Entertainment: ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में स्टारडम का ‘गोलमाल’ नहीं होता! कुमार-कपूर-खन्ना-बच्चन-धर्मेंद्र सब थे मुरीद, जानें क्यों? – #iNA

अपने समय के महान फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी ने सन् 1979 में एक फिल्म डायरेक्ट की- गोलमाल. अपने समय की लोकप्रिय हास्य फिल्म. वर्तमान पीढ़ी को रोहित शेट्टी-अजय देवगन की गोलमाल सीरीज की याद सकती है लेकिन रोमांच के मामले में उत्पल दत्त, अमोल पालेकर जैसे कलाकारों की गोलमाल मानो इसकी असली बुनियाद थी. राही मासूम रज़ा इसके लेखक थे. फिल्म का एक गाना था- गोलमाल है सब गोलमाल है… सीधे रस्ते की ये टेढ़ी चाल है… यह एक हास्य प्रधान फिल्म थी और इस गाने में रूढ़ियों-रिवाजों पर तंज भी कसा जाता है.

ऋषिकेश मुखर्जी की शख्सियत और उनकी फिल्मोग्राफी को याद करते हुए इस गाने की याद आती है. उन्होंने गोलमाल दिखाया तो जरूर लेकिन एक ऐसे डायरेक्टर साबित हुए, जो फिल्म बनाने के लिए किसी भी तरह की टेढ़ी चाल चलने में यकीन नहीं रखा. हमेशा सीधा सरल रास्ता अपनाया. बड़े कलाकार लिये लेकिन सादगी बनाए रखी, बड़े सेट लगाये लेकिन खर्च कम किये; फिर भी कलात्मक ऊंचाई और बॉक्स ऑफिस हिट के लिए उनकी फिल्में जानी गईं.

आनंद में राजेश खन्ना के सुपरस्टारडम से कोई समझौता नहीं

ऋषिकेश मुखर्जी का सीधा-सा फलसफा था कि सुपरस्टार कोई होगा लेकिन उनकी फिल्म में सुपरस्टार की उतनी ही जगह होगी, जितनी स्क्रिप्ट की मांग होगी. इस मामले में वो बहुत अड़ियल थे. उनकी फिल्म में स्टारडम का कोई घोटाला नहीं. इसे एक उदाहरण से समझिये. सन् 1971 में क्लासिक फिल्म आई- आनंद. इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे- तब के सुपरस्टार राजेश खन्ना. तब अमिताभ बच्चन की कोई पहचान नहीं बनी थी.

लेकिन जब आप उस फिल्म को एक बार फिर से देखें तो ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन की साहसिकता को सलाम करने की इच्छा होगी. फिल्म का शुरुआती लंबा हिस्सा केवल अमिताभ बच्चन पर फोकस है. डॉक्टर भास्कर बनर्जी बनाम बाबू मोशाय के किरदार में वह मलिन बस्तियों में जाते हुए दिखाई देते हैं और काफी देर तक स्क्रीन पर नजर आते रहते हैं. कई लंबे सीन के बाद राजेश खन्ना की एंट्री होती है.

यकीनन ऋषिकेश मुखर्जी की जगह अगर कोई दूसरा निर्देशक होता तो एक नये कलाकार को किसी दूसरे सुपरस्टार के बदले इतनी लंबी फुटेज नहीं देता. लेकिन ऋषि दा ने अपनी स्क्रिप्ट की मांग के हिसाब से यह साहस दिखाया राजेश खन्ना के सुपरस्टारडम के प्रभाव में नहीं. यह फैसला बॉक्स ऑफिस के लोकप्रिय पैमाने के मुताबिक नहीं था. बावजूद इसके फिल्म क्लासिक साबित हुई.

ऋषिकेश मुखर्जी की खासियत आगे भी तमाम फिल्मों में जारी रही. वह जब सन् 1973 में नमक हराम बनाते हैं तो एक बार फिर इस जोड़ी को रिपीट करते हैं. हालांकि इस वक्त तक अमिताभ बच्चन कई फिल्मों में काम कर चुके थे. लेकिन रज़ा मुराद के छोटे से किरदार को भी उन्होंने इन दोनों सुपरस्टार के बरअक्स सम्मानजनक जगह दी.

Abhiman Namak Haram

अमिताभ-जया समेत कई कलाकारों के गॉडफादर कहलाए

ऋषिकेश मुखर्जी प्रतिभाशाली कलाकारों को खोज कर अपनी फिल्मों में काम देते थे. यही वजह है कि अमिताभ बच्चन ही नहीं अनेक नये कलाकारों के गॉडफादर कहलाते थे. अमिताभ बच्चन को यश चोपड़ा, प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई जैसे डायरेक्टरों और सलीम-जावेद जैसे लेखकों ने लार्जर दैन लाइफ किरदार देकर सुपरस्टार बनाया लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी की मिली, अभिमान, बेमिसाल जैसी फिल्मों में एक सीधे सादे नायक ही नजर आते थे. और कोई हैरत नहीं कि इन फिल्मों ने अमिताभ बच्चन की शख्सियत को अलग मूल्यांकन दिया. ऋषिकेश मुखर्जी एक शॉर्ट फिल्म में देखकर जया बच्चन (तब भादुड़ी) को खोजने के लिए वह एफटीटीआई पुणे पहुंच गये. वहां असरानी की मदद से उन्होंने जया को खोजा और गुड्डी में लॉन्च किया.

राजेश खन्ना को ‘पिंटू बाबा’ कहा करते थे ऋषिकेश मुखर्जी

इनके साथ ही ऋषिकेश मुखर्जी धर्मेंद्र, देवेन वर्मा, अमोल पालेकर और राजेश खन्ना के लिए भी पिता समान थे. राजेश को वह पिंटू बाबा कहा करते थे. ऋषिकेश मुखर्जी की शख्सियत को माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार ने कुछ इन शब्दों में याद किया था. तब मेरी उनसे फिल्म जगत की तमाम बड़ी हस्तियों पर लंबी वार्ता होती थी और मैं उसे कभी नोट करके तो कभी रिकॉर्ड करके रख लेता था. सबसे पहले तो उन्होंने यही कहा कि पता नहीं हिंदी वाले ऋषिकेश क्यों लिखते हैं? हम अपनी संस्कृति से पूरी तरह कट गए हैं. हृषी बोलना नहीं जानते. हृषीकेश का अर्थ है इंद्रियों का स्वामी. कृष्ण का और विष्णु का यह भी एक नाम है. वही लिखा जाना चाहिए. उनका पूरा नाम है हृषीकेश मुखर्जी. आदर से संक्षिप्त प्रिय नाम पड़ा हृषिदा. बहरहाल हम इस लेख में पत्रकारिता में सबसे अधिक प्रचलित ऋषिकेश का ही प्रयोग कर पा रहे हैं.

बंबइया ग्लैमर, चटक मटक से दूर होती थी उनकी फिल्में

अरविंद कुमार ने बताया कि हृषिदा से मेरी पहली मुलाकात होली अंक के बहाने हुई. तब तक माधुरी-सुचित्रा का एक भी अंक नहीं छप पाया था. इस तीसरे (होली) अंक की तैयारी में उनका सकारात्मक योगदान मुझे अब तक याद है. जैनेंद्र जैन, महेंद्र सरल और मैं हृषिकेश मुखर्जी के बंगला आशियाना पहुंचे. हम लोग अपने साथ गुलाल, रंग, पिचकारी ले गए थे, साथ ही कुछ मीठा और नमकीन भी. हृषिदा अपने ड्राइंग रूम में थे. वो जितने सीधे सादे वे उतनी ही सीधी-सादी उनकी फ़िल्में थीं. बंबइया ग्लैमर, चटक मटक, उठापटक, मारपीट से कोसों दूर, फिर भी लोकप्रिय.

Rajesh Khanna Dharmendra

ऋषिकेश मुखर्जी का जन्म 30 सितंबर, 1922 को कोलकाता में हुआ था. गणित और विज्ञान के विद्यार्थी थे. प्रारंभ में इन दोनों विषयों का अध्यापन भी किया था. सिनेमा की दुनिया में अपने समय के दो दिग्गज फिल्मकार पीसी बरुआ और बिमल रॉय के सान्निध्य में आए. न्यू थिएटर्स पहला पड़ाव बना. पहले कैमरामैन और एडिटर बने फिर सहायक निर्देशक. इसके बाद खुद इतने बड़े दिग्गज निर्देशक कहलाये कि अपने समय के सारे सुपरस्टार्स की लाइन लगा दी. कोई अभिनेता चाहे कितना भी प्रसिद्ध हो, लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में काम करने के लिए लालायित रहते. ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म में काम कर लेने का मतलब था कि उनके कलाकार को मान्यता मिल गई. ग्लैमर और पैसे एक तरफ और ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा में काम दूसरी तरफ.

बिमल रॉय के सान्निध्य में सीखी सिनेमा की बारीकियां

सन् 1950 वाले दशक में न्यू थिएटर्स छोड़ कर जब बिमल रॉय कोलकाता से मुंबई आ गए तब उनकी टीम के तमाम साथी मसलन लेखक नवेंदु, एडिटर ऋषिकेश मुखर्जी, निर्देशक असित सेन भी आ गए. ऋषिकेश मुखर्जी के सुझाव के बाद ही बिमल रॉय ने अपना प्रोडक्शन हाउस खोला. बलराज साहनी-निरुपा रॉय के साथ दो बीघा ज़मीन और दिलीप कुमार सुचित्रा सेन के साथ देवदास जैसी फिल्में बनाईं. ऋषिकेश मुखर्जी इन फिल्मों के सहायक निर्देशक और एडिटर थे.

कालांतर में ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी शख्सियत की अलग पहचान तैयार की. उन्होंने बिमल रॉय के सान्निध्य में सिनेमा के गंभीर सामाजिक पक्ष को गहराई से जाना था, जिसके भाव को उन्होंने अपने तरीके से मध्यवर्गीय परिवार की कहानियों में ढाला. ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में समाजिकता के साथ-साथ परिवार और पड़ोसी की जिंदगी के सारे रंग निखर कर आए. यहां दुख, स्वप्न, प्रतिस्पर्धा, रोजगार, बेरोजगार, मिलन, जुदाई के साथ-साथ चुपके-चुपके फिल्म जैसे शुद्ध हास्य के लिए भी पर्याप्त जगह थी. उन्होंने दिलीप कुमार के साथ मुसाफिर बनाई तो राज कपूर के साथ अनाड़ी, देव आनंद के साथ असली-नकली किया तो गुरु दत्त के साथ सांझ और सवेरा भी.

ऋषिकेश मुखर्जी की विरासत उनके बाद आगे न बढ़ सकी

ऋषिकेश मुखर्जी ने धर्मेंद्र के साथ अनुपमा और सत्यकाम जैसी कालजयी फिल्में दी. धर्मेंद्र आज भी कहते हैं- ऋषिदा के निर्देशन में उनकी इन दोनों फिल्मों ने उन्हें एक कलाकार का रुतबा प्रदान किया. उनके करियर को नई ऊंचाई दी. बेशक वो स्टार थे लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी ने उनको अभिनेता बनाया. ऐसा ही कुछ राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन भी मानते रहे हैं. बावर्जी में राजेश खन्ना की भूमिका अविस्मरणीय है. हिंदी सिनेमा के कुछ ही ऐसे निर्देशक हुए, जिनकी विरासत उनके बाद आगे नहीं बढ़ी, उनमें एक ऋषिकेश मुखर्जी भी थे.

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