खबर फिली – आवारा हूं… जिस गाने को राजकपूर ने पहले कर दिया था रिजेक्ट, फिर कैसे बना आइकॉनिक सॉन्ग? – #iNA @INA

इतिहास में ऐसे कई नजीर हैं- जिसे कभी रिजेक्ट किया गया, उसी ने भविष्य में एक नया इतिहास रच दिया. हिंदी सिनेमा के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन की आवाज और लंबाई पहले खारिज की गई थी तो उससे भी पहले शमशाद बेगम और नूरजहां के दौर में लता मंगेशकर के स्वर को भी ‘बहुत कोमल’ कह कर नजरअंदाज किया गया था. लेकिन लता और अमिताभ ने अपने-अपने क्षेत्र में कैसा मुकाम बनाया, इतिहास गवाह है. राज कपूर की फिल्म का गाना आवारा हूं… या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं… भी कुछ ऐसा ही इतिहास समेटे हुए है. जिस गाने ने राज कपूर को ग्लोबल पहचान दी, दुनिया भर में मशहूर हुए, उसी गाने को उन्होंने पहले खारिज कर दिया था. आवारा फिल्म में शामिल करने से इनकार कर दिया था. लेकिन बिना सोशल मीडिया के उस जमाने में जब वह गाना रिलीज हुआ तो मानो वायरल हो गया. बाद में फिर उन्हें अपने फैसले पर बहुत अफसोस हुआ.

इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े शोमैन राज कपूर अपनी फिल्मों के माध्यम से पचास और साठ के दशक के हिंदुस्तानी समाज की तस्वीरें पेश करने के लिए जाने जाते हैं. आवारा फिल्म भी आजाद हिंदुस्तान की युवा पीढ़ी की महत्वाकांक्षा और भटकाव की कहानी कहती है. आवारा सन् 1951 में बनकर तैयार हुई लेकिन रिलीज से पहले तक शैलेन्द्र का लिखा आवारा हूं… गीत फिल्म का हिस्सा नहीं था. बाद में यह गीत कैसे फिल्म में शामिल हुआ? राज कपूर ने पहली बार में इसे क्यों खारिज कर दिया? लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास की इसमें क्या भूमिका थी? ये सबकुछ एक रोमांचक दास्तां है.

करीब पचहत्तर साल पुरानी वो कहानी

आवारा हूं… गीत की ये कहानी उस कैरेक्टर की फितरत से बिल्कुल अलग नहीं है, जिसे राज कपूर ने ‘राजू’ बनकर आवारा में निभाया था. कहानी करीब पचहत्तर साल पुरानी है. देश को आजादी मिले महज तीन ही साल हुए थे. सन् 1948 में राज कपूर आग बनाकर अपना सब कुछ लुटा चुके थे. फिल्म फ्लॉप हो गई लेकिन उनके इरादे बरकरार रहे. अब उन्हें अदद सुपरहिट की दरकार थी. अगले साल फिल्म बरसात बना रहे थे, और इसी फिल्म से गीतकार शैलेन्द्र और राज कपूर की जोड़ी का संयोग बना. ‘बरसात’ के गानों ने अपार सफलता अर्जित की. दोनों यार बने, संबंध गहरे हुए. इस दोस्ती ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में अपना स्वर्णिम पन्ना जोड़ा.

राज कपूर स्वप्नशील, संघर्षशील और निष्छल इंसान की जिंदगी, उनकी विफलताओं और दुश्वारियों को पर्दे पर उतारने के लिए जाने जाते हैं. किंतु आवारा का किरदार जितना संघर्षशील था, उतना ही लाचार और क्रूर भी. वह कुछ ही साल पहले आजाद हुए हिंदुस्तान के बेरोजगार नौजवानों का प्रतीक था. शैलेन्द्र ने इसी भाव भूमि को ध्यान में रखकर यह गीत लिखा था.

‘बरसात’ से आई जिंदगी में बहार

सन् 1949 में रिलीज बरसात की सफलता के बाद निर्माता-निर्देशक-अभिनेता राज कपूर, गीतकार-शैलेन्द्र, संगीतकार- शंकर-जयकिशन, गायक-मुकेश की एक मंडली बन गई और बाद में इस मंडली से जुड़े ऊर्दू के मशहूर लेखक और पटकथाकार- ख्वाजा अहमद अब्बास, जोकि इससे पहले ‘धरती के लाल’ जैसी फिल्म लिख चुके थे. राज कपूर की अगली फिल्म आवारा में यह मंडली एकजुट हुई और फिल्म ने देश ही बल्कि दुनिया के कई देशों मसलन रूस से लेकर चीन तक धूम मचा दी. खासतौर पर आवारा हूं… गीत काफी मशहूर हुआ. यह आज भी एक आइकॉनिक गीत है. लेकिन राजकपूर को यह गाना पसंद नहीं था. और बिना उस गीत के ही फिल्म बनकर तैयार हो गई.

आवारा हूं… पर राज कपूर को था संशय

राज कपूर इस गीत को अपनी फिल्म में शामिल करने को लेकर असमंजस में थे. उनको आशंका सता रही थी कहीं यह फिल्म के आशय पर नकारात्मक असर ना डाले. वास्तव में वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे. राज कपूर उस वक्त बड़ी हस्ती बन चुके थे, उनके मुकाबले शैलेन्द्र की हैसियत मामूली थी. लिहाजा राज कपूर के मना कर देने पर शैलेन्द्र ने खामोश रहना ही बेहतर समझा. हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि राज कपूर शुरू से ही शैलेन्द्र की कविताओं और गीतों के मुरीद थे. दोनों के बीच दोस्ती गहरी हो चुकी थी. राज कपूर कवि शैलेन्द्र की बहुत इज्जत करते थे, शैलेन्द्र भी दोस्त राज कपूर का पूरा सम्मान करते थे.

के.ए. अब्बास के सुझाव से हो गए अमर

आवारा रिलीज होने से पहले राज कपूर ने वह गीत दोबारा सुना. लेकिन मन में संशय बरकरार था. संयोगवश उनके मन में एक विचार कौंधा. उन्होंने आवारा हूं… गीत को लेकर अपने दूसरे प्रिय लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास से मुलाकात और चर्चा करने की ठानी. राज कपूर और शैलेन्द्र दोनों के.ए. अब्बास के पास गए. गीत पर विचार-विमर्श किया. ख्वाजा अहमद अब्बास ने गीत सुनते ही कहा- यह तो शानदार है. अगर इसे शामिल किया जाए तो यह आवारा का थीम सांग बन सकता है. फिर क्या था- अब्बास साहब के सुझाव पर राज कपूर ने अपनी तैयार फिल्म में आवारा हूं … गीत को शामिल करने के लिए अलग से शूटिंग की और इसके बाद फिल्म को रिलीज के लिए भेजा.

आवारा ने हासिल की देश के बाहर लोकप्रियता

दिलचस्प बात ये कि इस पूरे प्रसंग का जिक्र खुद गीतकार शैलेन्द्र ने अपने संस्मरण में किया है. यह संस्मरण शैलेन्द्र के जीवनीकार डॉ. इंद्रजीत सिंह की पुस्तक ‘धरती कहे पुकार के’ में संकलित है. शैलेन्द्र ने इसमें लिखा है- जब उन्हें यह जानकारी मिली थी कि राज कपूर आवारा बना रहे हैं तो उन्होंने बिना उनको बताए टायटल पर यह गीत लिखा और एक दिन राज कपूर को सुनाया. लेकिन रिजेक्ट होने पर निराशा हुई. बाद में जब यह फिल्म रिलीज हुई तो उसके बोल, धुन, राज कपूर की अदायगी और मुकेश की गायकी की लोकप्रियता हिंदुस्तान की सीमा पार कर गई. रूस में बच्चे-बच्चे की जुबान पर आवारा हूं… गीत चस्पां हो गया तो चीन में तो फिल्म ने रिकार्डतोड़ कामयाबी हासिल की. यहां तक कि पूर्व सोवियत संघ के कई देशों की भाषाओं में आवारा हूं… के अनेक संस्करण भी आने लगे. रेडियो मॉस्को पर रूसी गायकों का यह पसंदीदा गीत बन गया. दुनिया के कई देशों की फिल्मों पर आवारा फिल्म और इसके गाने का प्रभाव देखा गया. भारत-रूस की दोस्ती का एक सेतु यह गीत भी बना.

आवारा फिल्म का आखिर मैसेज क्या था?

आवारा हिंदी की ऐसी फिल्म थी जिसमें सामाजिक हालात और परिवेश को प्रमुखता दी गई थी. फिल्म की कहानी कहती है- इंसान जन्म से अपराधी या बुरी आदतों वाला नहीं होता, बल्कि हालात और परिवेश उसकी जिंदगी को प्रभावित करते हैं. फिल्म में डाकू जग्गा (के.एन.सिंह) इसी आशय को साबित करने के लिए राजू (राज कपूर) को बचपन में ही अपने कब्जे में ले लेता है और उसे चोर, लुटेरा, पॉकेटमार बना देता है. राजू जब बड़ा होता है तो चाहकर भी अपराध की दुनिया से बाहर निकल नहीं पाता. उसे चोरी की लत लग जाती है और अच्छे भले घर का युवक क्राइम करने पर मजबूर हो जाता है.

फिल्म की इस फिलॉस्फी की तब पूरे हिंदुस्तान में लहर देखी गई. आवारा हूं… का जादू उस दौर के नौजवानों के सिर चढ़कर बोलने लगा. आगे चलकर राज कपूर की कालजयी पहचान बनाने वाले गीतों में इसने अपनी जगह बनाई. आवारा हूं… मेरा जूता है जापानी… जिस देश में गंगा बहती है… जीना यहां मरना यहां… या तीसरी कसम के गीतों के बगैर राज कपूर की चर्चा अधूरी है. युग-युगांतर के लिए ये गीत आइकॉनिक बन गए और शोमैन राज कपूर भी.


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