Nation- 6 बार डिप्टी सीएम, एक बार के सांसद…हर दल को साध लेते थे अजित, लेकिन ये तमन्ना रह गई अधूरी- #NA

6 बार डिप्टी सीएम, एक बार के सांसद...हर दल को साध लेते थे अजित, लेकिन ये तमन्ना रह गई अधूरी

विमान हादसे में अजित पवार का निधन

अजित पवार की विमान हादसे में मौत कई सवाल खड़े करती है. क्यों आखिर हमारे देश में छोटे विमान सेफ नहीं हैं. 1980 में संजय गांधी की भी एक छोटे विमान के क्रैश हो जाने से मौत हो गई थी. हालांकि वह विमान वह खुद उड़ा रहे थे. माधव राव सिंधिया जब चुनाव प्रचार के लिए जा रहे थे तब उत्तर प्रदेश में मैनपुरी के निकट उनका जहाज क्रैश हो गया था. पूर्व लोक सभा अध्यक्ष सीएम बालयोगी भी विमान हादसे में मारे गये थे. आंध्र के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी का हेलीकॉप्टर आंध्र के जंगलों इस तरह दुर्घटना ग्रस्त हुआ कि आज तक न तो हेलीकॉप्टर के अवशेष मिले न राजशेखर रेड्डी का शव. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल विपिन रावत भी तमिलनाडु के जंगलों में एक हेलीकॉप्टर हादसे में मारे गये थे. ताजा मामला अजित पवार का है. उनको बारामती ले जा रहा प्राइवेट जेट बुधवार की सुबह हादसे का शिकार हो गया.

DGCA की जांच के नतीजों से कोई संतुष्ट नहीं हुआ

इस हादसे में भी कोई नहीं बचा. विमान में उनके सुरक्षा अधिकारी, दो पॉयलेट एक अटेंडेंट भी थी. सबके शव ही मिले. विमान यात्रा सबसे सुरक्षित मानी जाती है मगर जब भी कोई विमान हादसा होता है तब विमान में सवार किसी भी व्यक्ति के बचने की उम्मीद न के बराबर होती है. DGCA जांच करता है लेकिन आज तक किसी भी जांच के कोई संतोष जनक परिणाम नहीं मिले है. यह शक बना ही रहता है कि जांच में लीपापोती की गई. जो भी राजनीतिक लोग विमान हादसे के शिकार हुए वे सब के सब महत्त्वपूर्ण थे और पर्याप्त महत्त्वाकांक्षी भी. अजित पवार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री थे और राष्ट्रवादी कांग्रेस के सदर भी. उन्होंने राजनीति अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया में शुरू की पर जब भी उन्हें अवसर मिला वे चाचा को छोड़ दिए. उनकी प्रबल इच्छा महाराष्ट्र की कमान संभालने की थी. जो पूरी नहीं हो सकी.

चाचा और भतीजे के बीच रार क्यों आई

लेकिन आज महाराष्ट्र में भाजपा के अलावा कोई भी दल इस स्थिति में नहीं था कि NDA गठबंधन से अलग हो कर UPA गठबंधन के दलों के साथ मिल कर सरकार बना ले. क्योंकि हर छोटे दल में सबके सब अति महत्त्वाकांक्षी हैं. एकनाथ शिंदे की शिव सेना में स्वयं शिंदे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे इसलिए कोई भी गुट तब ही सरकार में रह सकता था जब वह भाजपा के साथ खड़ा हो. अजित का पूरा परिवार राजनीति में है. चाचा शरद पवार और चचेरी बहन सुप्रिया सुले तथा अजित की पत्नी भी संसद में हैं. शरद और अजित के बीच रिश्ते कटु, तिक्त और मीठे होते रहे. किंतु शरद के बिना अजित की हैसियत नहीं थी और बुढ़ापे में चाचा शरद को भतीजे के सहारे की जरूरत थी. गलती स्वयं चाचा कर बैठे थे, उन्होंने भतीजे की बजाय बेटी सुप्रिया सुले को आगे करना शुरू किया. भतीजा ताड़ गया और फट से भाजपा का सहयोगी बन गया.

बारामती में चाचा पर भारी पड़े अजित

अजित पवार काफी लोकप्रिय थे. मराठवाड़ा और खासकर बारामती में पवार परिवार का वर्चस्व क़ायम था. पवार परिवार के रहते मराठवाड़ा में भाजपा का घुसना काफी मुश्किल था. इस मामले में अजित पवार भाजपा के लिए मुफ़ीद रहे. NDA की देवेंद्र फडणवीस सरकार में अजित पवार और एकनाथ शिंदे उप मुख्यमंत्री बनाये गए थे. पर इस हादसे से पवार परिवार की पावर तो कम हो ही गई. शरद परिवार 85 पार हैं और सुप्रिया सुले राजनीति में उतनी परिपक्व नहीं हैं, जितने कि अजित पवार थे. अजित ने पहला चुनाव 1991 में बारामती से ही जीता था किंतु बाद में अपने चाचा को लोकसभा भेजने के लिए उन्होंने यह सीट चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी और विधानसभा में आ गए. तब से 2014 तक वे बारामती सीट से विधायक रहे. नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव में तो भतीजे ने चाचा से बारामती भी छीन ली.

Sharad Pawar And Ajit Pawar

शरद पवार और अजित पवार.

चाचा को 2019 में पहली बार चौंकाया

साल 2019 में अजित ने पहली बार चाचा (शरद) को चौंकाया. तब NCP में अपने समर्थकों के साथ वे NDA में चले गए थे. देवेंद्र फडणवीस फिर मुख्यमंत्री बने और अजित उप मुख्यमंत्री लेकिन 80 घंटे भी यह सरकार न चल पाई और अजित वापस चाचा के पास पहुंच गए. ऊद्धव ठाकरे के नेतृत्त्व में शिव सेना, कांग्रेस तथा NCP की महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार बन गई. इस सरकार में भी अजित पवार उप मुख्यमंत्री बने. पर उद्धव अनाड़ी साबित हुए और उनकी ही पार्टी के एकनाथ शिंदे अपने समर्थक विधायकों को ले कर NDA में शामिल हो गए. इस बार NDA ने शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया और अपनी ही पार्टी के दो बार मुख्यमंत्री रहे देवेंद्र फडणवीस को उप मुख्यमंत्री. विधानसभा में अजित पवार नेता विरोधी दल बन गए. उधर, अजित को सरकार से बाहर रहना मुश्किल था क्योंकि बतौर मंत्री उन पर 70 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप था.

अजित फिर अपने समर्थकों के साथ NDA में चले गए

जल्द ही अजित फिर अपने समर्थकों के साथ NDA का रुख कर गए. उन्हें शिंदे ने उप मुख्यमंत्री का दर्जा दिया. इस बार NCP के चुनाव चिन्ह को ले कर शरद पवार चुनाव आयोग के पास गए. चूंकि अधिकतर विधायक अजित के साथ थे. आखिर में चुनाव आयोग ने अजित पवार के साथ गई पार्टी को ही असली NCP माना. शरद के साथ रही पार्टी को NCP (शरद चंद्र पवार) कहा गया. 2022 में जब शरद पवार की महत्त्वाकांक्षी योजना महाराष्ट्र कृष्णा वैली डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MKVDC) की जमीन लवासा को दे दी. वे इस मामले में घिर गए थे. लवासा प्रोजेक्ट के प्रति यह तरफदारी उनको भारी पड़ गई. इसीलिए भी एकनाथ शिंदे सरकार के साथ आ जाना उनकी मजबूरी थी. कांग्रेस शासन के दौरान जब वे जल संसाधन मंत्री थे, तब उन पर विदर्भ सिंचाई विकास निगम की कई योजनाओं को भी चहेतों को देने का आरोप था.

सुप्रिया सुले को पॉलिटिक्स में लाने से अजित भड़के

उनके बयान अक्सर उन पर भारी पड़ जाते थे. शायद वे जल्दी निराश हो जया करते थे. 2004 के बाद से अजित पवार चाचा शरद पवार पर लगातार दबाव डालने लगे थे कि वे उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनवाएं. पर शरद पवार भतीजे की कलाओं को समझते थे. अजित पवार बहुत महत्त्वाकांक्षी तो थे किंतु उनकी पढ़ाई-लिखाई अधिक नहीं थी. वे चाचा की विरासत संभालने के काबिल भी नहीं थे अलबत्ता वे चुनावी प्रबंधक अच्छे थे. इसलिए शरद पवार ने भतीजे की अनदेखी की. यही नहीं 2006 में शरद पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सुले को राजनीति में उतारा और राज्यसभा में भेज दिया. तब से ही भतीजे की आंखों में चाचा के प्रति अवहेलना झलकने लगी थी और अजित पवार वह सब पा लेना चाहते थे, जो मंत्री रहते हो सकता था. पैसा और पावर की भूख उन्हें बहुत थी.

छह बार संभाला डिप्टी सीएम का पद

छह बार महाराष्ट्र में उप मुख्यमंत्री रहे अजित पवार की अनदेखी संभव नहीं थी. 10 नवंबर 2010 को पृथ्वीराज चव्हाण सरकार में वे पहली बार उप मुख्यमंत्री बने. 22 महीने बाद उन्हें पद से हटाया गया किंतु एक महीने के भीतर ही चव्हाण ने उन्हें 25 अक्तूबर 2012 को फिर उप मुख्यमंत्री बना लिया. इसके बाद 2019 में वे 80 घंटे के लिए देवेंद्र फडणवीस सरकार में इस पद पर रहे फिर ऊद्धव के साथ. 2 जुलाई 2023 को जब वे एकनाथ शिंदे सरकार के समय NDA गठबंधन में आए तब भी उन्हें डिप्टी सीएम का पद मिला और 5 दिसंबर 2024 से वे फडनवीस सरकार में डिप्टी सीएम थे. देवेंद्र फडणवीस को भी अजित पर भरोसा नहीं था क्योंकि वे 2019 वाली कलाबाजी देख चुके थे. लेकिन एकनाथ शिंदे को बैलेंस करने के लिए अजित को साधना जरूरी था. इसलिए वे अजित को बनाये रखना चाहते थे.

Maharashtra Deputy Cm Ajit Pawar Plane Crash

खेला करने में उस्ताद थे अजित

मुंबई नगर निगम चुनाव में सबसे अधिक पार्षद भाजपा के जीते फिर भी अपने बूते वह मेयर नहीं बनवा सकती. उसे 89 सीटें मिली हैं जबकि सदन 227 का है. NDA के घटक दल शिव सेना को 29 और उद्धव वाली शिवसेना को 65 सीटें. हालांकि मुंबई में पवार परिवार की पावर नहीं है मगर अजित खेला करवा सकते थे क्योंकि शिंदे भी मेयर के लिए अड़ गए थे. अजित के पास कुल 3 सीटें थीं और उनके चाचा वाली NCP के पास सिर्फ एक. अजित राजनीति के उस्ताद थे. वे किसी के खास भले न हों लेकिन किसी से भी दोस्ती बनाने की कला में माहिर. इसीलिए मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी इस विमान हादसे पर अंगुली उठा रहे हैं. मगर जांच का अधिकार तो सिर्फ DGCA के पास है.

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