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बिहार में पिछली बार नीतीशे कुमार, अबकी बार NDA सरकार की बात क्यों? क्या है नये नारे के मायने

बिहार में अब नई चुनावी बहस

बिहार का विधानसभा चुनाव एक बार फिर देश की राजनीति की बहस के केंद्र में है. चुनाव आयोग के SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान से नतीजे कितने प्रभावित होंगे, इस पर मंथन जारी है। इसी बीच बीजेपी के नये चुनावी नारे से सियासी हलके में एक और नई बहस की शुरुआत हो गई है. बीजेपी का नया नारा है-विकास की रफ्तार पकड़ चुका बिहार. फिर से एनडीए सरकार.” बिहार की आम जनता से लेकर राजनीतिक पंडितों तक यह नारा चौंकाने वाला लग रहा है. क्योंकि इसमें नीतीश कुमार का नाम गायब है. बीजेपी का ये चुनावी नारा भले ही औपचारिक तौर पर लॉन्च नहीं हुआ लेकिन दिलचस्प बात ये कि प्रदेश बीजेपी के कई दिग्गज नेताओं ने अपने-अपने सोशल मीडिया के माध्यम से इसे आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है.

आप को याद होगा जब 2015 में बिहार में विधानसभा चुनाव था, तब का नारा था- ‘बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है’ यानी तब नीतीश बिहार में बहार बन कर उभरे. प्रदेश में उनको ‘सुशासन बाबू’ 2005 से ही कहा जा रहा था और 2010 के बाद उनको बिहार का ‘विकास पुरुष’ भी कहा जाने लगा. जब 2020 का चुनाव आया तो नारा बना- क्यूं करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार. इस नारे में पिछले पंद्रह साल के उनके काम काज पर एक तरह से मुहर लगती दिखी. लेकिन 2025 के चुनावी नारे में तो बीजेपी के नारे से उनका पत्ता ही साफ हो गया है. तो क्या समझें! बिहार में अबकी बार का बा? ‘बहार’ की बात कहां गई? क्या बिहार में बीजेपी का मिशन नीतीश कुमार पूरा हो गया?

नीतीश ‘जरूरी’ और ‘मजबूरी’ दोनों रहे हैं

क्या बीजेपी नेतृत्व भी यही मानता है कि नीतीश की रिटायरमेंट का समय आ गया? इस मुद्दे पर खुद नीतीश कुमार और जेडीयू नेताओं की प्रतिक्रिया का इंतजार है. फिलहाल जदयू नेता केसी त्यागी का कहना है कि इससे कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है. हालांकि बिहार की सियासत में नीतीश जरूरी और मजबूरी का मुहावरा बहुत फेमस है. प्रदेश की राजनीति में नीतीश ने अपनी उपस्थिति और निर्भरता कुछ इस भांति बनाई है कि उनके बिना ना तो आरजेडी और ना ही बीजेपी का मिशन पूरा हुआ है. इसके बावजूद बीजेपी के इस नारे में ना तो जेडीयू और ना ही नीतीश कुमार का नाम है तो सत्ता के गलियारे में सवाल उठना लाजिमी है.

बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व हो या कि प्रदेश स्तर के नेता- सभी ने हमेशा यही कहा है कि बिहार का आगामी चुनाव पीएम मोदी के चेहरे और नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा. तो बीजेपी इस बार नीतीश का नाम क्यों भूली? आखिर इसका क्या संकेत हो सकता है. दो टूक सवाल कि चुनाव बाद अगर एनडीए दोबारा सत्ता में आती है तो क्या सीएम चेहरा कोई और होगा?

क्या रिस्की हो गया ‘नीतीशे कुमार’ का नारा?

क्या बीजेपी नेतृत्व को यह आभास हो चला है कि पिछले विधानसभा चुनावों की तरह नीतीशे कुमार का नारा देना इस बार रिस्की हो सकता है? क्योंकि बिहार में राहुल गांधी की यात्रा और तमाम सर्वे में तेजस्वी जिस तरह से लगातार सत्ता को चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में अकेले नीतीश का नाम और चेहरा आखिर कितना जादू कर सकता है? संभव है बीजेपी ने यह विचार किया हो कि नीतीशे कुमार को बूस्टर डोज देने के लिए एनडीए सरकार का नारा देना जरूरी है.

नीतीश की सेहत पर तेजस्वी ने उठाये सवाल

गौरतलब है कि बिहार में विपक्षी दलों में खासतौर पर आरजेडी और कांग्रेस नेताओं से काफी समय पहले से ही यह प्रचारित करना शुरू कर दिया था कि 2025 चुनाव में नीतीश कुमार का नाम और चेहरा केवल एक मुखौटे की तरह है. तेजस्वी यादव सबसे मुखर तौर पर हमलावर रहे हैं. तेजस्वी ने नीतीश कुमार की सेहत से लेकर उनकी कार्यक्षमता को लेकर भी सवाल उठा चुके हैं. तेजस्वी ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि नीतीश जी अचेतावस्था में जा चुके हैं. अब सत्ता संभालना उनके बूते से बाहर है. कांग्रेस नेताओं में अखिलेश सिंह भी नीतीश के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा चुके हैं.

प्रशांत किशोर भी नीतीश पर साधते हैं निशाना

गौरतलब है कि पिछले दो-ढाई दशक के दौरान नीतीश कुमार की शख्सियत के ट्रैक रिकॉर्ड बिहार में चाहे जितना भी पॉजिटिव हो, अब उनकी चुस्ती फुर्ती को लेकर जमीनी फीडबैक अब निगेटिव है. बिहार में प्रमुख नेता के तौर पर उभर रहे जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी इस मुद्दे पर मुखर हो चुके हैं. प्रशांत किशोर बिहार में तेजी से अपना जनाधार बढ़ाते दिख रहे हैं और उन्होंने भी नीतीश कुमार की मौजूदा प्रशासकीय दक्षता पर सवाल उठाया है. हालांकि प्रशांत किशोर के निशाने पर आरजेडी और बीजेपी दोनों दल हैं. प्रशांत का मानना है बिहार को तीसरे विकल्प की जरूरत है और वो उसी पर अपना फोकस बनाये हुए हैं.

नीतीश ने अब NDA के साथ रहने की शपथ ली

वैसे 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आरजेडी से संबंध विच्छेद के बाद से ही नीतीश कुमार सार्वजनिक मंच से बार-बार कहते रहे हैं कि हम वापस एनडीए में आ गये हैं. हम पहले भी एनडीए के साथ थे, बीच में उधर चले गये थे लेकिन अब इधर उधर नहीं करेंगे. नीतीश कुमार यह बात खासतौर पर तब जरूर कहते हैं जब किसी मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके साथ मंच पर होते हैं. नीतीश के इस बयान के समय जब कैमरा फोकस करता है तब प्रधानमंत्री मोदी इसे सुनते हुए प्रसन्न दिखाई देते हैं.

हालांकि नीतीश से किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि उन्हें इस कथन को बार-बार दोहराने की क्यों जरूरत पड़ती है. अब बिहार में महागठबंधन नेता कहने को कह सकते हैं कि नीतीश अब एनडीए के साथ हैं इसलिए बीजेपी का यह नारा सभी दलों को साथ लेकर चलने वाला है. वहीं बीजेपी अब भी यह दलील दे सकती है कि सरकार एनडीए की होगी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे.

नीतीश की छवि पर ‘पलटू राम’ का भी ठप्पा

गौरतलब यह भी है कि बिहार में नीतीश कुमार साल 2005 से ही सत्ता में हैं. जीतन राम माझी के कार्यकाल को छोड़ दें तो तकरीबन दो दशक से लगातार वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं. इस बीच उन्होंने आरजेडी के लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव के साथ गठबंधन करके भी बिहार में सरकार बनाई थी. फिर वापस एनडीए में आए. एनडीए-इंडिया में उनकी इस अंतर्यात्रा के चलते उन पर निशाने भी खूब साधे गये. उन्हें ‘पलटू राम’ तक कहा गया. इससे नीतीश की छवि पर भी असर पड़ा.

वैसे उनकी पलट जाने वाली छवि को लेकर ना तो बीजेपी और ना ही आरजेडी के पास कोई ठोस जवाब है. बिहार में आगामी चुनाव में सत्ता किसे मिलेगी- इसको लेकर हाल में कई छोटे-बड़े सर्वे आ रहे हैं. तकरीबन सभी सर्वे में एंटी इंकंबेंसी का असर देखा जा रहा है. सीएम चेहरा की रेस में नीतीश कुमार तेजस्वी से पिछड़ चुके हैं. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के नाम और चेहरे का बैकअप उनके साथ है.

संभवत: बीजेपी अपने नये चुनावी नारे से दो तरह के संकेत देना चाहती है. पहला संकेत तो यह है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हो भी सकते हैं और नहीं भी. दूसरा प्रयास बीजेपी के अंदर उन नेताओं को संतुष्ट करना है जो अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते.

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