Nation- लैम्बोर्गिनी, मर्सिडीज नहीं हमें नाव चाहिए, पंजाब में अचानक बढ़ी ‘बोट’ की डिमांड; फैक्ट्रियों में दिन-रात हो रहा काम- #NA

पंजाब में बाढ़ से हालात बिगड़ने और लोगों को सुरक्षित निकालने के बाद नांव और मोटर बोट की मांग बढ़ गई. मांग बढ़ने के बाद मोटर बोट और नाव बनाने वाली फैक्ट्रीयों में दिन-रात काम किया जा रहा है. सामाजिक संगठन, समाजसेवी, एनजीओ और विदेशों में बैठे एनआरआई अपने गांवों तक नाव के जरिए मदद पहुंचाने के लिए नावों और मोटर बोट के ऑर्डर दे रहे हैं. पंजाब सरकार के द्वारा भी नावों के ऑर्डर दिए जा रहे हैं, और पुरानी नावों की मेंटिनेंस कराई जा रही है.

राज्य में बाढ़ की वजह से नावों की मांग में भारी उछाल आया है. फैक्ट्रियों में मजदूर दिन-रात मोटर बोट और नाव बनाने में लगे हुए हैं. 1988 की बाढ़ में भी इतनी मांग नहीं थी, जितनी कि अब देखी जा रही है. कई समाजसेवी लोग विदेश में बैठे अपने एनआरआई रिश्तेदारों और भाइयों की मदद से लगातार नावें खरीद रहे हैं. ताकि वो पानी में डूब चुके और टापू में तब्दील हो चुके गांवों में रह रहे लोगों तक राशन- पशुओं का चारा और दूसरी जरूरी मदद और दवाइयां पहुंचा सके.

क्या बोले नाव बनाने वाले लोग?

फाजिल्का में आई बाढ़ में डूब चुके गांवों तक मदद पहुंचाने के लिए नाव खरीद रहे हैं. रोपड़ में बिशन सिंह एंड संस की फैक्ट्री में मजदूर दिन-रात मोटर बोट बनाने में लगे हुए हैं. 1966 से नाव व्यवसाय से जुड़े 78 वर्षीय मोहन सिंह और उनके बेटे चरणजीत सिंह का कहना है कि 1988 की बाढ़ के दौरान भी इतनी मांग नहीं देखी गई थी. उन्हें रोजाना लगभग 150 फोन कॉल्स आ रहे हैं. इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उन्होंने अतिरिक्त मजदूरों को भी काम पर रखा है.

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एक नाव की कितनी है कीमत?

मोहन सिंह के बेटे चरणजीत सिंह के मुताबिक, नावें और लाइफ जैकेट बहुत तेजी से बेच रहे हैं. मानवीय संकट को देखते हुए कीमतों में कुछ छूट भी दे रहे हैं, ताकि जरूरतमंद लोगों को मना ना करना पड़े. यहां नावों की कीमत 85,000 रुपये से लेकर 1.8 लाख रुपये तक है और लाइफ जैकेट लगभग 1,000 रुपये में उपलब्ध है. हालांकि नाव पर ज्यादा खर्चा मोटर लगाने का है. ताकि पानी में तेज गति से मोटर बोट का इस्तेमाल किया जा सके और उसके लिए मोटर की हॉर्स पावर के मुताबिक ही खर्च करना पड़ता है.

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मोहन सिंह और उनके बेटे चरणजीत सिंह के मुताबिक, जिस दाम पर वो पहले मोटर बोट और नाव बेच रहे थे अभी भी उसी दाम पर बेच रहे हैं. उनकी कोशिश है कि नो प्रॉफिट नो लॉस पर इस बाढ़ के मुश्किल वक्त में वो भी पंजाब के साथ खड़े हो सके.

डिमांड बढ़ने से दिन रात हो रहा काम

उनके मुताबिक विदेश में बैठे एनआरआई अपने गांवों और अपने जिलों में मदद पहुंचाने के लिए नाव खरीद कर अपने गांवों की पंचायत और युवाओं को दे रहे हैं. ताकि गांवों तक राशन और अन्य जरूरी सामान की सप्लाई हो सके. उनके मुताबिक ना सिर्फ पंजाब बल्कि हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भी बाढ़ग्रस्त इलाकों से उनके पास ऑर्डर लगातार आ रहे हैं. इसके अलावा वो सरकारी ऑर्डरों के साथ ही सरकारी नावों की मेंटिनेंस का काम भी देख रहे हैं. मोहन सिंह और उनके बेटे चरणजीत सिंह के मुताबिक हालात ये है कि लोग नाव और मोटर बोट के लिए दोगुना दाम देने को भी तैयार है.

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