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अधीर चौधरी से अनबन, ममता बनर्जी से टकराव... बंगाल के 'पलटूराम' हैं हुमायूं कबीर

हुमायूं कबीर.

मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान करने वाले हुमायूं कबीर को तृणमूल कांग्रेस ने गुरुवार को सस्पेंड कर दिया. हुमायूं कबीर को मुर्शिदाबाद में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सभा के ठीक पहले सस्पेंड किया गया. हुमायूं कबीर भी सभा में शामिल होने के लिए आए थे, लेकिन वहीं उन्हें जानकारी मिली कि उन्हें पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया है. पत्रकारों से खबर सुनने के बाद वह गुस्से में चले गए.

अपने सस्पेंशन की खबर सुनने के बाद कुछ गुस्सा दिखाते दिखे. पिछले कुछ महीनों से बागी बने हुमायूं कबीर के राजनीतिक भविष्य को लेकर टीएमसी का यह फैसला हालांकि चौंकाने वाला नहीं था. वह लगातार पार्टी लाइन के खिलाफ बोल रहे थे और ऐसा माना जा रहा था कि पार्टी उनके खिलाफ जल्द एक्शन लेगी.

तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि हुमायूं कबीर ने पार्टी विरोधी काम किया है. उन्होंने पार्टी की पोजीशन से हटकर बाबरी मस्जिद बनाने का फैसला किया है. चेतावनी के बावजूद, वह अपने बयान पर अड़े रहे हैं. हालांकि, पार्टी विरोधी गतिविधियों का उनका रिकॉर्ड बहुत पुराना है.

कांग्रेस से राजनीति शुरू करने वाले हुमायूं कबीर तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं और बंगाल की सियासत में पलटूराम के नाम से जाने जाते हैं. इस बीच, हिमायूं कबीर ने ऐलान किया है कि वह पार्टी से इस्तीफा देकर नई पार्टी बनाएंगे. उन्होंने कहा कि वह शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा देंगे और 22 दिसंबर को नई पार्टी बनाने का ऐलान करेंगे.

कभी थे अधीर के करीबी, नहीं माना था कांग्रेस का आदेश

पेशे से बिजनेसमैन हुमायूं कबीर कभी कांग्रेस के सदस्य थे. मुर्शिदाबाद जिले में उनकी एक खास लोकप्रियता थी. 2011 में, यानी जिस साल लेफ्ट ने विदाई ली थी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में मां, माटी, मानुष की सरकार बनी थी. टीएमसी और कांग्रेस में गठबंधन हुआ था. उस समय मुर्शिदाबाद और मालदा के कुछ नेताओं को राज्य कैबिनेट में राज्य मंत्री का पद मिला था. हुमायूं कबीर को भी राज्य मंत्री बनाया गया था.

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बाद में टीएमसी और कांग्रेस का गठबंधन टूट गया. कांग्रेस हाईकमान के आदेश पर सबीना यास्मीन, अबू हेना, मानस भुइयां (जो उस समय कांग्रेस में थे), अबू नसीर खान चौधरी जैसे नेताओं ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन हुमायूं कबीर ने कांग्रेस का आदेश नहीं माना और उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया. उस समय हुमायूं करीब को कांग्रेस ने सस्पेंड कर दिया. हुमायूं, जो कभी अधीर चौधरी के करीबी माने जाते थे, MLA पद से इस्तीफा देकर तृणमूल में शामिल हो गए.

2015 में तृणमूल से की थी बगावत

लेकिन सिर्फ तीन साल में ही उनका तृणमूल कांग्रेस मोहभंग हो गया. हुमायूं ने तृणमूल से पार्टी के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया था. सिर्फ पार्टी ही नहीं, बल्कि पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी.

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तब तक रेजिनगर में उपचुनाव हो चुका था और हुमायूं हार चुके थे. और उन्हें अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा. उसके बाद उन्होंने बगावत शुरू कर दी. उन्हें यह सवाल करने पर सस्पेंड कर दिया गया कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी को अहमियत क्यों मिल रही है?

इंडिपेंडेंट के रूप में लड़ा चुनाव

तृणमूल कांग्रेस से सस्पेंड करने के बाद हुमायूं फिर से दूसरी पार्टी में चले गए. तृणमूल से सस्पेंड होने के बाद, वह अपनी ताकत दिखाने के लिए बेताब थे. एक साल बाद, विधानसभा चुनाव हुए. 2016 में, हुमायूं ने इंडिपेंडेंट कैंडिडेट के तौर पर चुनाव लड़ा. उन्होंने उस समय के कांग्रेस MLA रबीउल चौधरी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. वोटों का अंतर सिर्फ 1,050 था. वे तृणमूल को पीछे छोड़ते हुए दूसरे नंबर पर रहे.

BJP में हुए शामिल, लड़ा था चुनाव

बीच में 2 साल और बीत गए. तृणमूल के पास लौटने की कोई जगह नहीं थी, क्योंकि अभी 6 साल भी नहीं हुए थे. उन्होंने BJP को चुना. हुमायूं 2018 में BJP में शामिल हुए और फिर से चुनाव लड़े. हालांकि, उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ. वे तीसरे नंबर पर रहे. अबू ताहिर खान उस सीट से जीते और MP बने. हालांकि उन्हें 2.5 लाख वोट मिले, लेकिन हुमायूं को तीसरा स्थान खास पसंद नहीं आया. 6 साल देखते ही देखते बीत गए. वे फिर तृणमूल में वापस आ गए.

तृणमूल में वापसी और फिर बगावत

हुमायूं कबीर को 2021 में भरतपुर से टिकट मिला. उन्हें लंबे समय के बाद जीत का स्वाद मिला. चुनाव फिर आ रहे हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने चुनाव से पहले पार्टी के खिलाफ बार-बार मुंह खोला और उन्होंने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान कर दिया.

तृणमूल विधायक के बाबरी मस्जिद बनाने के ऐलान से पूरे देश की सियासत गरमा गई और तृणमूल कांग्रेस घिर गई. वह लगातार पार्टी के खिलाफ बयानबाजी कर रहे थे. ऐसा माना जा रहा है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के साथ उनकी बातचीत चल रही है और ऐसा कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में वह तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ अलग मोर्चा बना सकते हैं.

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