Nation- अनेकों नाम, AK-47 का शौकीन, बम बनाने का उस्ताद… 70 के दशक से अब तक बसवराजू के आतंक की कहानी- #NA

नक्सलियों और माओवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान में बुधवार को सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली. सुरक्षाबलों ने अब तक 27 नक्सिलयों को मार गिराया है. नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके में मुठभेड़ अभी भी जारी है. इन 27 नक्सलियों में एक ऐसा भी था, जिसके नाम से लोग कांपते थे. वो इंजीनियर था, AK-47 का शौकीन था, वारफेयर का उस्ताद था. उसकी वारफेयर की प्लानिंग ऐसी हुआ करती थी कि कई बार सुरक्षाबल भी उसके जाल में फंस गए. यही वजह थी कि सरकार ने भी उस पर 1.5 करोड़ रुपए का इनाम रखा था.
इस नक्सली का नाम था ‘नंवबल्ला केशव राव उर्फ बसवराजू’. बसवराजू को एक नाम से नहीं बल्कि कई नामों से जाना जाता था. नंवबल्ला केशव राव, गनगन्ना, विजय, दरपू नरसिम्हा रेड्डी, नरसिम्हा, प्रकाश, कृष्णा इत्यादि नामों से इसे जाना जाता था. हालांकि उसका असली नाम नंवबल्ला केशव राव था. बसवराजू पिछले 35 सालों से माओवादी संगठन की केंद्रीय कमेटी का सदस्य था. वह आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले का रहने वाला था. उसकी उम्र 70 साल थी. बसवराजू के पिता का नाम वासुदेवा राव था.
2028 में CPI माओवादी का महासचिव बना
दरअसल, नक्सली बसवराजू नंवबर 2018 में सीपीआई माओवादी का महासचिव बना. वह नक्सल संगठन का महासचिव था और छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र में सक्रिय था. बसवराजू बी.टेक डिग्री धारक था और इंजीनियरिंग में शिक्षित होने के कारण नक्सलियों के लिए बम बनाने और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति तैयार करने में माहिर था. वह संगठन के लिए विस्फोटक और हथियार डिजाइन करने में विशेषज्ञ था.
LTTE से ली थी ट्रेनिंग
बसवराजू ने श्रीलंका के तमिल संगठन लिट्टे (LTTE) से गुरिल्ला युद्ध और विस्फोटकों की ट्रेनिंग ली थी, जिसने उसे नक्सली गतिविधियों में और खतरनाक बना दिया था. बसवराजू हमेशा अपने पास AK-47 रायफल रखता था. वह AK-47 राइफल का काफी शौकीन था. 24 सालों से पोलित ब्यूरो सदस्य के तौर पर काम कर रहा था. उसने पार्टी के केंद्रीय सैन्य आयोग के प्रभारी के तौर पर भी काम किया.
55 साल पहले छोड़ दिया था अपना घर
जानकारी के अनुसार, उसने साल 1970 में अपना घर छोड़ दिया था. बसवराजू वारफेयर में माहिर था. वारफेयर का मतलब है युद्ध करने की कला. गणपति के बाद बसवराजू को साल 2018 में संगठन के महासचिव की जिम्मेदारी मिली थी. वह संगठन में ज्यादातर समय सैन्य कमान संभालता रहा. बसवराजू सैन्य कमान संभालने और आक्रामक हमलों के लिए ही जाना जाता था. हमलों की रणनीति बनाने में भी बसवराजू को माहिर माना जाता है.
ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे कई हमले हुए, जिसको बसवराजू ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया और सुरक्षाबलों की इसकी भनक तक नहीं लग पाई. साल 2019 में गढ़चिरौली जिले में एक ऐसा ही हमला हुआ था, जिसमें महाराष्ट्र पुलिस के 15 कमांडो की जान चली गई थी. वहीं एक अन्य व्यक्ति भी मारा गया था.
इन हमलों की प्लानिंग में बसवराजू का हाथ
2010 दंतेवाड़ा हमला- 6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार गांव के पास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नक्सली-माओवादी विद्रोहियों द्वारा घात लगाकर किया गया हमला था, जिसके कारण 76 सीआरपीएफ जवानों की जान चली गई थी. साथ ही आठ माओवादी मारे गए थे. कहा जाता है कि इस हमले की प्लानिंग भी बसवराजू ने की थी.
2013 झीरम घाटी हमला- 25 मई 2013 को बस्तर जिले के दरभा इलाके में झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया था, जिसमें 29 लोग मारे गए थे. मृतकों में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल शामिल थे.
2018 अराकू हमला- आंध्र प्रदेश के विशाखापटनम जिले में नक्सलियों ने अराकू (अजनजा) विधानसभा सीट से विधायक किदारी सर्वेश्वर राव और पूर्व विधायक एस सोमा की गोली मार कर हत्या कर दी. नक्सलियों ने इस वारदात को विशाखापटनम से 125 किलोमीटर दूर डुंब्रीगुडा मंडल के थुटांगी गांव में अंजाम दिया.
2019 गढ़चिरौली हमला- 3 मई 2019 को घात लगाकार बैठे 100 से ज्यादा नक्सलियों ने हमला किया था. गढ़चिरौली में हुए इस हमले में 15 QRT जवान शहीद हो गए थे. इस हमले की प्लानिंग भी बसवराजू की ही थी.
अनेकों नाम, AK-47 का शौकीन, बम बनाने का उस्ताद… 70 के दशक से अब तक बसवराजू के आतंक की कहानी
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