Entertainment: ‘प्यासा’ में गुरु दत्त के सुलगते सवाल- जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं… किस पर था निशाना? – #iNA

गुरु दत्त की क्लासिक फिल्म प्यासा तब आई, जब देश को आजाद हुए महज एक दशक बीता था. वह साल था- 1957. प्यासा एक ऐसे शायर की कहानी थी, जिसे समाज में झूठ, फरेब, अन्याय और बेईमानी से शिकायतें हैं. फिल्म का नायक विजय एक स्थान पर कहता भी है- मुझे किसी से शिकायत नहीं, शिकायत है तो सिर्फ समाज के इस ढांचे से , जहां ये असमानताएं और बुराइयां हैं. फिल्म में विजय एक ऐसा परेशान हाल नायक है, जो सत्तर-अस्सी के दशक के क्रोधी विजय की तरह एंग्री यंग मैन नहीं है. वह आक्रोश में बदला नहीं लेता बल्कि सवालों की बौछार करता है क्योंकि वह स्वभाव से लेखक-शायर है. इसी क्रम में उसका सबसे बड़ा सवाल है- जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं… यह गाना अपने दौर में काफी मकबूल हुआ और आज भी जब कभी सत्ता, सरकार से सवाल पूछे जाते हैं तो इसे जोर शोर से उठाया जाता है.
इस गाना को मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने लिखा था. साहिर अपनी नज्मों में क्रांतिकारिता की अलख जगाने के लिए जाने जाते हैं. प्यासा बनाने में गुरु दत्त को साहिर और अबरार अल्वी का बड़ा सहयोग मिला. इन दोनों का साथ मिलने से इस फिल्म की वैचारिकी और भी तल्ख हो गई थी. प्यासा की पटकथा, संवाद और गीत की सार्थकता अपने समय के सामाजिक यथार्थ को दर्शाने वाली मानी जाती है. उस वक्त इसे दुनिया की सौ सबसे बेहतरीन फिल्मों में स्थान मिला था. प्यासा के बुनियादी सवाल आज के समाज में भी मायने रखते हैं.
मानवतावादी विजय की असली प्यास क्या थी?
प्यासा में निशाने पर सामाजिक व्यवस्था और मौजूदा सत्ता दोनों थी. इंसानियत और मानवतावादी जैसे जज्बाती पक्ष को कुचलकर बेईमानी और चाटुकारिता को सर्वोपरि मानने वालों को भी खुल्लमखुल्ला आड़े हाथों लिया गया था. केवल दस साल पहले देश को आजादी मिली थी. आजादी के तराने और सपने युवाओं के आंखों में अब भी खदबदा रहे थे. उन सपनों को आकार नहीं मिल पा रहा था. वास्तव में स्वतंत्रता आंदोलन के समय समाज में जिस आदर्शवाद और समानता की आस थी, वह पूरा होता नहीं दिख रहा था. कवियों, शायरों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और फिल्मकारों ने तब के युवाओं की इन्हीं अपेक्षाओं को अपने-अपने तरीके से आवाज थी.
गुरु दत्त ने इस खदबदाती आवाज को प्यासा में पूरी कलात्मकता के साथ उठाया. तब पं. जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे. साहिर के इस गाने का एक-एक शब्द मानो सत्ता से मुठभेड़ कर रहा था. यह फिल्म आजादी की उम्मीदों से मोहभंग का आईना थी. एक नजीर पेश है –
ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ / ये कुचे, ये गलियां, ये मंजर दिखाओ/
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ/जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं/
या फिर
ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे / ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे /
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे/जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं…
वास्तव में ये सवाल केवल सामाजिक नहीं थे, बल्कि राजनीतिक भी थे. सिनेमा जनजागरुकता अभियान के दायरे से निकलकर एक तरफ रुमानियत का रंगीन चोला पहन रहा था तो दूसरी तरफ सामाजिक विषमता, अपराध और संवेदनहीनता को प्रमुख विषय बना रहा था. महिलाओं की बेबसी और शोषण, शिक्षितों की बेकारी, ग्रामीणों की गरीबी, किसानों की दुश्वारियां जैसे विषय सिनेमा में प्रमुख स्थान बना रहे थे. व्ही. शांताराम, बिमल रॉय, सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, महबूब खान जैसे फिल्मकारों ने समाज को दिशा दिखाने वाली फिल्में बनाईं.
पहली ही फिल्म बाजी में भी बेरोजगारी का मुद्दा
इससे पहले राज कपूर बेरोजगारी और विस्थापन जैसे मुद्दों पर 1952 में आवारा और 1955 में श्री 420 बनाकर बड़े सवाल उठा चुके थे और लोकप्रियता भी हासिल कर चुके थे. आवारा और श्री 420 ने भविष्य के सिनेमा की विषय वस्तु को बदल कर रख दिया. लेकिन गुरु दत्त ने इससे भी पहले सन् 1951 में बाजी से ही इन मुद्दों की दस्तक दे दी थी. गुरु दत्त बाजी के निर्देशक थे और नायक थे- देव आनंद, जिन्होंने इस फिल्म में बेरोजगार युवक की भूमिका निभाई. बाजी को प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी ने लिखा था.
गुरु दत्त अपनी जिस छवि के फिल्मकार माने जाते हैं, प्यासा उसकी प्रतिनिधि फिल्म है. प्यासा सवालों का सैलाब लेकर आई. ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है… गीत में भी एक किस्म का सवाल था. इस गाने की हर पंक्ति एक सुलगता सवाल का है.
कुछ प्रमुख पंक्तियां इस प्रकार हैं-
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया / ये इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया /
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया /ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है /
या
जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया /मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया /
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया /ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है /
प्यासा में सामाजिक व्यवस्था पर गुस्सा खुलकर जाहिर किया गया था. कहीं-कहीं प्रतीकों से भी काम लिया गया था. इस फिल्म का नाम पहले कशमकश था और मूल कहानी में नायक विजय पेशे से पत्रकार थे लेकिन साहिर लुधियानवी से मुलाकात के बाद वो उनसे इतने मुत्तासिर हुए कि गुरु दत्त ने इसके नायक को लेखक से शायर बना दिया. गुरु दत्त साहिर की शायरी के बड़े मुरीद थे.
नदी के पास नल, किंतु पानी नदारद
प्यासा में एक सीन बहुत ही अनोखा है. यहां पार्क में नायक विजय बैठा है और सोच रहा है. उसके सामने हुगली नदी है. वह नदी को भर निगाह घूरता है. इसी दौरान उसे प्यास लगती है और वहीं मौजूद नल से पानी पीने का प्रयास करता है, किंतु नल से पानी नहीं आ रहा. वह विशाल नदी के सामने भी प्यासा है. गुरु दत्त इस फिल्म को भी इसी नजरिये से पेश किया था. इस दुनिया में सबकुछ है और इन्हीं सबकुछ के बीच हर इंसान है लेकिन कोई इसमें डूबा है तो कोई इन चीज़ों से वंचित है. विजय दुनिया के सुख सुविधाओं से वंचित है, उसकी कमी यही है कि वह संवेदनशील है, उसकी कमी यही है कि वह केवल अपने बारे में नहीं सोचता बल्कि पूरे समाज के बारे में सोचता है.
वहीदा रहमान और माला सिन्हा की अदाकारी
प्यासा में गुरु दत्त के साथ काम करने वाले कलाकारों में वहीदा रहमान और माला सिन्हा भी समाज में दो किस्म की महिलाओं की प्रतीक हैं. तो वहीं रहमान और जॉनी वाकर भी दो ऐसे इंसान के प्रतीक हैं, जो इसी समाज के हिस्सा हैं. माला सिन्हा के रूप में मीना घोष दौलत को जज्बाती उसूल से ज्यादा जरूरी समझने वाली औरत है जबकि वहीदा रहमान के रूप में कोठेवाली गुलाब मोहब्बत को एक इबादत समझती हैं. इसी तरह रहमान के रूप में मिस्टर घोष को केवल व्यापार से प्रेम है तो जॉनी वाकर के रूप में अब्दुल सत्तार इंसानियत को तरजीह देना ज्यादा मुनासिब समझता है.
फिल्म की परेशानी ये है कि यहां परंपरागत आशावादी अंत नहीं है. समाज के धूर्त तत्व जीतते हैं और जज्बात हारता है. बेरोजगारी की वजह से विजय को जब अपने घर से लेकर समाज में हर दर तक सिर्फ ठोकरें खाने को मिलती है तो वह अंत में टूट जाता है, बिखर जाता है. भाई भी उसे घर से निकाल देता है. अब ये दुनिया उसे मुनासिब नहीं लगती.
वह गुलाब यानी वहीदा रहमान से कहता है- मैं बहुत दूर जा रहा हूं, गुलाबो.
वहीदा रहमान पूछती है- कहां.
गुरु दत्त कहते हैं- जहां से फिर दूर न जाना पड़े.
फिर अगले शॉट में गुरु दत्त और वहीदा रहमान एक-दूसरे का हाथ थामे दूर जाते हुए दिखाई देते हैं. कैमरा उनके ओझल होने तक उनकी पीठ को दिखातारहता है और फिल्म खत्म हो जाती है.
प्यासा के गीत-संगीत में कालजयी बनाने में साहिर के शब्दों के अलावा एसडी बर्मन के संगीत. मो. रफी, गीता दत्त और हेमंत कुमार का भी अहम योगदान है.
हेमंत कुमार की आवाज में गाए उस गीत में आज भी प्यासे विजय की आत्मा तड़पती है- जाने कैसे लोग थे जिनको प्यार को प्यार मिला…
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