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Dussehra 2025: यहां दशहरा के दिन होती है रावण की पूजा, साल में सिर्फ एक दिन खुलता है मंदिर; जानें क्या हैं मान्यताएं

कानपुर के दशानन मंदिर में दशहरे के दिन होती रावण की पूजा

एक तरफ जहां पूरा देश दशहरे के दिन रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाता है. वहीं, दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक अनूठी परंपरा पनपती है. यहां शिवाला क्षेत्र में स्थित दशानन मंदिर में भक्त रावण की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. यह मंदिर, जो साल में केवल एक बार विजयादशमी के दिन खुलता है, रावण को शक्ति के प्रतीक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में पूजने की अनोखी परंपरा का गवाह है.

कानपुर के शिवाला क्षेत्र में कैलाश मंदिर परिसर में स्थित दशानन मंदिर का निर्माण करीब 200 साल पहले महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने करवाया था. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रावण न केवल एक प्रकांड पंडित और विद्वान था, बल्कि भगवान शिव का परम भक्त भी था. यही कारण है कि उसे शक्ति के प्रहरी के रूप में इस मंदिर में स्थापित किया गया. यहां मां छिन्नमस्तिका का मंदिर भी है, जिसका निर्माण लगभग 206 साल पहले संवत 1868 में तत्कालीन राजा ने करवाया था.

रावण को मिला था वरदान

बताया जाता है कि मां छिन्नमस्तिका ने रावण को वरदान दिया था कि उनकी पूजा तभी पूर्ण होगी, जब भक्त रावण की भी आराधना करेंगे. इस वरदान के चलते मां छिन्नमस्तिका के साथ-साथ रावण की पूजा की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी निर्बाध रूप से जारी है. विजयादशमी के दिन सुबह आठ बजे दशानन मंदिर के कपाट भक्तों के लिए खोले जाते हैं. इस दिन मंदिर में विशेष तैयारियां की जाती हैं. रावण की लगभग पांच फुट ऊंची मूर्ति का साज-श्रृंगार किया जाता है.

मूर्ति को फूलों, वस्त्रों और आभूषणों से सजाया जाता है. इसके बाद मंदिर में मां छिन्नमस्तिका और रावण की विशेष पूजा-अर्चना शुरू होती है. भक्त सरसों के तेल के दीपक जलाते हैं और पीले फूल चढ़ाकर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं. पूजा के बाद रावण की भव्य आरती की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. मंदिर परिसर में भक्ति और श्रद्धा का अनोखा माहौल देखने को मिलता है.

साल में एक बार खुलता दशानन मंदिर

शाम को एक विशेष समारोह के साथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, जो अगले साल विजयदशमी के दिन ही दोबारा खोले जाएंगे. इस प्रकार, यह मंदिर साल में केवल एक दिन के लिए भक्तों के दर्शन और पूजा के लिए उपलब्ध रहता है. इस अनूठी परंपरा ने दशानन मंदिर को देश भर में प्रसिद्धि दिलाई है. रावण को आमतौर पर रामायण में खलनायक के रूप में देखा जाता है, लेकिन कानपुर के इस मंदिर में उसे शक्ति, विद्या और भक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है.

जानें क्या हैं मान्यताएं

स्थानीय लोगों का मानना है कि रावण एक महान विद्वान, संगीतज्ञ और शिव भक्त था. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव और मां छिन्नमस्तिका ने उसे कई वरदान दिए थे. मंदिर में रावण की पूजा करने को लेकर मान्यता है कि इससे भक्तों के ग्रह-नक्षत्रों के दोष दूर होते हैं और उनके जीवन में सुख-समृद्धि आती है. खासतौर पर सरसों के तेल के दीपक और पीले फूल चढ़ाने की परंपरा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.

दशानन मंदिर

भक्तों का विश्वास है कि इनके द्वारा की गई पूजा से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. दशानन मंदिर की यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अनूठी है. यह मंदिर भारतीय संस्कृति की उस विशेषता को दर्शाता है, जहां एक ही पात्र को अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग रूपों में देखा जाता है. एक तरफ देश के अधिकांश हिस्सों में रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है, वहीं इस मंदिर में उसे शक्ति और भक्ति का प्रतीक मानकर पूजा जाता है.

बड़ी संख्या में पहुंचे भक्त

यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि किसी भी व्यक्ति के चरित्र को एकांगी दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए. रावण के विद्वान और भक्त पक्ष को सम्मान देने की यह परंपरा समाज में सहिष्णुता और विविधता के महत्व को रेखांकित करती है. विजयादशमी के दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि दूर-दराज से आए श्रद्धालु भी रावण की पूजा में हिस्सा लेते हैं.

मंदिर का प्रबंधन स्थानीय समिति की तरफ से किया जाता है, जो पूजा की तैयारियों और व्यवस्था को सुनिश्चित करती है. मंदिर परिसर को साफ-सुथरा रखा जाता है और भक्तों की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं. मंदिर के पुजारी और प्रबंधक इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि पूजा की सभी परंपराएं विधि-विधान से पूरी हों. कानपुर का दशानन मंदिर और इसकी विजयादशमी की पूजा यह सिखाती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं समय के साथ बदलती हैं. यह मंदिर न केवल रावण की पूजा का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता और समावेशिता का प्रतीक भी है.

Dussehra 2025: यहां दशहरा के दिन होती है रावण की पूजा, साल में सिर्फ एक दिन खुलता है मंदिर; जानें क्या हैं मान्यताएं

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