Nation- इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश, जमीयत की बैठक में बोले मौलाना महमूद मदनी- #NA

जमीअत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी की सभा शनिवार को भोपाल के बरकतुल्लाह एजुकेशन कैंपस में जमीअत अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी की अध्यक्षता में शुरू हुई. इसमें वक्फ संशोधन अधिनियम, कथित लव जिहाद, मदरसों की सुरक्षा, इस्लामी माहौल में आधुनिक शिक्षा, समान नागरिक संहिता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट रुख प्रस्तुत किया गया. बैठक में देश भर से प्रबंधन कमेटी के सैकड़ों सदस्यों ने भाग लिया.

मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी की यह सभा देश में बढ़ती हुई नफरत, इस्लामोफ़ोबिया और मुसलमानों के विरुद्ध भेदभाव पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है. यह परिस्थिति न केवल देश के संवैधानिक सिद्धांतों, समानता, धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन है, बल्कि राष्ट्रीय एकता, शांति व्यवस्था और सामाजिक न्याय के लिए भी गंभीर ख़तरे का कारण है.

विभिन्न शोध अध्ययनों, मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों और प्रतिष्ठित आंतरिक व बाहरी संस्थानों के लेखों से यह स्पष्ट होता है कि पिछले कुछ वर्षों में मुसलमानों के खिलाफ नफरत-आधारित हिंसा, उकसावे, दुष्प्रचार, भेदभावपूर्ण व्यवहार और उनकी पहचान व आस्था का व्यवस्थित रूप से मजाक उड़ाने और अपमान में असाधारण वृद्धि हुई है. इसके साथ ही, मीडिया और राजनीतिक माहौल भी इस बिगाड़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

जमीयत उलमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी की मांग

  • केंद्र और राज्य सरकारों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, न्यायपालिका और मीडिया नियामक निकायों को घृणा पर आधारित भाषण और हेट क्राइम की रोक-थाम के लिए एक ठोस और प्रभावी रणनीति तैयार करें, और इसके ठीक से लागू होने को सुनिश्चित करें.
  • केंद्रीय और राज्य चुनाव आयुक्त यह सुनिश्चित करें कि चुनाव के दौरान जिन पार्टियों की ओर से नफ़रती बयान दिए जाते हैं, ऐसी पार्टियों की कानूनी मान्यता समाप्त कर दी जाए और ऐसे बयान देने वाले उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द कर दी जाए.
  • सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के आलोक में लापरवाही बरतने वाली एजेंसियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए तथा दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए.
  • विधि आयोग की सिफारिश के अनुसार, धर्म के आधार पर घृणा और अपराधों के लिए एक अलग कानून बनाया जाए और सभी अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के प्रयासों पर रोक लगाई जाए.
  • यह बैठक जमीयत उलेमा के जिम्मेदार लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित करती है कि वे धार्मिक नेताओं, सिविल सोसाइटी, मीडिया और राजनीतिक दलों के सहयोग से इस नफ़रत भरे माहौल को समाप्त करने के अपने प्रयासों को और आगे बढ़ाएं और इसे अपनी राष्ट्रीय, नैतिक और संगठनात्मक ज़िम्मेदारी समझें.

इस्लामी मदरसों की सुरक्षा और संरक्षण

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी की सभा ने मदरसों की सुरक्षा और संरक्षण की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मज़बूत संवैधानिक गारंटी और स्पष्ट संवैधानिक दिशा-निर्देशों के बावजूद, वर्तमान सांप्रदायिक सरकारें धार्मिक मदरसों के विरुद्ध बेबुनियाद दुष्प्रचार और मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार करके उन्हें बदनाम करने और बंद करने की हर संभव कोशिश कर रही हैं. इसका ताज़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम आदि राज्यों में विभिन्न बहानों से मदरसों पर की गई कार्रवाइयां हैं.

इस्लामी मदरसों का अस्तित्व भारत की धरती पर लोकतांत्रिक और बहुलवादी परंपराओं का एक उज्जवल प्रतीक है. देश के स्वतंत्रता संग्राम, लोकतंत्र की स्थापना और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में मदरसों ने जो ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसको कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति नजरअंदाज नहीं कर सकता.

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की यह बैठक भारत सरकार से मांग करती है कि संविधान की रक्षा और देश की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए मदरसों के संबंध में की जा रही उकसावे और जहर फैलाने वाली गतिविधियों के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई करे. यह बैठक देश के हर सम्मानित नागरिक से यह भी उम्मीद करती है कि वह मदरसों के बारे में रची जा रही साजिशों के खिलाफ आवाज बुलंद करे, साम्प्रदायिक तत्वों के भड़काऊ बयानों की कड़ी निंदा करे और उनके खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई की मांग करे.

यह सभा जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष द्वारा मदरसों की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लड़े जा रहे मुकदमों और इसमें मिली आंशिक सफलताओं के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में क्लस्टरों की स्थापना की सराहना करती है और स्पष्ट रूप से घोषणा करती है कि मदरसों की सुरक्षा के लिए हर संभव संघर्ष जारी रहेगा.

साथ ही, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने मदरसा संचालकों को सलाह दिया कि वह मदरसे के स्वामित्व के कागजात, निर्माण, छात्रों के आवास और खातों के संबंध में जमीयत द्वारा 4-5 जुलाई, 2024 को दिल्ली में आयोजित प्रबंधन कमेटी की पिछली बैठक में जारी निर्देशों का पूरी तरह पालन करें. इसके साथ ही, पदाधिकारियों का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि वह इन दिशा-निर्देशों की प्रतियां मदरसा संचालकों तक भेजें और उनकी सहायता के लिए कार्य करें.

इस्लामी मदरसों के लिए कार्ययोजना

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ईमानदार कोशिशों से जुलाई, अगस्त और सितंबर 2025 के महीनों के दौरान आयोजित कई बैठकों में विभिन्न मतों के प्रतिष्ठित विद्वानों और मदरसों से संबंधित लोग एक मंच पर एकत्र हुए. यह परामर्श बैठकें जमीयत के सुझाव, प्रेरणा और मेजबानी में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत आयोजित की गईं.

इन बैठकों के परिणामस्वरूप, जिम्मेदार लोग इस महत्वपूर्ण निर्णय पर पहुंचे कि सभी मत के चुनिंदा उलेमा और विचारकों को शामिल करते हुए एक ‘ऑल इंडिया दीनी मदारिस बोर्ड’ का गठन किया जाए, जो वर्तमान परिस्थितियों और चुनौतियों के संदर्भ में, मदरसों की सुरक्षा, मजबूती और संरक्षण के लिए आवश्यक कार्ययोजना और उपाय अपनाएं. जमीयत की प्रबंधन कमेटी इस संबंध में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करती है और आशा करती है कि इन प्रयासों के परिणाम जल्द से जल्द सामने आएंगे.

इस्लामी माहौल में आधुनिक स्कूलों की स्थापना

जमीयत उलमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी की सभा में कहा गया कि देश भर में इस्लामी माहौल वाले गुणवत्तापूर्ण आधुनिक स्कूलों की स्थापना करना अति आवश्यक है, ताकि आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा, तकनीकी और शोध कौशल, नैतिक और इस्लामी प्रशिक्षण और बुनियादी धार्मिक शिक्षा, सभी को एक समग्र प्रणाली के तहत प्रदान किया जा सके और नई पीढ़ी इस्लामी पहचान के साथ एक भरोसेमंद भविष्य की ओर बढ़ सके.

यह सभा इस बात पर भी ज़ोर देती है कि विश्वास, सभ्य और सुरक्षित शैक्षिक वातावरण की दृष्टि से लड़कियों के लिए अलग से विद्यालयों की स्थापना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. इसलिए लड़कियों के लिए अधिक से अधिक स्कूल स्थापित किए जाएं.

मीडिया, कार्टून और अन्य स्रोतों के माध्यम से बच्चों में गैर-इस्लामी विचारों का संचार करने के संदर्भ में, प्री-स्कूल प्रणाली की स्थापना भी अपरिहार्य है, ताकि कम उम्र से ही सही बौद्धिक और नैतिक आधार प्रदान किया जा सके.

शिक्षकों के व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण केंद्र या विशेष प्रशिक्षण शिविर स्थापित किए जाएं, जिनमें आधुनिक शिक्षा प्रणालियों और इस्लामी प्रशिक्षण, दोनों पर पूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया जाए. जमीअत उलमा की जिला एवं राज्य इकाइयां अपने क्षेत्रों में आवश्यकतानुसार इन संस्थानों की स्थापना, संरक्षण और गुणवत्ता निगरानी में सक्रिय भूमिका निभाएं.

अंत में, यह सभा मुस्लिम समाज के प्रभावशाली और संपन्न लोगों से अपील करती है कि वह अपनी नई पीढ़ी के विश्वास, चरित्र और भविष्य की रक्षा के लिए इस्लामी वातावरण में आधुनिक स्कूलों की स्थापना और उनकी मजबूती में भरपूर सहयोग दें.

समान नागरिक संहिता के खिलाफ प्रस्ताव

प्रबंधन कमेटी की सभा में जमीयत ने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा कि समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) पर लगातार जोर देना देश की धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को कम करने का एक संगठित प्रयास है, जो न केवल मुसलमानों बल्कि देश के सभी अल्पसंख्यकों के लिए अस्वीकार्य है.

उन्होंने कहा कि यह सभा सरकार को याद दिलाती है कि देश की सभी धार्मिक इकाइयां भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों से पूरी तरह पालन करने वाली हैं, इसलिए अगर उनके संवैधानिक अधिकार छीने गए, या उनके धार्मिक नियमों के पालन पर प्रतिबंध लगाए गए, तो इसका सीधा प्रभाव देश की एकता, सद्भावना और अखंडता पर पड़ेगा. यह देश के हित में बिल्कुल नहीं है कि कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि वह अपने ही देश में स्वतंत्रता और आत्मसम्मान से वंचित होता जा रहा है.

इसके अलावा यह धारणा जानबूझकर फैलाई जाती है कि मुसलमान देश के साझा क़ानूनों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं और वे अपने धार्मिक क़ानून पर ही अड़े रहते हैं, जबकि यह पूरी तरह बेबुनियाद प्रचार है. मुसलमानों ने कभी दीवानी या अन्य सिविल क़ानूनों से छूट की मांग नहीं की है. जहां तक पर्सनल लॉ का सवाल है, तो मुसलमानों सहित अनेक धार्मिक और आदिवासी समुदायों को संविधान के तहत अपने धार्मिक क़ानूनों पर अमल करने का अधिकार प्राप्त है.

यह अफसोसजनक है कि आज केवल मुसलमानों के पर्सनल लॉ को निशाना बनाकर उसे समाप्त करने की कोशिश की जा रही है, जबकि आदिवासी समुदायों की छूट जस की तस बनी हुई है. इस पृष्ठभूमि में एक देश, एक क़ानून का नारा महज एक राजनीतिक छलावा है, जिसका वास्तविक निशाना मुसलमानों की धार्मिक पहचान और उनके संवैधानिक अधिकार हैं.

यह सभा केंद्र सरकार और उसके सहयोगी राजनीतिक दलों का ध्यान आकर्षित करती है कि वह समान नागरिक संहिता के किसी भी प्रस्ताव को लागू करने से बचें और भारतीय विधि आयोग द्वारा मांगी गई जनमत की अनदेखी बिल्कुल न करें. हमारा देश अनेकता में एकता का सर्वोच्च उदाहरण है, इसलिए कोई भी कानून जो इस बहुलवादी संरचना की अनदेखी करे, वह देश की एकता, अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए हानिकारक सिद्ध होगा.

उन्होंने कहा कि यह सभा इस अवसर पर मुसलमानों से अपील करती है कि वह इस्लामी शरीयत पर दृढ़तापूर्वक स्थापित रहें और विशेष रूप से महिला अधिकारों के मामले में इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार पूर्ण न्याय को सुनिश्चित करें. विरासत के बंटवारे में महिलाओं के साथ अन्याय को खत्म करें और तलाक, भरण-पोषण और गुजारा भत्ता जैसे मामलों में शरई सिद्धांतों का पालन करें.

इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश

जमीयत ने कहा कि कि इस समय कुछ शक्तियां इस्लाम की पवित्र धार्मिक शब्दावली, विशेष रूप से जिहाद को बदनाम करने के लिए एक संगठित और दुर्भावनापूर्ण अभियान चला रही हैं. लव जिहाद, लैंड जिहाद और ऐसे उकसाने वाले तथा निराधार नारे फैलाकर न केवल इस्लाम और इस्लामी प्रतीकों का अनादर किया जा रहा है, बल्कि समाज के भीतर एक खतरनाक विभाजन और नफ़रत का वातावरण पैदा किया जा रहा है. यह प्रवृत्ति एक गंभीर अराजकता की सूचक है, जिसकी रोकथाम राष्ट्रीय, धार्मिक और नैतिक-तीनों स्तरों पर आवश्यक है.

यह सभा स्पष्ट रूप से घोषणा करती है कि इस्लाम में जिहाद की अवधारणा मूल रूप से आध्यात्मिक, नैतिक, सुधारावादी और मानवतावादी है. विरोधी तत्वों ने इसकी वास्तविकता को जानबूझकर विकृत करके इसे हिंसा, आक्रामकता और हत्या के समानार्थी के रूप में प्रस्तुत किया है, जबकि सच्चाई यह है कि जिहाद अत्याचार, अन्याय, उत्पीड़न और अशांति के विपरीत शांति, न्याय और मानव सम्मान की पुनर्स्थापना का नाम है.

उन्होंने कहा कि फसाद, अशांति और ख़ून-खराबे का नाम जिहाद नहीं है. यह बैठक इस तथ्य की भी स्पष्ट व्याख्या करती है कि इस्लाम अंतरधार्मिक विवाहों की अनुमति नहीं देता. साथ ही, दुनिया की हर सभ्यता और समाज में अंतरधार्मिक विवाह एक संवेदनशील और जटिल सामाजिक मुद्दा रहे हैं, जो पारिवारिक मतभेद और सामाजिक अस्थिरता का कारण बनते हैं. इसलिए आवश्यक है कि इस मुद्दे को सामाजिक स्तर पर हल किया जाए, और इसके लिए संयुक्त प्रयास ही एक सही मार्ग है. ज़बरदस्ती कानून बनाकर, बेबुनियाद आरोप लगाकर या झूठे प्रचार के माध्यम से किसी जटिल सामाजिक समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता.

यह सभा भारत सरकार से दृढ़तापूर्वक मांग करती है कि नफरत फैलाने वाले और उकसाने वाले शब्दों के ग़लत उपयोग पर तत्काल रोक लगाई जाए विशेष रूप से मीडिया संस्थानों को यह निर्देश दिया जाए कि वे जिहाद जैसे पवित्र धार्मिक शब्दों के उपयोग में अत्यंत संवेदनशीलता, ज़िम्मेदारी और ईमानदारी का परिचय दें तथा सनसनीखेज, नफरत और झूठे प्रचार से पूरी तरह परहेज़ करें.

इसके अलावा उन्होंने कहा कि लव जिहाद जैसे उकसाने वाले और किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने वाले दुष्प्रचारों का संज्ञान ले और ऐसे अभियानों पर प्रभावी रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाए.

मुस्लिम वक्फ की सुरक्षा के उपाय

जमीयत की यह सभा, वक्फ संपत्तियों के खिलाफ साम्प्रदायिक तत्वों और सत्ताधारी पार्टी द्वारा की जा रही साजिशों और छल-कपट के तरीकों की कड़ी निंदा करते हुए यह स्पष्ट करती है कि वक्फ संपत्तियां मुसलमानों द्वारा गरीब और ज़रूरतमंद वर्ग की देखभाल तथा धार्मिक और राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हैं. यह संपत्तियां न तो किसी पूर्व सरकार द्वारा जब्त की गई थीं, न वर्तमान सरकार द्वारा दी गई हैं, और न ही इनका वक्फ की मंशा के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिए शरीयत के अनुसार उपयोग किया जा सकता है.

यह सभा भारत सरकार का ध्यान आकृष्ट कराना चाहती है कि वह भारतीय संविधान की भावना और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के अनुरूप, वक्फ अधिनियम 2025 को उसकी कई मूलभूत कमियों के कारण तत्काल प्रभाव से निरस्त करे. जमीयत ने जेपीसी से बैठक में इस कानून की 28 बड़ी त्रुटियां तर्कसंगत तरीके से प्रस्तुत की थीं, लेकिन सरकार ने मुसलमानों की वास्तविक चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया. इसी प्रकार, वक्फ से संबंधित सुधारों की हमारी लंबे समय से चली आ रही मांगों पर भी ध्यान नहीं दिया गया.

जमीयत ने घोषणा की कि वह इस नए कानून का संवैधानिक, कानूनी और लोकतांत्रिक स्तर पर पूर्ण विरोध करेगी और वक्फ़ की सुरक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी. जहां तक ‘उम्मीद पोर्टल’ पर पंजीकरण का मामला है, जमीयत ने शुरुआत से ही इस प्रणाली पर अपनी आपत्तियां व्यक्त की थीं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पोर्टल पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया, इसलिए वर्तमान कानूनी स्थिति में वक्फ़ बोर्ड और मुतवल्लियों (प्रबंधकों) के लिए अपनी संपत्तियों का पंजीकरण कराना आवश्यक हो गया है, ताकि किसी कानूनी जटिलता या नुकसान से सुरक्षित रहा जा सके.

इन बिंदुओं पर जोर देती है सभा

  • वक्फ के सभी मुतवल्लियों, वक्फ संस्थाओं और पदाधिकारियों से भरपूर अपील है कि वे अपनी वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण समय पर उम्मीद पोर्टल पर पूरा करें, ताकि भविष्य में किसी कानूनी या प्रशासनिक अड़चन का सामना न करना पड़े.
  • भारत सरकार से मांग की जाती है कि पंजीकरण की अंतिम तिथि में कम से कम दो वर्षों की वृद्धि की जाए, ताकि सभी संबंधित संस्थाएं और मुतवल्ली पूरी संतुष्टि के साथ सुचारु रूप से यह कार्य पूरा कर सकें.
  • देश में ऐसी प्राचीन संपत्तियां मौजूद हैं, जिनके सभी दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना व्यावहारिक रूप से कठिन है, इसलिए उम्मीद पोर्टल में दर्ज़ कराने के लिए निर्धारित की गई शर्तों पर पुनर्विचार किया जाए.
  • जो संपत्तियां किसी कारणवश उम्मीद पोर्टल में दर्ज़ नहीं हो सकीं, उन्हें पूर्ववत वक़्फ की संपत्ति ही माना जाए.
  • यह सभा मुसलमानों, धार्मिक संस्थाओं और वक्फ के मुतवल्लियों से अपील करती है कि वह जमीयत और अन्य राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ एकजुट रहें और वक्फ की सुरक्षा व संरक्षण की इस कोशिश को और मजबूत बनाएं. साथ ही, वक्फ पर अनुचित कब्ज़ा करने वाले समूहों के खिलाफ अपने स्तर पर आवाज उठाएं और इस पवित्र अमानत के संरक्षण में हर संभव भूमिका निभाएं.

फिलिस्तीन की मौजूदा परिस्थिति

फिलिस्तीन की मौजूदा परिस्थिति पर जमीयत ने कहा कि यह सभा अमेरिका और अरब देशों द्वारा हाल में किए गए शांति प्रयासों और संवाद की प्रगति पर संज्ञान लेते हुए इस बात पर ज़ोर देती है कि हालांकि शांति की हर कोशिश सराहनीय है, लेकिन वास्तविक और स्थाई शांति तभी संभव है जब फ़िलिस्तीनी जनता को उनके वैध अधिकार प्राप्त हों और उनकी गरिमा तथा आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाले किसी भी कदम से परहेज किया जाए.

यह सभा स्पष्ट रूप से घोषणा करती है कि मध्य-पूर्व में शांति की स्थापना तब तक संभव नहीं जब तक 1967 की सीमाओं के अनुरूप एक स्वतंत्र, एकीकृत और पूर्ण फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना न हो, जिसकी राजधानी अल-क़ुद्स (येरूशलम) हो और मस्जिद-अल-अक़्सा सहित तमाम पवित्र स्थलों की धार्मिक हैसियत, सुरक्षा और संरक्षण की पुख्ता गारंटी न दी जाए.

यह सभा फिलिस्तीनी जनता के धैर्य, दृढ़ संकल्प और अपने वतन की आज़ादी के लिए उनकी लंबी संघर्षशीलता प्रशंसा करती है. फिलिस्तीनियों ने अत्याचार, घेराबंदी और लगातार आक्रमण व नरसंहार जैसी कठिन परिस्थितियों के बावजूद जिस सब्र, हिम्मत और आज़ादी की चाह की मिसाल पेश की है, वह पूरी मानवता के लिए एक जीवंत उदाहरण है.

यह सभा इजराइल द्वारा फ़िलिस्तीनियों के सामूहिक नरसंहार और ग़ाज़ा की विनाशकारी घेराबंदी की कड़ी निंदा करती है और हाल ही में हुए शांति समझौते के उल्लंघन के रूप में जारी हत्याओं के सिलसिले को अत्यंत गंभीर मानती है.

संयुक्त राष्ट्र संघ, इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) से मांग

  • फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना सुनिश्चित करें तथा मस्जिद-अल-अक़्सा और अन्य पवित्र स्थलों की धार्मिकऐतिहासिक हैसियत की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाएं.
  • अवैध यहूदी बस्तियों, भूमि-हड़पने और जबरन विस्थापन के विरुद्ध ठोस एवं व्यावहारिक कार्रवाई करें.
  • अवैध बस्तियों के प्रवासियों द्वारा फिलिस्तीनियों पर होने वाले हिंसक हमलों के विरुद्ध भी मज़बूत कदम उठाएं.
  • युद्ध से प्रभावित फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता, उपचार, शिक्षा और पुनर्वास में तत्काल सहयोग प्रदान करें.
  • प्रबंधन कमेटी की सभा भारत सरकार से भी अपील करती है कि वह अपनी पुरानी विदेश नीति के अनुरूप फिलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार का पूर्ण समर्थन जारी रखे और हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनके न्यायपूर्ण एवं स्थायी समाधान के लिए आवाज उठाए.

असम में निष्कासन और एसआर से संबंधित प्रस्ताव

जमीयत की प्रबंधन कमेटी ने कहा कि असम में पिछले महीनों सरकारी ज़मीन से मुसलमानों को बड़े पैमाने पर किए गए अमानवीय और क्रूर बेदखली अभियान पर गहरी चिंता और कड़े विरोध का इज़हार करती है. इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप 60 हजार से अधिक नागरिक अपने घरों और बस्तियों से बेदखल होकर विभिन्न ज़िलों में शरण लेने पर मजबूर हुए, जहां अधिकांश के पास न तो उपयुक्त आवास है और न ही खेती-बाड़ी के लिए जमीन. अनेक परिवार खुले आसमान के नीचे अत्यधिक दयनीय अवस्था में रहने को मजबूर हैं.

बैठक इस बात पर भी गंभीर चिंता व्यक्त करती है कि 22 नवंबर से जारी एसआर ने प्रभावितों की कठिनाइयों में और इजाफा कर दिया है. न तो बीएलओ उनके मूल इलाक़ों में मतदाता सूची में नाम शामिल करने को तैयार हैं और न ही अस्थायी आश्रयों में, जहां आवास प्रमाण न होने का बहाना बनाकर आवेदनों को खारिज किया जा रहा है. बैठक स्पष्ट चेतावनी देती है कि यदि यही स्थिति जारी रही, तो हजारों परिवारों के मतदाता सूची से बाहर होने और भविष्य में उनकी नागरिकता तक प्रभावित होने का गम्भीर खतरा पैदा हो जाएगा, जो संवैधानिक सिद्धांतों की खुली अवहेलना और बुनियादी मानवाधिकारों व लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर हमला है.

जमीयत की प्रबंधन कमेटी का प्रस्ताव

  • असम में अमानवीय और गैर-क़ानूनी निष्कासन की प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए और सभी प्रभावित परिवारों का पुनर्वास किया जाए.
  • केंद्र और राज्य सरकारें त्वरित रूप से एक स्पष्ट, लिखित और व्यापक मार्गदर्शिका जारी करें, जिससे बेघर व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में दर्ज करने की प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके.
  • चुनाव आयोग तत्काल विशेष निर्देश जारी करे कि बेदखली के शिकार व्यक्तियों को अस्थायी अथवा विशेष आवास प्रमाण प्रस्तुत करने पर मतदाता सूची में शामिल किया जाए.
  • प्रभावित क्षेत्रों में विशेष शिविर लगाए जाएं.
  • भारत सरकार और असम सरकार इस मानवीय संकट को केवल प्रशासनिक कार्यवाही न समझें, बल्कि इसे एक संवेदनशील मानवाधिकार संबंधी मुद्दा मानते हुए सभी बेघर परिवारों के त्वरित पुनर्वास और राहत को सुनिश्चित करें.

इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश, जमीयत की बैठक में बोले मौलाना महमूद मदनी

[ad_2]


देश दुनियां की खबरें पाने के लिए ग्रुप से जुड़ें,

[ad_1]

#INA #INA_NEWS #INANEWSAGENCY
Copyright Disclaimer :-Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
Credit By :-This post was first published on https://www.tv9hindi.com/, we have published it via RSS feed courtesy of Source link,

Back to top button