Nation- मराठवाड़ा में बढ़े किसानों के आत्महत्या के मामले, 8 महीने में 12 सौ से अधिक ने दी जान- #NA

मराठवाड़ा में बढ़े किसानों के आत्महत्या के मामले, 8 महीने में 12 सौ से अधिक ने दी जान

महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या से चिंता.

महाराष्ट्र केमराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. 1 जनवरी 2025 से 31 अगस्त 2025 तक कुल 1,214 किसानों की आत्महत्या दर्ज की गई है. इसमें से 762 मामलों की जांच पूरी कर मुआवजा प्रक्रिया शुरू की गई है, जबकि 208 मामले लंबित हैं. अब तक पीड़ित परिवारों को लगभग 762 लाख रुपये की मदद वितरित की गई है.

किसानों के आत्महत्या के सबसे अधिक मामले बीड (172) और नांदेड़ (104) जिलों से आए हैं. केवल जालना और लातूर जिलों में बड़ी संख्या में प्रकरण अभी भी लंबित हैं. अगस्त महीने में मामलों की संख्या में अचानक गिरावट दर्ज की गई, लेकिन लंबित प्रकरणों का आंकड़ा बढ़ा है.

जिला-वार स्थिति

औरंगाबाद संभाग (छत्रपती संभाजीनगर): 128 मामले, 91 योग्य, 13 अपात्र, 24 लंबित.

जालना: 49 मामले, 16 योग्य, 33 लंबित.

परभणी: 71 मामले, 33 योग्य, 27 अपात्र, 11 लंबित.

हिंगोली: 43 मामले, 33 योग्य, 6 अपात्र, 4 लंबित.

नांदेड़: 104 मामले, 67 योग्य, 7 अपात्र, 30 लंबित.

बीड: 172 मामले, 131 योग्य, 29 अपात्र, 12 लंबित.

लातूर: 55 मामले, 38 योग्य, 17 लंबित.

धाराशिव: 85 मामले, 54 योग्य, 11 अपात्र, 20 लंबित.

औरंगाबाद डिवीजन (संपूर्ण): 707 मामले, 463 योग्य, 93 अपात्र, 151 लंबित.

पूरी तरह से खेती पर निर्भर हैं किसान

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर किसान पूरी तरह से कृषि पर निर्भर परिवारों से हैं, जिनके पास आय का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं है. ऐसे में जब फसलें खराब हो जाती हैं, तो वे आत्महत्या का रास्ता अपनाते हैं.

हाल ही में तब विवाद खड़ा हो गया जब महाराष्ट्र के कृषि मंत्री माणिकराव कोकाटे ने टिप्पणी की कि किसान माफी की उम्मीद में जानबूझकर फसल ऋण नहीं चुकाते हैं. उन्होंने सरकारी समर्थन के बावजूद किसानों पर अपने खेतों में निवेश नहीं करने का आरोप लगाया. हालांकि बाद में कोकाटे ने माफी मांगी, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने उनकी असंवेदनशीलता के लिए उन्हें फटकार लगाई.

जलवायु परिवर्तन से बदल रहा मौसम

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षों में इस क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन का सामना करना पड़ा है, जिसमें बार-बार सूखा, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि शामिल है. उन्होंने जुलाई 2022 की बाढ़ की ओर इशारा किया जिसने कपास और दालों को नुकसान पहुंचाया.

उन्होंने कहा कि पानी की कमी के साथ, “अर्ध-शुष्क परिस्थितियां और अपर्याप्त सिंचाई किसानों को अनियमित मानसून की दया पर छोड़ देती है.”

भूजल की कमी ने संकट को और बढ़ा दिया है, अब 700 से 1,000 फीट गहरे बोरवेल खोदे जा रहे हैं, जिससे सिंचाई की लागत काफी बढ़ गई है. 2015 में, मंजारा जैसे प्रमुख जलाशयों में शून्य भंडारण था. परिणामस्वरूप, कई किसान गन्ना काटने या शहरों में मजदूरी करने के लिए पलायन कर गए हैं, जिससे परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त हो गई हैं.

इनपुटः अविनाश पाटिल

मराठवाड़ा में बढ़े किसानों के आत्महत्या के मामले, 8 महीने में 12 सौ से अधिक ने दी जान

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महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या से चिंता.

महाराष्ट्र केमराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. 1 जनवरी 2025 से 31 अगस्त 2025 तक कुल 1,214 किसानों की आत्महत्या दर्ज की गई है. इसमें से 762 मामलों की जांच पूरी कर मुआवजा प्रक्रिया शुरू की गई है, जबकि 208 मामले लंबित हैं. अब तक पीड़ित परिवारों को लगभग 762 लाख रुपये की मदद वितरित की गई है.

किसानों के आत्महत्या के सबसे अधिक मामले बीड (172) और नांदेड़ (104) जिलों से आए हैं. केवल जालना और लातूर जिलों में बड़ी संख्या में प्रकरण अभी भी लंबित हैं. अगस्त महीने में मामलों की संख्या में अचानक गिरावट दर्ज की गई, लेकिन लंबित प्रकरणों का आंकड़ा बढ़ा है.

जिला-वार स्थिति

औरंगाबाद संभाग (छत्रपती संभाजीनगर): 128 मामले, 91 योग्य, 13 अपात्र, 24 लंबित.

जालना: 49 मामले, 16 योग्य, 33 लंबित.

परभणी: 71 मामले, 33 योग्य, 27 अपात्र, 11 लंबित.

हिंगोली: 43 मामले, 33 योग्य, 6 अपात्र, 4 लंबित.

नांदेड़: 104 मामले, 67 योग्य, 7 अपात्र, 30 लंबित.

बीड: 172 मामले, 131 योग्य, 29 अपात्र, 12 लंबित.

लातूर: 55 मामले, 38 योग्य, 17 लंबित.

धाराशिव: 85 मामले, 54 योग्य, 11 अपात्र, 20 लंबित.

औरंगाबाद डिवीजन (संपूर्ण): 707 मामले, 463 योग्य, 93 अपात्र, 151 लंबित.

पूरी तरह से खेती पर निर्भर हैं किसान

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर किसान पूरी तरह से कृषि पर निर्भर परिवारों से हैं, जिनके पास आय का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं है. ऐसे में जब फसलें खराब हो जाती हैं, तो वे आत्महत्या का रास्ता अपनाते हैं.

हाल ही में तब विवाद खड़ा हो गया जब महाराष्ट्र के कृषि मंत्री माणिकराव कोकाटे ने टिप्पणी की कि किसान माफी की उम्मीद में जानबूझकर फसल ऋण नहीं चुकाते हैं. उन्होंने सरकारी समर्थन के बावजूद किसानों पर अपने खेतों में निवेश नहीं करने का आरोप लगाया. हालांकि बाद में कोकाटे ने माफी मांगी, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने उनकी असंवेदनशीलता के लिए उन्हें फटकार लगाई.

जलवायु परिवर्तन से बदल रहा मौसम

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षों में इस क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन का सामना करना पड़ा है, जिसमें बार-बार सूखा, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि शामिल है. उन्होंने जुलाई 2022 की बाढ़ की ओर इशारा किया जिसने कपास और दालों को नुकसान पहुंचाया.

उन्होंने कहा कि पानी की कमी के साथ, “अर्ध-शुष्क परिस्थितियां और अपर्याप्त सिंचाई किसानों को अनियमित मानसून की दया पर छोड़ देती है.”

भूजल की कमी ने संकट को और बढ़ा दिया है, अब 700 से 1,000 फीट गहरे बोरवेल खोदे जा रहे हैं, जिससे सिंचाई की लागत काफी बढ़ गई है. 2015 में, मंजारा जैसे प्रमुख जलाशयों में शून्य भंडारण था. परिणामस्वरूप, कई किसान गन्ना काटने या शहरों में मजदूरी करने के लिए पलायन कर गए हैं, जिससे परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त हो गई हैं.

इनपुटः अविनाश पाटिल

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