंतु जब किसी राजपत्रित अधिकारी के खिलाफ आरोप लगते हैं, तो प्रक्रिया अत्यंत जटिल हो जाती है। नियमावली स्पष्ट करती है कि “जाँच अधिकारी सामान्यतः अपचारी कर्मचारी से कम से कम दो स्तर ऊपर का होना चाहिए” । यदि किसी एसपी या डीआईजी स्तर के अधिकारी की जाँच होनी है, तो उसके लिए एडीजी (ADG) या डीजीपी (DGP) स्तर के अधिकारी को नियुक्त करना पड़ता है। नौकरशाही में प्रचलित ‘पीयर शील्डिंग’ (Peer Shielding) या अधिकारियों के बीच आपसी तालमेल के कारण, उच्च अधिकारियों के विरुद्ध जाँच आख्याएं अक्सर लंबी खिंच जाती हैं और कई बार उन्हें केवल ‘चेतावनी’ या ‘परिनिन्दा’ (Censure) जैसी लघु शास्ति देकर ही रफा-दफा कर दिया जाता है ।
इसके अलावा, राजपत्रित अधिकारियों के पास कानूनी संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। वे केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) या उच्च न्यायालय में विभागीय कार्रवाई को आसानी से चुनौती दे सकते हैं । इस लंबी कानूनी लड़ाई और प्रशासनिक जटिलता से बचने के लिए, सरकारें भी अक्सर उच्च अधिकारियों को निलंबित करने के बजाय उनका केवल ‘स्थानांतरण’ (Transfer) कर देती हैं। आम जनता के लिए स्थानांतरण कोई सजा नहीं है, लेकिन नौकरशाही में इसे एक ‘सॉफ्ट एक्शन’ माना जाता है।
आगरा और प्रयागराज के उदाहरणों से तुलना
अलीगढ़ की यह स्थिति कोई अपवाद नहीं है; उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी ठीक यही पैटर्न देखने को मिलता है जहाँ निचले स्तर के कर्मचारियों पर व्यापक कार्रवाई होती है, लेकिन राजपत्रित अधिकारी इस सूची से बाहर रहते हैं।
आगरा पुलिस आयुक्तालय का हालिया उदाहरण इस तथ्य की पुष्टि करता है। आगरा में पुलिस कमिश्नर जे. रविंदर गौड़ और डीसीपी (DCP) स्तर के अधिकारियों के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और लापरवाही के खिलाफ एक बड़ा अभियान चलाया गया । वहां फीडबैक सेल की स्थापना के बाद, मात्र कुछ ही दिनों के भीतर 55 से 56 पुलिसकर्मियों को एक साथ निलंबित कर दिया गया । इन निलंबित कर्मियों में थाना सिकंदरा के क्राइम इंस्पेक्टर, कई उप-निरीक्षक, मुख्य आरक्षी और यहाँ तक कि प्रशिक्षु दरोगा भी शामिल थे । उन पर पासपोर्ट सत्यापन के एवज में रिश्वत मांगने, विवेचना में रुपयों का लेन-देन करने, साइबर अपराधियों के साथ मिलीभगत और जुआरियों को संरक्षण देने जैसे गंभीर आरोप थे ।
इसी प्रकार प्रयागराज में डीसीपी कुलदीप सिंह गुनावत ने कानून-व्यवस्था में सुधार लाने के उद्देश्य से एक ही आदेश में 400 पुलिसकर्मियों (उप-निरीक्षक से लेकर कांस्टेबल तक) के कार्यक्षेत्र में बदलाव या स्थानांतरण कर दिया । कानपुर और मुरादाबाद जैसे जिलों में भी समय-समय पर ऐसी कार्यवाहियां होती रहती हैं।
इन सभी मामलों में, चाहे वह अलीगढ़ के 400 पुलिसकर्मी हों, आगरा के 56 निलंबित कर्मचारी हों, या प्रयागराज के 400 स्थानांतरित पुलिसकर्मी हों—एक भी राजपत्रित अधिकारी दंडात्मक सूची में शामिल नहीं है। यह पुलिस बल की उस दोहरी कार्यसंस्कृति को रेखांकित करता है जहाँ जवाबदेही का पैमाना पद की गरिमा के साथ बदल जाता है।
राजपत्रित अधिकारियों पर कार्रवाई: एक दुर्लभ यथार्थ
ऐसा नहीं है कि राजपत्रित अधिकारियों पर कभी कार्रवाई नहीं होती। उत्तर प्रदेश सरकार ने समय-समय पर दागी अधिकारियों को भी दंडित किया है। राज्य सरकार ने 50 वर्ष की आयु पूरी कर चुके भ्रष्ट, दागदार और अनुशासनहीन पुलिसकर्मियों की स्क्रीनिंग करवाकर उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त (Compulsory Retirement) करने का जो कठोर कदम उठाया था, उसमें लगभग 400 पुलिसकर्मियों को जबरन सेवानिवृत्ति दी गई थी। इस विशेष अभियान में राज्य सरकार ने 3 आईपीएस (IPS) अधिकारियों को भी अयोग्य घोषित करते हुए जबरन रिटायर कर दिया था ।
हालांकि, यह संख्या कुल कार्यवाहियों की तुलना में नगण्य है। सरकारें आम तौर पर अपने शीर्ष अधिकारियों के भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करने से बचती हैं क्योंकि इससे पूरी संस्थागत वैधता पर सवाल उठते हैं। सिपाही या दरोगा को निलंबित करने से विभाग की छवि एक “सख्त प्रशासक” के रूप में बनती है , लेकिन एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के निलंबन से सरकार की अपनी नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
पुलिस बल के मनोबल पर प्रभाव और भविष्य की चुनौतियाँ
अराजपत्रित कर्मचारियों के खिलाफ निरंतर और एकतरफा कार्रवाई का पुलिस बल के आंतरिक मनोबल पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जब थाना स्तर का कर्मचारी यह देखता है कि विभागीय अनुशासन का चाबुक केवल उसी की पीठ के लिए बना है और लापरवाही के बावजूद उच्चाधिकारी हमेशा सुरक्षित रहते हैं, तो बल के भीतर कुंठा और निराशा जन्म लेती है।
इसके परिणामस्वरूप ‘रक्षात्मक पुलिसिंग’ (Defensive Policing) की प्रवृत्ति बढ़ती है। निचले स्तर के कर्मचारी जोखिम भरे निर्णय लेने से बचने लगते हैं और हर छोटे काम के लिए उच्चाधिकारियों के लिखित आदेश का इंतजार करते हैं। इसके अलावा, निलंबन के डर से कई पुलिसकर्मी अपने अल्प कार्यकाल में ही अधिक से अधिक अनुचित लाभ कमाने का प्रयास करते हैं, जिससे भ्रष्टाचार का एक दुष्चक्र बन जाता है। अलीगढ़ में पासपोर्ट सत्यापन या अवैध शराब के धंधे में पुलिसकर्मियों की संलिप्तता इसी दूषित कार्यसंस्कृति का परिचायक है।
अलीगढ़ में एसएसपी नीरज जादौन द्वारा साढ़े सात माह में 400 पुलिसकर्मियों पर की गई कार्रवाई निश्चित रूप से कानून व्यवस्था को पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाने की दिशा में एक साहसिक और सराहनीय कदम है। 105 का निलंबन, 163 को बैड एंट्री और हेल्पलाइन (9458224499) का सफल संचालन यह प्रमाणित करता है कि यदि जिला पुलिस प्रमुख चाहे तो निचले स्तर के भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
किंतु, इस पूरी सूची से राजपत्रित अधिकारियों की अनुपस्थिति उस प्रशासनिक और विधिक वास्तविकता को उजागर करती है जहाँ जवाबदेही का बोझ हमेशा पिरामिड के सबसे निचले हिस्से पर डाल दिया जाता है। राजपत्रित अधिकारी नैतिक रूप से “दूध के धुले” नहीं हैं; वे केवल उस संवैधानिक और नौकरशाही सुरक्षा छतरी (Article 311 और नियुक्ति प्राधिकारी के नियम) के नीचे खड़े हैं जो उन्हें त्वरित दंडात्मक कार्यवाहियों से बचाती है। पुलिस व्यवस्था में वास्तविक सुधार और न्याय की एकरूपता तभी स्थापित हो सकेगी जब ‘कमान के उत्तरदायित्व’ (Command Responsibility) को कड़ाई से लागू किया जाएगा और थानों की विफलता को सीधे तौर पर उनके पर्यवेक्षक राजपत्रित अधिकारियों की विफलता माना जाएगा। कानून के समक्ष समानता का जो सिद्धांत नागरिकों पर लागू होता है, उसका पालन प्रशासनिक न्याय प्रणाली के भीतर भी उतनी ही स्पष्टता के साथ होना चाहिए।