Nation- Go Back Marwari…तेलंगाना में विरोध के बीच जानें कितना समृद्ध है मारवाड़ी समाज और कितनी है हिस्सेदारी- #NA

मारवाड़ी समाज.Image Credit source: Getty Images
तेलंगाना में मारवाड़ी समाज के खिलाफ उठी आग की लपटें अब आंध्र प्रदेश तक पहुंच चुकी हैं. दोनों ही राज्यों में मारवाड़ी गो बैक के नारे लग रहे हैं. बीते 22 अगस्त को सम्पूर्ण तेलंगाना बंद का आयोजन स्थानीय व्यापारियों ने किया था. यह विरोध क्या रुख लेगा, यह भविष्य तय करेगा. सरकारें इस मामले को किस तरीके से हैंडल करती हैं, यह भी देखने वाली बात होगी. क्योंकि मारवाड़ी समाज देश के विकास में अहम योगदान हैं. देश भर में इस समाज के लोगों ने धर्मशालाएं बनाई हैं. मंदिर बनाए हैं. स्कूल-कॉलेज खोले हैं.
आइए, इस विरोध के बहाने जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर मारवाड़ी समाज की जड़ें कहां हैं? ये नाम कहां से आया? कितने राज्यों में रहते हैं इस समाज के लोग? कैसे ये मालामाल होते गए? कैसे अब इनकी पहुंच दुनिया के कोने-कोने तक हो गई है?
कहां से आया मारवाड़ी शब्द?
मारवाड़ी शब्द का सामान्य अर्थ उस समुदाय, भाषा और व्यावसायिक समूह से जोड़ा जाता है जो राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र से आता है. ऐतिहासिक रूप से भौगोलिक पहचान बताने के लिए ही इस शब्द का प्रयोग हुआ, यानी मारवाड़ के निवासी. लेकिन समय के साथ यह एक सामाजिक-आर्थिक पहचान बनता गया. आज आम बोलचाल में मारवाड़ी उन व्यापारियों और उद्यमियों के लिए भी प्रयुक्त होता है जिनकी सांस्कृतिक और परिवारिक जड़ें राजस्थान के उत्तर पश्चिमी भागों में हों, गुजरात में हों. खासकर वे जो प्रमुख रूप से व्यापार वित्त में सक्रिय रहे हैं. यहां के लोगों ने ऐतिहासिक रूप से व्यापार, धन-संग्रह और लंबी दूरी तक जाकर भी व्यापार किया. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि राजस्थान में पहले रेत ही रेत था. इस राज्य को रेगिस्तान के रूप में आज भी पहचाना जाता है, जबकि आज बहुत कुछ बदल चुका है.
कुछ यूं हुआ मारवाड़ी सामाज का विकास और विस्तार
18वीं-19वीं शताब्दी में भारत अनेक परिवर्तनों से गुजर रहा था. अंग्रेजों के प्रभाव के साथ ही छोटी-छोटी रियासतें बड़ी संख्या में देश में मौजूद थीं. अंग्रेजों का आर्थिक प्रभुत्व, नई व्यापारिक मंडियां और औद्योगिक परिवर्तन के कारण मारवाड़ी व्यापारियों ने अपने घर क्षेत्र से बाहर जाकर बड़े व्यापारिक केन्द्रों में प्रवेश करना शुरू किया.
कोलकाता ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य केंद्र बना तो यहां मारवाड़ी जूट, कोयला, बैंकिंग और मार्जिन व्यापार में मारवाड़ी समुदाय के लोग आकर सक्रिय हुए. इस समुदाय ने जल्द ही बड़े वित्तीय और औद्योगिक घरानों का निर्माण किया. एक प्रमुख व्यापारिक घराना है बिड़ला. इस समूह के संस्थापक घनश्याम दास बिड़ला राजस्थान से ही कलकत्ता गए और फिर वहीं से देश भर में विस्तार की नींव रखी. आज बिरला समूह पूरे देश-विदेश में अग्रणी भूमिका निभा रहा है.
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मुंबई में समुद्री व्यापार, निर्माण एवं व्यापार के अन्य अवसरों ने मारवाड़ी समुदाय को आकर्षित किया. पटना, लखनऊ, बनारस, आगरा, रायपुर, भोपाल आदि शहरों में इन्होंने अपने पैर पसारे. बंगाल के चाय बगानों, दक्षिण भारत के व्यापारिक केन्द्रों में भी मारवाड़ी समुदाय ने अपना विस्तार किया. अपनी जड़ों को छोड़ने के पीछे मुख्य कारण थे व्यापार के अवसर कम होना और देश के दूसरे हिस्सों में यही अवसर पर्याप्त संख्या में होना. इस समुदाय के लोग बेहद लगनशील होते हैं. धैर्य-पूर्वक व्यापार करते हुए जोखिम उठाकर नए बाजारों में जमे रहने को तैयार दिखते हैं.
भारत के कितने राज्यों में मारवाड़ी मौजूद हैं?
मारवाड़ी समुदाय की जड़ें भले ही राजस्थान में हैं लेकिन अब लगभग पूरे देश में मौजूद है. कोलकाता, मुंबई, दिल्ली समेत देश का शायद ही कोई बड़ा शहर होगा, जहां मारवाड़ी समुदाय के लोग न मिलते हों. वे न केवल मौजूद हैं बल्कि अपने व्यापार के बूते देश के विकास में योगदान भी कर रहे हैं. भारत में इंटरनेशनल वैश्य फेडरेशन के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ नीरज बोरा कहते हैं कि मारवाड़ी समुदाय का विरोध अब बेमानी है. इस समाज ने राज्यों और देश की जीडीपी में अपना बड़ा योगदान दिया है. देश भर में मंदिर, धर्मशालाएं बनाकर समाज की मदद की है. अस्पताल, स्कूल, कॉलेज भी इस समाज के लोगों ने बड़े पैमाने पर बनाकर देश को सौंपे हैं. आज देश का कोई कोना ऐसा नहीं है, जहां इस समुदाय का योगदान न दिखाई देता हो, चाहे दक्षिण भारत हो या उत्तर, पूर्व हो या पश्चिम. पूरे देश में मौजूदगी है और पूरे देश के विकास में योगदान भी है. अब तो यह समुदाय विदेशों में भी अपना झंडा ऊंचा किए हुए है.
मारवाड़ी कैसे हुए मालामाल हुए?
मारवाड़ी समुदाय की आर्थिक सफलता का कोई एक कारण नहीं है. कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से ये व्यापार में न केवल सफल हैं बल्कि इनके पास पर्याप्त धन भी है. कुछ प्रमुख वजहें यह रहीं.
- मारवाड़ी परिवार परंपरागत रूप से संयुक्त परिवार व्यवस्था में रहते आए हैं. इस व्यवस्था ने पूंजी एकत्र करने, जोखिम साझा करने और व्यापार विस्तार के लिए वित्त उपलब्ध कराने में मदद की.
- मारवाड़ी व्यापारियों के बीच मजबूत आपसी भरोसा और नेटवर्क है. रिश्तों और गुटों पर आधारित व्यवसायिक सहयोग कायम है. इस भरोसे ने क्रेडिट देने और स्वीकार करने में आसानी पैदा की और सबका साथ-सबका विकास का फार्मूला कारगर होता रहा है.
- इस समुदाय ने पारंपरिक क्रेडिट टूल अपनाकर अपना और अपनों का विकास किया. हण्डी जैसा प्रयोग उन्हें दूरस्थ व्यापार और भुगतान व्यवस्था में सक्षम बनाता रहा. यह व्यवस्था बैंकिंग के शुरुआती रूपों में से एक मानी जा सकती है.
- इस समुदाय के लोग नए बाजारों में जल्दी जाकर स्थापित हो गए. चाहे वह कोलकाता का जूट हो या मुंबई की जलमार्ग-व्यवस्था. स्थानान्तरित होना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार व्यवसाय ढालना उनकी खासियत रही. यह समुदाय जोखिम भी खूब लेता हुआ देखा जाता है.
- मारवाड़ी समुदाय ने कृषि उत्पादों, वस्त्र, जूट, कोयला, सूखा-फल, चाय, बैंकिंग में तो सक्रिय ही थे, कालांतर में औद्योगिक निवेश भी खूब किए. इस वजह से इन्हें अगर किसी क्षेत्र में घाटा हुआ तो दूसरे में फायदा जमकर हुआ. ऐसे में जोखिम लेने की क्षमता बढ़ती गई.
- 19वीं—20वीं शताब्दी में कुछ मारवाड़ी परिवारों ने आधुनिक शिक्षा और प्रबंधन अपनाया, जिससे बड़े औद्योगिक घरानों की स्थापना हुई. तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय ज्ञान ने उद्योगीकरण को सम्भव बनाया.
- कई मारवाड़ी समुदाय हिन्दू बनिया और जैन समूहों से आते हैं, जहां व्यापार और कटौती बचत पर पारिवारिक परंपराएं प्रबल रहीं. सीमित खर्च, बचत आदत और चैरिटी/धर्मार्थ संस्थाएं भी पूंजी संचय में सहायक रहीं.
- ब्रिटिश शासन के दौरान नई अर्थव्यवस्था, कृषि रेंट संबंध और औद्योगिक अवसरों ने मध्यस्थ व्यापारियों-फाइनेंसरों को लाभ पहुंचाया. मारवाड़ी समुदाय ने इस अवसर का लाभ भी उठाने को आगे आया.
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जब विकास में इनका योगदान तो क्यों होता है विरोध?
- ताज़ा समय में कुछ राज्यों में स्थानीय राजनीति या आर्थिक दबाव के चलते आउट-साइडर व्यापारियों के खिलाफ नाराजगी दिखाई देती है. केवल तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ही नहीं, अन्य इलाकों से भी यदा-कदा इस तरह के विरोध उठते रहे हैं. मौजूद विरोध भी शांत हो जाएगा. अब इस समुदाय को इग्नोर करना किसी भी राज्य के बस की बात नहीं है. फिर भी जिन वजहों से विरोध होते हैं, उनमें से कुछ ये रहे.
- जब कोई छोटा समूह किसी क्षेत्र में आर्थिक रूप से बहुत प्रभावशाली दिखता है, तो बेरोजगारी या आर्थिक असंतोष का आरोप आउट-साइडर लोगों पर लगाया जाता है, जिसका कोई ठोस आधार नहीं है. ऐसे किसी भी व्यापारिक समूह ने स्थानीय लोगों को ही रोजगार के अवसर दिए हैं.
- कई बार स्थानीय राजनैतिक एजेंडा साधने के चक्कर में कुछ अराजक तत्व इस तरह के विरोध को आगे लेकर जाते हैं.
- छोटे स्थानीय विक्रेता या युवा उद्यमी यह महसूस कर सकते हैं कि बड़े बाहरी व्यापारियों से प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं है. ऐसे में वे विरोध की नीति पर अमल करते हुए देखे जाते हैं.
कुल मिलाकर आज मारवाड़ी समुदाय किसी एक अर्थ में केवल एक जाति या व्यवसायिक समूह नहीं हैं. अब यह एक ऐतिहासिक, भौगोलिक और आर्थिक पहचान है जिसने सैकड़ों वर्षों में व्यापार वित्त के कई पहलुओं को आकार दिया. मारवाड़ी समुदाय की सफलता का आधार उनके नेटवर्क, पारिवारिक व्यवस्था, वित्तीय समझ और जोखिम उठाने की क्षमता रही है. उनकी उपस्थिति भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक राज्यों में है. राजस्थान से निकलकर कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र/तेलंगाना और कई अन्य राज्यों तक फैली हुई है. ये जहां हैं, वहीं के होकर रह गए हैं. जहां उनकी आर्थिक ताकत को सराहा जाता है, वहीं कभी कभी स्थानीय राजनीतिक-आर्थिक तनावों के कारण विरोध भी उभर जाता है.
Go Back Marwari…तेलंगाना में विरोध के बीच जानें कितना समृद्ध है मारवाड़ी समाज और कितनी है हिस्सेदारी
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