Nation- सियासी मजबूरी या फिर मराठी से प्यार… 19 सालों के बाद क्यों साथ आए राज-उद्धव?- #NA

सियासी मजबूरी या फिर मराठी से प्यार... 19 सालों के बाद क्यों साथ आए राज-उद्धव?

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे

महाराष्ट्र की सियासी मिट्टी में शनिवार को एक बार फिर ठाकरे परिवार का सूरज उगा.जहां नया राजनीतिक सूत्र लिखा गया. कभी बालासाहेब के दो मजबूत स्तंभ कहलाने वाले ठाकरे ब्रदर्स यानी उद्धव और राज के रास्ते 2006 में अलग हो गए थे, लेकिन अब दोनों फिर एक साथ खड़े हो गए हैं. ऐसा लग रहा था जैसे किसी सियासी स्क्रिप्ट राइटर ने उनके मिलन को मराठी गौरव की कहानी में पिरो दिया हो. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे करीब बीस साल की तल्खियों को भुलाकर एक मंच पर गले मिले. बीस साल में तकनीक बदल जाती है, शहर बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, संदर्भ बदल जाते हैं, पर बदलाव की इस आंधी में रिश्ते कई बार बच जाते हैं.

महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता की ललकार के बीच, दोनों भाइयों ने पुरानी राजनीतिक दरार पर सीमेंट लगा दिया है. वैसे तो मुंबई शहर हर वर्ग और भाषा बोलने वाले लोगों से भरा है लेकिन सियासत में अंग्रेजी के लिए एक दबाएं, हिंदी के लिए दो दबाइए. जैसा कोई सिस्टम नहीं होता. सियासत अपनी भाषा. माहौल और वोट बैंक के हिसाब से चुनती है.लिहाजा दो भाइयों वाली इस सियासी पिक्चर की भाषा मराठी है और ये फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं है बल्किइसे शुरुआत कह सकते हैं.जिसका सार ये है कि 19 वर्षों से उद्धव और राज ठाकरे के जो रिश्ते थे वो हम आपके हैं कौन वाले थे.

अब दोनों भाइयों का कहना है कि हम साथ-साथ हैं

अब 2025 में दोनों भाइयों का कहना है कि हम साथ-साथ हैं. दोनों भाइयों का झगड़ा जरूर हिंदी से है लेकिन दोनों की कहानी किसी बॉलीवुड की हिंदी फिल्म की तरह ही है. जहां दोनों भाई पार्टी पर कब्जे और वर्चस्व की जंग के कारण अलग हुए थे आज हिंदी के विरोध में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों एकजुट हुए हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ ये एकता हिंदी के विरोध में है या फिर इसके पीछे गहरी गणित है.

हम आगे बढ़ें उससे पहले आज मुंबई के वर्ली में सजे उस मंच की बात कर लेते हैं. मंच पर सिर्फ दो कुर्सी थी, जिससे दोनों भाई पर ही नजर हो, और जब दोनों भाई बोलो तो भाषण का कॉन्टेंट भी एक जैसा ही था. खासकर मराठी के लिए लड़ने और गुंडागर्दी वाली बात. उद्धव ने कहा कि मराठी के लिए लड़ना गुंडागर्दी है तो हम गुंडे हैं. जबकि राठ ठाकरे ने दोनों को एक साथ मंच पर लाने का श्रेय सीएम फडणवीस को दिया.

ऐसा क्या हुआ है कि 19 सालों बाद एक साथ आ गए ठाकरे बंधु?

दोनों भाई मंच पर एक साथ थे, दोनों एक दूसरे से मिले, एक दूसरे का हाथ थामा, लेकिन सवाल ये है कि 2006 के बाद 2025 में यानी 19 वर्षों के बाद ऐसा क्या हुआ कि दोनों को साथ आना पड़ा. अगर इसके तात्कालिक कारण पर जाएं तो वो भाषा विवाद है. महाराष्ट्र सरकार ने तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी को अनिवार्य किया था लेकिन नेशनल एजुकेशन पॉलिसी को लागू करते हुए फडणवीस सरकार ने मराठी, अंग्रेजी के बाद तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी पढ़ाने का फैसला लिया.

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने इसका विरोध किया, संयुक्त मार्च निकालने का ऐलान भी कर दिया था. बढ़ते विरोध के बीच फडणवीस सरकार ने थ्री लैंग्वेज पॉलिसी वापस ले ली. सरकार के फैसले वापस लेने को राज और उद्धव ने अपनी विजय बताया. इसके बाद शनिवार को वर्ली में उद्धव और राज ने विजय रैली निकाली. तात्कालिक कारणों से आगे बढ़ें तो दोनों भाइयों का साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए चैप्टर की शुरुआत है और दोनों इधर उधर से गारंटी लेने के बजाए एकता में ही भविष्य की गारंटी देखते हैं.

क्यों साथ आए राज-उद्धव?

दरअसल महाराष्ट्र में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों राजनीतिक रूप से कमजोर हैं और हाशिए पर हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि 2024 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां बुरी तरह हारीं. उद्धव ठाकरे के 20 विधायक जीते थे, राज ठाकरे की की पार्टी का खाता भी नहीं खुला था. यही नहीं, राज ठाकरे ने 125 उम्मीदवार उतारे थे लेकिन उनके बेटे अमित ठाकरे समेत सभी 125 उम्मीदवार चुनाव हार गए.

अब आगे का मामला ये है कि अगले कुछ महीने में मुंबई में BMC के चुनाव होने वाले हैं. मुंबई में मराठी बोलने वालों की संख्या काफी ज्यादा है, ये शिवसेना यूबीटी और एमएनएस के वोटर हैं. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे साथ आए तो मराठी वोटों का बिखराव रुकेगा और दोनों भाइयों की हाशिए वाली राजनीति, फिर चमक सकती है.

राजनीतिक रूप से कमजोर हुए हैं उद्धव

उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से कमजोर हुए हैं, पिछले कुछ वर्षों में वो ना सिर्फ सत्ता से बाहर हुए बल्कि महाराष्ट्र में अब चौथे नंबर की पार्टी हैं। लोकसभा में उनके पास 9 सांसद हैं, और विधानसभा में 20 सदस्य हैं, जिसे राजनीतिक रूप से सम्मानजनक कह सकते हैं लेकिन राज ठाकरे की राजनीतिक हैसियत नंबर के हिसाब से शून्य है, पार्टी बनाने के बाद से उनकी लोकप्रियता गिरी है, विधायकों की संख्या कम होती गई है.

आंकड़ों पर डाले एक नजर

  • साल 2009 में राज ठाकरे के 13 विधायक जीते थे, और 5.71 फीसदी वोट मिले थे.
  • साल 2014 में सिर्फ एक विधायक जीते और 3.15 फीसदी वोट मिले
  • साल 2019 में भी एक ही विधायक जीता और वोटों की संख्या और कम हुई सिर्फ 2.25 फीसदी वोट मिले.
  • वर्ष 2024 में एक भी विधायक नहीं जीत पाया और वोट मिले सिर्फ 1.55 फीसदी रहा.
  • यानी विधायक तो एक भी नहीं और वोट डेढ़ प्रतिशत.

अगर BMC चुनाव की बात करें वर्ष 2012 में एमएनएस के 27 पार्षद जीते और वोट 20 फीसदी मिले थे. साल 2017 में MNS के 7 पार्षद जीते और 7.7% वोट मिले थे. यानी वोटों का प्रतिशत और पार्षदों की संख्या में लगातार कमी हो रही है. मतलब दोनों भाइयों की हालत करीब-करीब एक जैसी है, ऐसे में हिंदी विरोध के नाम पर एकजुटता और कुछ वोट हासिल करने में दोनों को राजनीतिक फायदा दिख रहा है.

रैली में राज ठाकरे ने कहा, जो बालासाहेब नहीं कर पाए, वो फडणवीस ने कर दिखाया, और उद्धव ने कहा कि मराठी के लिए लड़ना गुंडागर्दी है तो हम गुंडे हैं. ये सुनकर लगा जैसे सियासत पंचलाइन और स्क्रीनप्ले का खेल बन चुकी हो. दो दशकों की तल्खी एक मंच पर भाप बन कर उड़ गई, लेकिन क्या इतनी सहजता राजनीति में मुमकिन है? वैसे राजनीतिक रूप से देखें तो ये मराठी गौरव की लड़ाई कम और BMC चुनावी गणित का ट्रेलर ज़्यादा लग रहा है. भाषाई अस्मिता एक भावनात्मक बटन है, जिसे दबाकर सत्ता की लिफ्ट ऊपर चढ़ाई जा रही है.

(टीवी9 ब्यूरो रिपोर्ट)

सियासी मजबूरी या फिर मराठी से प्यार… 19 सालों के बाद क्यों साथ आए राज-उद्धव?

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