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मीडिया, वकील और पुलिस, किसी को नहीं बख्शा... ऐसे 'राउडी राठौर' बने IPS अखिल कुमार

कानपुर पुलिस आयुक्त अखिल कुमार

एक बहुत पुरानी कहावत हमेशा सुनने को मिलती है कि अगर पुलिस चाहे तो किसी बच्चे का खिलौना भी कोई नहीं छीन सकता. इसका सीधा सा मतलब होता है कि अगर अपराधियों के बीच में पुलिस का खौफ हो तो कोई भी समाज सुरक्षित महसूस कर सकता है. वैसे तो हर शहर में पुलिस के आलाधिकारी आते जाते रहते है, लेकिन कानपुर के पुलिस आयुक्त अखिल कुमार एक ऐसे पुलिस कॉप के रूप में जाने गए, जिनकी चर्चा सिर्फ शहर में नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में हुई.

उन्होंने शहर में तीन ऐसी बड़ी कार्यवाही को अंजाम दिया जिसके बाद कानपुर में लोग उनको ‘राउडी राठौर’ बोलने लगे. यह नाम उस फिल्म से प्रेरित था जिसका हीरो ‘राउडी राठौर’ अपराधियों के खिलाफ मोर्चा खोलकर उनको नेस्तनाबूत कर देता है.
वैसे तो संविधान में तीन स्तंभ होते है, लेकिन मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. समाज की कमियों को उजागर करने, प्रशासन और पुलिस को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाने और पीड़ितों को न्याय दिलाने का काम मीडिया करती है.

मीडियाकर्मी पर कार्रवाई

बदलते समय के साथ कुछ मीडियाकर्मी भी अवैध कामों में लिप्त होते चले गए. अपनी पहुंच के कारण कभी भी ऐसे चुनिंदा मीडियाकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता था. तकरीबन डेढ़ साल पहले एक हजार करोड़ की जमीन पर कब्जे के आरोप कुछ मीडियाकर्मियों पर लगे. इसके बाद प्रशासन और पीड़ितों की तरफ से एफआईआर दर्ज कराई गई और उसके बाद एक ऐसी कार्यवाही हुई, जो इस शहर के इतिहास में कभी देखने को नहीं मिली.

पत्रकारों को भेजा गया जेल

अवनीश समेत कुछ नामचीन पत्रकारों के खिलाफ ना सिर्फ मुकदमा लिखा गया, बल्कि उनको गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. इसके बाद शहर में पत्रकारों के खिलाफ तहरीर देने की बाढ़ सी आ गई. किसी ने रंगदारी मांगने का आरोप लगाया तो किसी ने जमीन पर कब्जे करने का. सभी शिकायतों की जांच की गई और दर्जनों मीडियाकर्मियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करके उनको जेल भेजा गया. पुलिस आयुक्त की इस कार्यवाही के बाद शहर में हड़कंप तो मचा ही साथ ही पूरे प्रदेश में इस कार्यवाही की चर्चा होने लगी.

दीनू उपाध्याय पर हुई कार्यवाही

मीडियाकर्मियों पर कार्यवाही के बाद शहर में चर्चा होने लगी कि जमीनों के खेल में सिर्फ मीडियाकर्मियों का हाथ नहीं है, बल्कि इस गठजोड़ में अधिवक्ता और पुलिस कर्मियों की मिलीभगत के बिना यह खेल संभव नहीं है. इसके बाद शुरू हुआ अधिवक्ताओं की जांच का सिलसिला. कुछ छोटे नामों से गुजरते हुए एक बड़ा नाम सामने आया दीनू उपाध्याय का. दीनू और उनके साथियों के ऊपर कई तरह के आरोप लगे, जिसमें जमीन कब्जाने, मारपीट, रंगदारी मांगने जैसे आरोप शामिल थे.

मामला अधिवक्ता समाज से जुड़ा होने के कारण यह माना जा रहा था कि इस बार कोई बड़ी कार्यवाही नहीं होगी. अचानक एक दिन बड़ी कार्यवाही हुई और मुकदमा लिखने के बाद भारी पुलिस फोर्स के साथ दीनू उपाध्याय को गिरफ्तार कर लिया गया. इस कार्यवाही के बाद शहर में एक बार फिर हड़कंप मच गया. पुलिस आयुक्त अखिल कुमार की इस कार्यवाही के बाद लोगों में पुलिस का खौफ व्याप्त हो गया. सबको लगने लगा जब पत्रकार और अधिवक्ता के खिलाफ कार्यवाही हो सकती है तो फिर किसी के खिलाफ भी हो सकती है.

‘ऑपरेशन महाकाल’

उपरोक्त दो कार्यवाही होने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि अब कार्यवाही का यह सिलसिला थम जाएगा. पुलिस आयुक्त की दो कार्यवाही के बाद जमीनों का खेल करने वाले शांत हो गए थे. इसके बावजूद पुलिस आयुक्त अखिल कुमार ने लॉन्च कर दिया ‘ऑपरेशन महाकाल’. इसका नाम सुनते ही ऐसा लगने लगा कि शायद कुछ बड़ा होने वाला है. कुछ ऐसा जो इतिहास में कभी नहीं हुआ, कुछ ऐसा जो पूरे प्रदेश को हिलाकर रख देगा और ऐसा ही हुआ.

पुलिस आयुक्त अखिल कुमार

शहर के चर्चित अधिवक्ता अखिलेश दुबे को एक मुकदमे के बाद गिरफ्तार कर लिया गया. यह सबसे बड़ी कार्यवाही थी क्योंकि अखिलेश दुबे की पैठ पूरे पुलिस महकमे के साथ प्रदेश के दर्जनों सीनियर आईएएस और आईपीएस के बीच थी. इस कार्यवाही के बाद किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह भी हो सकता है. फिलहाल ऑपरेशन महाकाल चल रहा है. मीडिया और अधिवक्ताओं के बाद पुलिस आयुक्त अखिल कुमार ने अपने महकमे पर भी रहम नहीं किया.

पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ा

जब भी किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ कोई शिकायत आई तो उसके खिलाफ कार्यवाही की गई. फिर चाहे वो महिला से छेड़छाड़ का मामला हो या फिर सोना गायब कर देने का. इतना ही नहीं बल्कि अखिलेश दुबे मामले में नाम आने पर कई सीओ, एसओ के खिलाफ भी जांच बैठा दी गई है. प्लॉट कब्जाने के आरोप में इंस्पेक्टर, दारोगा के ऊपर मुकदमा भी लिखा गया है. इसके अलावा कई मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच चल भी रही है.

इतने बड़े मामलों में कार्यवाही करने से पुलिस आयुक्त अखिल कुमार की चर्चा पूरे प्रदेश में होने लगी, लेकिन कुछ आलोचना से अछूते भी नहीं रहे. मीडिया के खिलाफ कार्यवाही के बाद यह कहा गया कि कुछ बड़े खेल करने वाले मीडिया कर्मियों के खिलाफ तो कार्यवाही ठीक थी, लेकिन इसमें कुछ निर्दोष या छोटे खिलाड़ी भी फंस गए. यह कहा गया कि गेहूं के साथ घुन को भी पीस दिया गया.

‘जांच के बाद होती कार्यवाही’

यह भी कहा गया कि मीडिया और अधिवक्ताओं पर कार्यवाही में तो बहुत तेजी दिखाई गई, लेकिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ बड़ी कार्यवाही नहीं की गई. इन सब आलोचनाओं पर पुलिस आयुक्त अखिल कुमार का कहना था कि किसी भी निर्दोष के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई है. सभी तहरीर की पहले जांच होती है उसके बाद कार्यवाही को अंजाम दिया जाता है. पुलिस आयुक्त अखिल कुमार का कानपुर में कार्यकाल जितना चर्चित रहा अब उनका ट्रांसफर भी उतना ही चर्चा का विषय बना हुआ है.

अखिल कुमार का नाम पहले केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए चला गया था. उनके नाम पर मोहर लगाते हुए केंद्र ने उनकी तैनाती केंद्र सरकार में सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन में प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर की गई. इसके बाद यह माना गया कि बस अब तो अखिल कुमार चले जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद केंद्र से एक पत्र राज्य सरकार को भेजा गया, जिसमें अखिल कुमार को तुरंत रिलीव करने की बात कही गई.

इस पत्र के बाद सबको यह लग रहा था कि बस अब सिर्फ एक या दो दिन की बात है. इसके बावजूद अखिल कुमार आज भी पुलिस आयुक्त कानपुर के पद पर बने हुए है. देश में एक बार बड़ा सवाल उठा था कि ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा’, अब शहर में एक बड़ा सवाल चल रहा है कि ‘आखिर अखिल कुमार कब जायेंगे’ फिलहाल अखिल कुमार कानपुर पुलिस आयुक्त के रूप में मजबूती से जमे हुए है और शहरवासियों को आशा है कि भूमाफिया और अपराधियों के चंगुल से शहर को पूरी तरह मुक्त कराने के बाद ही वो केंद्र में जाएंगे.

मीडिया, वकील और पुलिस, किसी को नहीं बख्शा… ऐसे ‘राउडी राठौर’ बने IPS अखिल कुमार

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