Nation- संत के सहारे उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी खड़ी करने का प्लान, अखिलेश यादव का ये दांव आएगा कितना काम?- #NA

संत के सहारे उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी खड़ी करने का प्लान, अखिलेश यादव का ये दांव आएगा कितना काम?

उत्तराखंड में पार्टी के लिए अखिलेश यादव कर रहे बड़ी तैयारी

समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी अपनी पार्टी का विस्तार करने की कोशिशों में लगे हैं. उनका लक्ष्य उत्तर प्रदेश से सटे उत्तराखंड में पार्टी को खड़ा करने का है. यूपी की तरह उत्तराखंड में भी 2027 में विधानसभा चुनाव कराए जाने हैं, ऐसे में वह अभी से यहां पर पार्टी के लिए संभावना तलाशने में जुट गए हैं. एक बड़े दांव के साथ उन्होंने इसकी शुरुआत भी कर दी है. हालांकि उनके लिए यह राह इतनी आसान नहीं दिख रही क्योंकि यहां बीजेपी या कांग्रेस का ही दबदबा रहा है.

अखिलेश यादव ने करीब एक साल से खाली पड़े पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का ऐलान कर दिया है. उन्होंने उत्तराखंड में पार्टी की कमान 35 साल के महंत शुभम गिरी के हाथों में सौंप दी. इस तरह से एक फैसले से उन्होंने कई चीजों पर निशाना साधा है. पहले तो महंत शुभम गिरी महज 35 साल के हैं और वह काफी युवा हैं, दूसरा महंत भी हैं. इसके जरिए वह धर्म की राजनीति भी कर सकेंगे.

धर्म के रास्ते पार्टी आगे बढ़ाने की योजना

सपा को लगता है कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में महंत शुभम गिरी के जरिए धर्म की राजनीति को धार दिया जा सकता है. धर्म के रास्ते से होते हुए पार्टी का जनाधार बढ़ाने में सहुलियत हो सकती है. शुभम हरिद्वार के ही रहने वाले हैं और लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े भी हुए हैं.

अखिलेश यादव ने एक साल पहले ही उत्तराखंड में सपा की सभी यूनिट को बर्खास्त कर दिया था. और फिर तभी से पार्टी अपने नए अध्यक्ष की तलाश में लगी थी. पार्टी नेतृत्व की तलाश अब महंत शुभम गिरी के रूप में पूरी हुई. नया प्रदेश अध्यक्ष मिलने के बाद पार्टी की अगली कोशिश अब जल्द से जल्द राज्य की सभी यूनिटों में पदाधिकारियों की नियुक्ति की रहेगी. चुनाव में अभी डेढ़ साल का वक्त है, ऐसे में पार्टी नई टीम के साथ इस पहाड़ी राज्य में अपने लिए संभावनाओं के साथ आगे बढ़ सकती है.

रामपुर तिराहा कांड और समाजवादी पार्टी

हालांकि समाजवादी पार्टी को लेकर उत्तराखंड में आज भी नाराजगी देखी जाती है. यही वजह है कि पार्टी अब तक अपना मजबूत जनाधार यहां पर नहीं बना सकी है. उत्तर प्रदेश से अलग कर उत्तराखंड के रूप में नए राज्य की मांग को लेकर आंदोलन के दौरान सपा की सख्ती आज भी उस पर भारी पड़ती दिख रही है. गुजरते दौर में पार्टी मैदानी इलाकों में थोड़ा बहुत अच्छा प्रदर्शन करती रही है, लेकिन पहाड़ी इलाकों में उसकी उपस्थिति करीब-करीब शून्य है.

उसकी राह में हर बार रामपुर तिराहा कांड एक बड़ी बाधा बनकर आ जाती है. बात साल 1994 में अक्टूबर की है जब उत्तराखंड के रूप में नए राज्य की मांग के साथ लोग दिल्ली आ रहे थे, लेकिन मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर 1 अक्टूबर की रात आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच कहासुनी हो गई, और इस दौरान पथराव भी हो गया. अगले दिन 2 अक्टूबर को स्थिति और खराब हो गई. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी जिसमें 7 लोग मारे गए और दर्जनों लोग घायल हो गए. इस घटना के 6 साल बाद उत्तराखंड नए राज्य में रूप में अस्तित्व में आया.

उत्तराखंड में विधानसभा में SP का प्रदर्शन

बात अब समाजवादी पार्टी के उत्तराखंड में चुनावी प्रदर्शन की करते हैं. हर विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार उतारने के बावजूद पार्टी का अब तक खाता तक नहीं खुल सका है. साल 2000 में नया राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में पहली बार 2002 में विधानसभा चुनाव कराया गया. पार्टी ने साल 2002 के चुनाव में 63 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे.

लेकिन उसके खाते में 6.3 फीसदी यानी 1,79,543 वोट आए. 3 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे तो 4 प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे. जबकि इस चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी 7 सीट जीतकर तीसरे नंबर की पार्टी बनी थी. साल 2007 के चुनाव में सपा ने 55 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा लेकिन उसका इस बार वोट शेयर भी गिर गया. उसे 1,87,070 वोट मिले और 3 प्रत्याशियों को उपविजेता के रूप में संतोष करना पड़ा.

SP का लगातार गिरता गया वोट शेयर

साल 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने तीसरी बार अपनी किस्मत आजमाई और 45 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, लेकिन प्रदर्शन इस बार और भी खराब रहा. महज एक प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा. साथ में वोट शेयर घटकर 1.4 फीसदी यानी 60,133 वोट तक आ गया. फिर 2017 के चुनाव में सपा ने 20 प्रत्याशी उतारे और सिर्फ एक प्रत्याशी ही तीसरे स्थान पर आ सका. पार्टी के खाते में एक फीसदी वोट (महज 18,202 वोट) भी नहीं आए.

अखिलेश यादव ने 2022 में हुए पिछले चुनाव में उत्तराखंड में थोड़ी हिम्मत दिखाई और फिर से 50 से अधिक यानी 54 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए. हालांकि प्रदेश में उसे अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन का सामना करना पड़ा. उसके खाते में 15,388 (0.3%) वोट ही आए. 70 में से 54 में से एक प्रत्याशी ही तीसरे नंबर पर रहा. हल्द्वानी सीट पर पार्टी के प्रत्याशी शोएब अहमद को 2,196 वोट मिले थे और इस चुनाव में पार्टी के किसी प्रत्याशी का सबसे अच्छा प्रदर्शन था.

ऐसा नहीं है कि समाजवादी पार्टी को यहां हर बार हार का ही सामना करना पड़ा है. उसे साल 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान हरिद्वार सीट (राजेंद्र कुमार बाड़ी) पर जीत हासिल हुई थी. लेकिन पार्टी इस जीत को आगे बढ़ाने में नाकाम रही. धर्म से दूरी बनाकर रखने वाले अखिलेश यादव अब उत्तराखंड में इसी के जरिए अपनी चुनावी वैतरणी पार करना चाहते हैं. अब देखना होगा कि उनकी ये कोशिश किस हद तक कामयाब होती है.

संत के सहारे उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी खड़ी करने का प्लान, अखिलेश यादव का ये दांव आएगा कितना काम?

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