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हिंदी से नफरत या मराठी का प्यार! उद्धव-राज को कौन लाया साथ, 5 पॉइंट में समझें सियासी मायने

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर आएंगे नजर

महाराष्ट्र में हिंदी विरोध से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन ने सियासी रंग लेना शुरू कर दिया है. विपक्षी पार्टियों के विरोध के बाद फडणवीस सरकार को हिंदी की अनिवार्यता का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा, लेकिन मराठी को लेकर उठे विवाद ने बालासाहेब ठाकरे परिवार को एक साथ और एक मंच तक ले आया है. हिंदी की अनिवार्यता संबंधी सरकारी प्रस्ताव के वापस लिए जाने के बाद शनिवार को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) द्वारा संयुक्त रूप से मराठी विजय रैली का आयोजन किया जाएगा.

इस रैली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि करीब 20 साल बाद ठाकरे परिवार के दोनों चचेरे भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक ही सियासी मंच पर नजर आएंगे. यह पहली बार है जब शिवसेना (UBT) और मनसे किसी संवेदनशील मुद्दे पर एकजुट हुए हैं और इसे न सिर्फ मराठी अस्मिता की एकजुटता का प्रतीक माना जा रहा है, बल्कि मुंबई महानगरपालिका सहित अन्य स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए संभावित गठबंधन की भूमिका भी मानी जा रही है.

आइए जानें, ठाकरे बंधुओं की एकजुटता के पीछे के संभावित कारण क्या हैं और महाराष्ट्र की राजनीति में इनके क्या सियासी मायने हैं?

  1. मराठी अस्मिता और हिंदी विरोध: लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की बढ़त के बावजूद विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (एसपी) सहित महाअघाड़ी को मुंह की खानी पड़ी थी और बीजेपी के नेतृत्व में देवेंद्र फडणवीस की सरकार बनी थी. इस सरकार में शिवसेना के एकनाथ शिंदे और एनसीपी के अजित पवार शामिल हैं. राज्य में महायुति की सरकार बनने के बाद पहली बार हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाने के फैसले को मराठी पहचान से जोड़कर विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर हमला बोला और सरकार को अपना फैसला वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया. महायुति सरकार पूरी तरह से इस मसले से बैकफुट पर है, क्योंकि यह मराठी अस्मिता का मसला है.
  2. कठघरे में महायुति सरकार: ठाकरे बंधु इसे भाषाई आपातकाल बताते हुए राज्य की महायुति सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. जब से सरकार की ओर से यह आदेश जारी किया गया था. उद्धव ठाकरे ने इसे लेकर फडणवीस सरकार पर हमला बोलना शुरू कर दिया था और इस मुद्दे पर राज ठाकरे भी उनके साथ आ गए थे. पांच जुलाई को महामोर्चा निकालने का आह्वान किया था, लेकिन प्रस्ताव वापस लेने पर अब शनिवार को विजय जुलूस निकाला जाएगा. इस जुलूस से एनडीए सरकार पर हमला बोला जाएगा और मतदाताओं को संगठित करने की कोशिश की जाएगी.
  3. निकाय चुनाव पर नजर: 2017 के मुंबई महानगरपालिका चुनाव में शिवसेना (UBT) ने 84 सीटें जीती थीं और उसका अच्छा खासा प्रभाव था, लेकिन एकनाथ शिंदे की बगावत और भाजपा के साथ गठजोड़ के बाद उसकी स्थिति कमजोर हुई है. वहीं मनसे को सिर्फ 7 पार्षद मिले थे और अब उसकी पकड़ लगभग खत्म हो चुकी है. निकाय चुनावों से पहले यह रैली संभावित गठबंधन की भूमिका भी तय कर सकती है. इस रैली से विपक्ष न केवल फडणवीस सरकार पर हमला बोलेगा, बल्कि आपसी एकता भी संदेश देगा. विधानसभा चुनाव के बाद फिर से अपनी जमीन वापसी की कोशिश में लगे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के लिए अपनी ताकत बढ़ाने का यह अवसर माना जा रहा है.
  4. बाल ठाकरे की विरासत पर दांव: यह रैली बाल ठाकरे की विचारधारा और मराठी गौरव को दोबारा प्रकट करने की कोशिश होगी. रैली से पहले उद्धव ठाकरे की पार्टी की ओर से पोस्टर जारी किये गये थे. उस पोस्टर में बाल ठाकरे के साथ उद्धव और राज ठाकरे की तस्वीर थी. महाराष्ट्र की सियासत में बालसाहेब ठाकरे के आदर्श और विरासत को लेकर लड़ाई होती रही है. अभी तक दोनों भाई अलग-अलग थे, लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि हिंदी विरोध ने ठाकरे परिवार को एकजुट करने का काम किया है.
  5. बीजेपी के खिलाफ मजबूत मोर्चा बनाने की तैयारी: उद्धव ठाकरे 6 जुलाई और राज ठाकरे 7 जुलाई को अलग-अलग रैली निकालने वाले थे, लेकिन भाषा प्रस्ताव वापस लेने के बाद दोनों नेताओं ने एकजुट होकर 5 जुलाई को संयुक्त रैली करने का निर्णय लिया. यह फैसला ना सिर्फ मराठी जनभावना के दबाव का नतीजा था, बल्कि राजनीतिक समीकरणों और 2025 के निकाय चुनावों की रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ठाकरे भाइयों की यह एकजुटता मराठी वोटों का ध्रुवीकरण कर सकती है और बीजेपी-शिंदे गठबंधन के खिलाफ मजबूत मोर्चा खड़ा कर सकती है.

ठाकरे परिवार में दरार से मेल-मिलाप तक

राज ठाकरे ने 2005 में शिवसेना से इस्तीफा दिया था और 2006 में मनसे की स्थापना की थी. वह इस बात से नाराज थे कि बाल ठाकरे ने उत्तराधिकारी के रूप में उद्धव ठाकरे को चुना. राज का रुख अधिक आक्रामक और मराठी-हिंदुत्व आधारित था, जबकि उद्धव का रवैया संयमित और समन्वयकारी था.

2009 के चुनावों में, MNS ने 13 सीटें जीतकर शिवसेना को भारी नुकसान पहुंचाया था, जिससे दोनों भाइयों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और भी तेज हो गई थी.

हालांकि हाल के वर्षों में दोनों भाइयों के बीच व्यक्तिगत संबंधों में नरमी आई है. 2025 की शुरुआत में एक पारिवारिक विवाह समारोह में दोनों की मुलाकात के बाद से ही सुलह की अटकलें तेज हो गई थीं, जिसकी परिणति अब राजनीतिक मंच पर साथ आने के साथ होगी.

भाषा विवाद पर फडणवीस सरकार का यूटर्न

महाराष्ट्र सरकार ने 17 अप्रैल 2025 को राज्य के मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा के रूप में लागू करने का आदेश दिया था. यह फैसला नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत लिया गया था और 29 जून को इसकी अंतिम स्वीकृति भी दे दी गई थी.

हालांकि इस निर्णय के खिलाफ शिवसेना (UBT) और मनसे समेत अन्य मराठी संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था. विरोध को देखते हुए सरकार ने अपडेटेड गाइडलाइंस जारी कीं, जिसमें छात्रों को तीसरी भाषा के रूप में हिंदी के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा चुनने की छूट दी गई, बशर्ते कि कम से कम 20 छात्र एक ही कक्षा में उस भाषा को चुनें.

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