MP News: Teachers Day 2025: जंगल में चराता था गाय, अब इंग्लिश में देगा लेक्चर; छिंदवाड़ा के दिलीप डेहरिया के संघर्ष की कहानी, कैसे बने प्रोफेसर? – INA

MP News: Teachers Day 2025: जंगल में चराता था गाय, अब इंग्लिश में देगा लेक्चर; छिंदवाड़ा के दिलीप डेहरिया के संघर्ष की कहानी, कैसे बने प्रोफेसर? – INA

कभी वो जंगलों में गाय, भैंस चराते थे. पांचवी क्लास तक अंग्रेजी का नाम तक नहीं सुना था. छठवीं क्लास में आने के बाद अंग्रेजी के 26 अक्षर सीखे थे. वो अब कॉलेज के छात्रों को अंग्रेजी के लेक्चर देंगे. कहते हैं कि अगर हौंसले बुलंद हो तो मंजिल मिल ही जाती है. ये कहानी है मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा के दिलीप डेहरिया की. वो अपनी मेहनत और जिद से सफलता के शिखर पर पहुंचे हैं.

दिलीप डेहरिया का जन्म छिंदवाड़ा के आदिवासी इलाके अमरवाड़ा के एक छोटे से गांव सारसडोल के बहुत ही गरीब परिवार में हुआ. शुरुआत में दिलीप सुविधा न होने के कारण गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़े. इसी दौरान वो बचे समय में जंगलों में गाय, भैंस भी चराते थे. दिलीप 12वीं तक गांव के पास ही घोगरी के सरकारी स्कूल में पढ़े. 12वीं तक वो तक जंगलों में गाय, भैंस चराते रहे.

लेक्चरर बनने का सफर आसान बिल्कुल भी नहीं था

दिलीप ने पांचवी क्लास तक अंग्रेजी भाषा का नाम तक नहीं सुना था. छठवीं क्लास में अंग्रेजी के 26 अक्षर पहली बार पढ़े थे. उनके लिए कॉलेज में अंग्रेजी का लेक्चरर बन जाने का सफर आसान बिल्कुल भी नहीं था. 12वीं क्लास के बाद दीलीप ने सीधे छिंदवाड़ा के पीजी कॉलेज में दाखिला लिया. कॉलेज में उन्होंने इतिहास राजनीति शास्त्र के साथ बीए में एडमिशन लिया.

एक बार वो अपनी कक्षा से निकल रहे थे. बगल वाली क्लास में पढ़ाई हो रही थी तो वो बाहर रुककर सुनने लगे. उन्होंने दूसरे बच्चों से पूछा कि इस क्लास में किस विषय की पढ़ाई कराई जा रही है, तो बच्चों ने उनको बताया कि यहां इंग्लिश लिटरेचर का पीरियड लगा हुआ है. बस फिर क्या था दिलीप ने तय किया वो अपने विषय बदलेंगे और अंग्रेजी में पढ़ाई करेंगे. इसे लेकर दिलीप कॉलेज के प्रिंसिपल से मिले.

सितंबर 2005 में इंग्लिश लिटरेचर में दाखिला मिला

कॉलेज के प्रिंसिपल की ओर से उनको कहा गया कि वो बहुत लेट हो गए हैं. वो हिंदी मीडियम से पढ़ें हैं. कवर नहीं कर पाएंगे. फिर दिलीप अपनी खुद की क्लास छोड़कर इंग्लिश की कक्षा के बाहर बैठकर अंग्रेजी की क्लास सुनने लगे. यही नहीं दिलीप ने जिद करके प्रिंसिपल और एचओडी को मना लिया. उनको सितंबर 2005 में इंग्लिश लिटरेचर में दाखिला मिला.

तीन माह की पढ़ाई के बाद वो मिड टर्म में कॉलेज टॉपर बने. दिलीप डेहरिया ने कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने का सपना देखा. इस सपने को पूरा करने के लिए उनको पीएचडी जरूरी थी. उसकी पढ़ाई का खर्च अधिक था, जो उठा पाना दिलीप या उनके परिवार वालों के लिए संभव नहीं था. ऐसे में उनके शिक्षकों ने बताया कि वो अगर नेट क्वालीफाई करें तो अस्सिटेंट प्रोफेसर के लिए अप्लाई कर सकते हैं.

दिलीप के लिए ये रास्ता भी कठिन था, लेकिन उन्होंने अपनी मां के जेवर गिरवी रखकर B.Ed की पढ़ाई की और फिर वर्ग एक में शिक्षक बन गए. इसके बाद उन्होंने नेट क्वालीफाई किया और अब एमपीपीएससी के जरिए असिस्टेंट प्रोफेसर बने.

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Teachers Day 2025: जंगल में चराता था गाय, अब इंग्लिश में देगा लेक्चर; छिंदवाड़ा के दिलीप डेहरिया के संघर्ष की कहानी, कैसे बने प्रोफेसर?

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