Nation- चंदर सिंह उर्फ सुराजी बाबू… एक भूले-बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की मार्मिक कहानी- #NA

देवरिया के रहने वाले थे चंदर सिंह उर्फ सुराजी बाबू.
1942 का साल, जब भारत की धरती पर आजादी की ललकार गूंज रही थी. महात्मा गांधी के “करो या मरो” के नारे ने देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता की आग भड़का दी थी. पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में अहिरौली बघेल गांव के एक साधारण किसान चंदर सिंह, जिन्हें लोग प्यार से सुराजी बाबू कहते थे, ने इस आंदोलन को अपने खून-पसीने से सींचा, लेकिन आज आजादी के 75 साल बाद, उनकी वीरता और बलिदान की कहानी सरकारी उपेक्षाओं के साये में खो सी गई है.
एक नन्हा सा गांव और क्रांति की चिंगारी चंदर सिंह का जन्म अहिरौली बघेल के एक साधारण परिवार में हुआ था. 1930 में जब जवाहरलाल नेहरू देवरिया आए और युवाओं में आजादी का जोश भरा तो चंदर सिंह के दिल में भी स्वतंत्रता की ललक जाग उठी. 1942 में जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो चंदर सिंह ने अपने गांव और आसपास के लोगों को एकजुट कर अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजा दिया.
रतसिया कोठी, जो अंग्रेजों का आर्थिक वर्चस्व का प्रतीक थी, चंदर सिंह और उनके साथियों का निशाना बनी. इस कोठी में अंग्रेजों ने नील, कपास, जूट और अफीम की खेती के लिए 2400 एकड़ का फार्महाउस बनाया था. यह कोठी न केवल आर्थिक शोषण का केंद्र थी, बल्कि अंग्रेजी अत्याचारों का गढ़ भी थी. चंदर सिंह ने हजारों लोगों को साथ लेकर कोठी पर हमला बोला. कोठी को आग के हवाले कर दिया गया और वहां रखा अनाज और सामान लूट लिया गया. इस घटना ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया.
रतसिया कोठी पर हमले के दौरान क्रांतिकारियों की भीड़ अंग्रेज प्रबंधक बर्कले के परिवार को भी आग में झोंकने पर उतारू थी. बर्कले की दो बेटियां उस आवास में थीं, लेकिन चंदर सिंह ने अपनी मानवता का परिचय दिया. उन्होंने भीड़ को रोका और बर्कले की बेटियों की जान बचाई. यह उनकी वीरता के साथ-साथ उनके नैतिक मूल्यों का भी प्रमाण था.
अंग्रेजों का प्रतिशोध और परिवार की पीड़ा
रतसिया कोठी कांड ने अंग्रेजों को बौखला दिया. उन्होंने चंदर सिंह के घर पर दो बार हमला किया और उसे आग के हवाले कर दिया. पहली बार घर जलाने के बाद भी जब उनकी हिम्मत नहीं टूटी तो अंग्रेजों ने मुनादी कराकर दूसरी बार उनका घर फूंका, ताकि क्षेत्र में दहशत फैले. चंदर सिंह को पकड़ने के लिए अंग्रेज पुलिस ने छापेमारी शुरू की. मजबूरन उन्हें खलीलाबाद में साधु का वेश धारण कर फरारी की जिंदगी जीनी पड़ी. इस दौरान उनके परिवार को अकल्पनीय कष्ट झेलने पड़े.
उनकी पत्नी मतुस्ना देवी अपनी दो मासूम बेटियों, राधिका और सुखना के साथ मक्के के खेतों में छिपकर रातें गुजारती थीं. गांव में कोई उनकी मदद को तैयार नहीं था, क्योंकि अंग्रेजों का खौफ हर तरफ था. तीन महीने बाद मुखबिरी के चलते चंदर सिंह को चनहर गांव से गिरफ्तार कर लिया गया. उनके खिलाफ गंभीर आरोपों में मुकदमा चला. सभी को लगता था कि उन्हें फांसी हो जाएगी, लेकिन बर्कले की बेटियों ने कोर्ट में उनकी मानवता की गवाही दी. इस गवाही ने उनकी फांसी टाल दी और उन्हें 25 साल की सजा सुनाई गई.
चंदर सिंह के जेल जाने के बाद उनकी पत्नी मतुस्ना देवी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कोई सहारा देने को तैयार नहीं था. वह अपनी बेटियों को लेकर सिवान जिले के मायके गईं, लेकिन वहां भी उन्हें लंबे समय तक आश्रय नहीं मिला. लौटकर उन्होंने झोपड़ी बनाकर गुजर-बसर की. देश आजाद होने तक वह झोपड़ी में ही रहीं और अपनी बेटियों का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से किया. उनकी सबसे छोटी बेटी मुद्रिका सिंह बताती हैं कि गांव वाले उनके पिता की वीरता की कहानियां सुनाते थे, लेकिन उस समय परिवार की हालत इतनी दयनीय थी कि कोई मदद को आगे नहीं आया.
रिहाई और सम्मान
1945-46 में अंतरिम सरकार के गठन के बाद जवाहरलाल नेहरू के प्रयास से चंदर सिंह जेल से रिहा हुए. उनकी रिहाई पर बनकटा स्टेशन पर जनता का हुजूम उमड़ पड़ा. उनकी बेटी मुद्रिका ने पहली बार अपने पिता को देखा और चंदर सिंह की आंखें खुशी से छलक उठीं. विजय लक्ष्मी पंडित भी उनसे मिलने अहिरौली आईं और उन्हें सम्मान के साथ कुछ मदद दी. आजादी के बाद सरकार ने उनकी वीरता को देखते हुए नैनीताल में 40 एकड़ जमीन दी, लेकिन चंदर सिंह ने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर उसे दान कर दिया.
1972 में इंदिरा गांधी ने उन्हें स्वराज भवन में ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया, लेकिन 1974 में यह वीर स्वतंत्रता सेनानी दुनिया से विदा हो गया. सरकारी उपेक्षा का दंश चंदर सिंह की कहानी वीरता और बलिदान की मिसाल है, लेकिन यह दुखद है कि आजादी के 75 साल बाद भी उनके गांव में उनकी एक प्रतिमा या स्मारक तक नहीं है. उनके पौत्र संजय सिंह कहते हैं, “हमारे नाना ने अंग्रेजों को खुली चुनौती दी, अपने घर को दो बार जलते देखा, परिवार को कष्ट में देखा, फिर भी हार नहीं मानी, लेकिन आज सरकार और जनप्रतिनिधियों ने उन्हें भुला दिया.”
हाल ही में उनके गांव के ग्राम प्रधान और लोगों ने उनकी प्रतिमा लगाने का निर्णय लिया है, ताकि नई पीढ़ी उनके बलिदान को जान सके. एक प्रेरणा जो आज भी जीवित है चंदर सिंह उर्फ सुराजी बाबू की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम नायकों की कहानी है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया. उनकी मानवता, साहस और जुझारूपन आज भी प्रेरणा देता है, लेकिन यह सवाल आज भी कचोटता है कि आखिर क्यों ऐसे नायकों को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे? क्या सरकार और समाज का यह दायित्व नहीं कि इन भूले-बिसरे सेनानियों को उनकी सही जगह दी जाए? सुराजी बाबू की कहानी हमें यह सिखाती है कि आजादी की कीमत सिर्फ खून और पसीने से नहीं, बल्कि गुमनामी के दर्द से भी चुकाई जाती है.
चंदर सिंह उर्फ सुराजी बाबू… एक भूले-बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की मार्मिक कहानी
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